'..मैं कुछ सोच नहीं पाती बस अपनी क़िस्मत को रोती हूं'

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, फ़र्रुख़ाबाद से लौटकर
- प्रकाशित
उत्तर प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर बीबीसी की ख़ास सिरीज़ की पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि किस तरह आगरा में अस्पतालों का बाज़ार सा लगा है और वहां ठेके पर इलाज हो रहा है.
दूसरी कड़ी में आपने फ़र्रुख़ाबाद का बदहला सरकारी अस्पताल देखा. तीसरी कड़ी में हम आपको ऐसे सरकारी अस्पताल ले गए जहां तमाम कमियों के बावजूद मरीज़ों को मुफ़्त इलाज मिलता है. चौथी और अंतिम कड़ी में पढ़िए ऐसी मां की कहानी जिसके नवजात बच्चे की मौत ऑक्सीजन की कथित कमी से हो गई थी.
स्वाति ने बहुत देर तक ख़ुद को थामने की कोशिश की लेकिन बेटे का ख़्याल आते ही आंख से आंसू बहने लगे.
स्वाति ने फ़र्रुख़ाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 8 अगस्त को बेटे को जन्म दिया था.
कुछ देर बाद ही उनके बेटे को अस्पताल के एनआईसीयू में भर्ती करा दिया गया और शाम को परिवार को बताया गया कि बच्चे की मौत हो गई है.
फ़र्रूख़ाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 20 जुलाई से 21 अगस्त के बीच ऑक्सीजन की कथित कमी से 49 बच्चों की मौत हो गई थी.
स्थानीय प्रशासन और सरकार ने ऑक्सीजन की कमी की रिपोर्टों को झुठला दिया है.

स्वाति भी उन माओं में से एक हैं जिनके बच्चे इस दौरान अस्पताल के एनआईसीयू में मारे गए थे.
स्वाति के आंसू
बेटे की मौत का स्वाति पर क्या असर हुआ है यही जानने की कोशिश बीबीसी ने की. 20 साल की स्वाति पढ़ना चाहती थीं लेकिन कम उम्र में ही उनकी शादी हो गई.
स्वाति ख़ुद तो पढ़ नहीं पाईं लेकिन जब उन्हें मां बनने का पहला अहसास हुआ तबसे ही उन्होंने अपने बच्चे को अच्छे से पढ़ाने के बारे में सोचना शुरू कर दिया.
स्वाति कहती हैं, "बस यही सोचा कि अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में डालेंगे, चाहें ख़ुद फ़टे कपड़े पहनने पड़ें लेकिन बच्चे को अच्छे से ज़रूर पढ़ाएंगे लेकिन अब जब बच्चा ही नहीं रहा है तो मैं कुछ नहीं सोचती हूं, बस अपनी क़िस्मत को रोती हूं."
स्वाति के पति, सास और ससुर हर समय उनका ध्यान रखने की कोशशि करते हैं. सास हंसाने की कोशिश करती हैं लेकिन जैसे ही किसी बात पर हंसी आती भी है तो अगले पल आंसू में बदल जाती है.

स्वाति भी इस बात को समझती हैं कि पूरा परिवार उन्हें इस हादसे से उबारने की कोशिश कर रहा है.
वो कहती हैं, "मेरे पापा-मम्मी, सास-ससुर ने भागवत कथा कराने और भंडारा कराने की तैयारियां की थीं लेकिन सबके ख़्वाब अधूरे रह गए. मेरे पति मेरे सामने नहीं रोते, पीछे अकेले अकेले रोते हैं, जब सामने होते हैं तो मेरा धीर धराते हैं. मेरी सास मेरा धीरज धराने की कोशिश करती हैं."
पहले बच्चे का था इंतज़ार
स्वाति अपने घर की बड़ी बहू हैं. उनका पूरा परिवार नए मेहमान के आने की तैयारियां कर रहा था. स्वाति के ससुर कृष्णपाल शाक्य बहुत रोकने पर भी आंसू नहीं रोक पाते.
शाक्य कहते हैं, "बड़ी तमन्नाएं थी हमारी. हमने सोचा था कि लड़की हो या लड़का हम ख़ुशी मनाएंगे. हमारे घर का पहला बच्चा था."

शाक्य अपने पोते की मौत को अपनी बुरी क़िस्मत मानकर भूलना चाहते हैं लेकिन बार-बार उनके मन में सवाल खटकता है कि जब सबकुछ ठीक था तो अचनाक बच्चे की मौत कैसे हो गई?
वो कहते हैं, "हमारे पास कोई ठोस सबूत नहीं है लेकिन हमें लगता है कि बच्चे की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई. एक महीने में इतने बच्चों की मौत हो गई. कोई तो वजह होगी?"
वो कहते हैं, "सरकार अगर वाक़ई में कुछ बदलना चाहती है तो बीच में से दलालों को ख़त्म करे. मुझे लगता है कि मेरे पोते के हिस्से की ऑक्सीजन दलाल ले गए."
बच्चे की मौत को डढ़ महीने से ज़्यादा हो गया है लेकिन स्वाति और उनका परिवार अभी भी इससे उबर नहीं पा रहा है.

उनके पति अभी उस पहले अहसास को नहीं भूल पा रहे हैं जब उन्होंने अपने बेटे को गोद में लिया था.
उनकी सास अपने पोते की पहली झलक को नहीं भूल पा रही हैं. फ़र्रूख़ाबाद के अलीदादपुर मई गांव का यह परिवार अब बस यही चाहता है कि घर में दोबारा किलकारी गूंजे जो उन्हें इस ग़म से उबार पाए.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)



















