सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं...

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तुर्की के इस्तांबुल में भारी वज़न उठाने वाले मज़दूरों को अक्सर काम का इंतज़ार रहता है. इन लोगों की शिकायत है कि जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी इन्हें अच्छी मज़दूरी नहीं मिलती. देखिए कुछ तस्वीरें.

इस्तांबुल के फ़तिह इलाके में "वज़न उठाने वालों का बाज़ार है." यहां आधिकारिक रूप से बेरोज़गार पुरुष इकट्ठा होते हैं, उन्हें इंतज़ार होता है बहुत कम रकम के बदले बहुत ज़्यादा वज़न उठाने का कोई काम मिलने का.
इमेज कैप्शन, इस्तांबुल के फ़तिह इलाके में "वज़न उठाने वालों का बाज़ार है." यहां आधिकारिक रूप से बेरोज़गार पुरुष इकट्ठा होते हैं, उन्हें इंतज़ार होता है बहुत कम रकम के बदले बहुत ज़्यादा वज़न उठाने का कोई काम मिलने का.
इन्हीं में से एक अयदीन कोचोग्लू का कहना है कि वो बाज़ार में 15 साल से काम कर रहे हैं.
इमेज कैप्शन, इन्हीं में से एक अयदीन कोचोग्लू का कहना है कि वो बाज़ार में 15 साल से काम कर रहे हैं.
 कोचोग्लू की शिकायत है कि बीते कुछ सालों में उन्हें मिलने वाले मेहनताने की रकम में कमी आई है क्योंकि मज़दूर अलग-अलग गुटों में बंट गए हैं.
इमेज कैप्शन, कोचोग्लू की शिकायत है कि बीते कुछ सालों में उन्हें मिलने वाले मेहनताने की रकम में कमी आई है क्योंकि मज़दूर अलग-अलग गुटों में बंट गए हैं.
वो कहते हैं, "इसलिए हमारी आय में कमी आई है. हम हर रोज़ कई टन वज़न उठाते हैं लेकिन मेहनताना किसी चीज़ के लिए पूरा नहीं बैठता."
इमेज कैप्शन, वो कहते हैं, "इसलिए हमारी आय में कमी आई है. हम हर रोज़ कई टन वज़न उठाते हैं लेकिन मेहनताना किसी चीज़ के लिए पूरा नहीं बैठता."
इस बाज़ार के करीब 30 हिस्से हैं, हर एक में करीब 30 मज़दूर हैं. हर एक का एक अलग नाम है.
इमेज कैप्शन, इस बाज़ार के करीब 30 हिस्से हैं, हर एक में करीब 30 मज़दूर हैं. हर एक का एक अलग नाम है.
इनमें से एक हिस्से के प्रमुख का कहना है कि ये व्यवस्था एक अच्छा सकारात्मक बदलाव है. अदनान अक्गुल कहते हैं, "पहले हर एक मज़दूर अलग-अलग काम करता था और मज़दूरों की तादाद बहुत ज़्यादा थी."
इमेज कैप्शन, इनमें से एक हिस्से के प्रमुख का कहना है कि ये व्यवस्था एक अच्छा सकारात्मक बदलाव है. अदनान अक्गुल कहते हैं, "पहले हर एक मज़दूर अलग-अलग काम करता था और मज़दूरों की तादाद बहुत ज़्यादा थी."
अदनान अक्गुल बताते हैं, "पहले वो आपस में लड़ते थे कि किसने काम किया और कभी-कभी पुलिस को बुलाना पड़ता था. इसके बाद ये व्यवस्था की गई...अब कोई किसी का काम नहीं छीन सकता." वो कहते हैं कि जो पैसा मिलता है उसका बंटवारा दिन का काम निपटने के बाद कर दिया जाता है.
इमेज कैप्शन, अदनान अक्गुल बताते हैं, "पहले वो आपस में लड़ते थे कि किसने काम किया और कभी-कभी पुलिस को बुलाना पड़ता था. इसके बाद ये व्यवस्था की गई...अब कोई किसी का काम नहीं छीन सकता." वो कहते हैं कि जो पैसा मिलता है उसका बंटवारा दिन का काम निपटने के बाद कर दिया जाता है.
एक वज़न उठाने वाले की जीन
इमेज कैप्शन, ये मज़दूर एक ख़ास तरह की जीन लेकर चलते हैं जो भारी वज़न उठाने में मददगार होती है.
पोर्टर की मूर्ति, फ़तिह, इस्तांबुल
इमेज कैप्शन, "हमाल- वज़न उठाने वाले की मूर्ति". ये मूर्ति 2012 में फ़तिह नगरपालिका ने बाज़ार के केंद्र में लगाई थी. इसका इस्तेमाल मज़दूर मिलने-जुलने की जगह के तौर पर करते हैं.
एक और मज़दूर की शिकायत ख़राब सेहत है. उनका कहना है कि उनकी कमर पर वज़न बढ़ता जा रहा है. वो कहते हैं, "मुझे दिन भर के काम के बदले 50 लीरा (25 डॉलर से कम) मिलते हैं."
इमेज कैप्शन, एक और मज़दूर की शिकायत ख़राब सेहत है. उनका कहना है कि उनकी कमर पर वज़न बढ़ता जा रहा है. वो कहते हैं, "मुझे दिन भर के काम के बदले 50 लीरा (25 डॉलर से कम) मिलते हैं."
फ़िकरी गुंगोरेन कहते हैं, "वो मुझे 'हमाल' कह कर बुलाते हैं. किसी ने मेरा नाम नहीं पूछा है. क्योंकि उनके लिए, मैं सिर्फ़ एक हमाल हूं. इससे एक तरह से मेरा अपमान होता है."
इमेज कैप्शन, फ़िकरी गुंगोरेन कहते हैं, "वो मुझे 'हमाल' कह कर बुलाते हैं. किसी ने मेरा नाम नहीं पूछा है. क्योंकि उनके लिए, मैं सिर्फ़ एक हमाल हूं. इससे एक तरह से मेरा अपमान होता है."