सोशल: 'शरीफ़ लोगों ने ख़ामोश रहना सीख लिया है'

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विशाखापट्टनम में दिनदहाड़े महिला के बलात्कार और चश्मदीदों के मदद करने के बजाए वीडियो बनाने की घटना के बाद बीबीसी ने सवाल पूछा था कि इस तरह की घटना में लोग सीधे हस्तक्षेप करने से क्यों बचते हैं?

हमारे फ़ेसबुक और ट्विटर पन्ने पर पाठकों से मिले चुनिंदा जवाब में हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

शाम वासनिक ने लिखा, "इंसान रहे कहां, अपेक्षा इंसानों से की जाती है हैवानों से नहीं."

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शम्श अहमद रज़ा ने लिखा, "अंतरात्मा नाम की कोई चीज़ हुआ करती थी अब वो नहीं है. अब हमारे सामने जो भी होता है वह केवल एक दृश्य भर है. कोई भी ख़बर हमें झकझोरती नहीं है. अवचेतन सा जीवन है हमारा."

फ़िदा नूरैन लिखते हैं, "पुलिस जब अपराधी को छोड़ देगी और मदद करने वाले को पकड़कर ले जाएगी, इसलिए लोग लफड़े में नही पड़ना चाहते. पहले पुलिस को ठीक करो सब ठीक हो जाएगा."

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सुजीत कुमार ने लिखा, "लोग सत्ता और सुख के भूखे दिखते हैं. आज की मौकापरस्त राजनीति लोगों की संवेदना खत्म कर रही है."

भवानी शंकर ने लिखा, "शरीफ़ लोग चुप रहना सीख गए हैं."

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प्रीति गुप्ता ने ट्विटर पर लिखा, "इसलिए क्योंकि भ्रष्ट पुलिस आपको ही अपराधी बना देगी."

गणपति झा ने लिखा, "सक्षमता और सामर्थ्य के अभाव में ख़ामोश रहना पड़ता है. ख़ामोशी की वजह विवशता, बेबसी और लाचारी है."

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