नौकरी का टेस्ट और बारिश में छाते का संबंध?

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- Author, सैम हैरिसन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
- प्रकाशित
नौकरी के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के इम्तिहान होते हैं. आपकी क़ाबिलियत कभी लिखित परीक्षा तो कभी इंटरव्यू से परखी जाती है.
सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भर्तियों में आपकी शारीरिक ताक़त भी जांची जाती है. इसके अलावा डॉक्टर भी आपका मुआयना करते हैं.
मगर दुनिया में कई देश ऐसे हैं, जहां इनके अलावा भी अजब-ग़ज़ब तरीक़ों से मुलाज़िमों को नौकरी देने से पहले परखा जाता है.
ऐसा ही एक देश है लैटिन अमरीका का अर्जेंटीना. यहां कमोबेश हर कंपनी नौकरी देने से पहले लोगों का मनोवैज्ञानिक टेस्ट लेती है. इस टेस्ट का नाम है साइकोटेक्निको. इस टेस्ट में लोगों को बारिश में खड़े एक आदमी की तस्वीर बनाने को कहा जाता है.
नौकरी चाहने वाला शख़्स जैसी तस्वीर बनाता है, उसी से उसकी क़िस्मत तय होती है. ये देखा जाता है कि उसने भीगते आदमी की कितनी बड़ी तस्वीर बनाई है. उसने आदमी के पांव के नीचे ज़मीन की लक़ीरें खींची हैं या नहीं. उसके हाथ में छाता दिखाया है कि नहीं.
तस्वीर की लक़ीरें किस तरह खींची गई हैं, ये भी इस टेस्ट में देखा जाता है. और ज़ाहिर है ये भी देखा जाता है कि अमुक इंसान ने कितनी देर में बारिश में भीगते आदमी की तस्वीर बनाई.
अगर कोई प्रतियोगी छोटी सी तस्वीर बनाता है, तो ये माना जाता है कि वो शर्मीला है खुलकर बात नहीं करता. और किसी ने बहुत बड़ी तस्वीर उकेर दी, तो ज़ाहिर है कि उसे दिखावा बहुत पसंद है.
अगर किसी शख़्स की तस्वीर एक से दूसरे पन्ने तक फैल जाती है, तो ये माना जाता है कि वो हर वक़्त फ़ोकस अपने ऊपर ही चाहता है. कोई अगर बरखा की बूंदें इस तरह बनाता है कि वो आंसू जैसी दिखती हैं, तो ये माना जाता है कि वो बहुत तनाव में है.

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क़रीब 45 मिनट का समय
अर्जेंटीना में आप के सच्चे दोस्त आपको ये ज़रूर बताते हैं कि इस टेस्ट में जब भी तस्वीर बनाएं तो छाता बनाना न भूलें. भीगते आदमी का चेहरा भी साफ़ होना चाहिए. साथ ही उसके पैरों के नीचे ज़मीन भी दिखनी चाहिए.
लोगों की दिमाग़ी पड़ताल का ये टेस्ट क़रीब 45 मिनट का होता है. इसमें ख़ुद को कुछ वाक्यों में बयां करना होता है. कुछ तस्वीरें और डिज़ाइन बनाने होते हैं. कई बार गणित के आसान से सवाल भी पूछे जाते हैं. इसके अलावा रोरसैक इंकब्लॉट टेस्ट भी होता है. जिसमें कुछ बिंदुओं को मिलाना होता है.
अर्जेंटीना ही नहीं, कई और लैटिन अमरीकी देशों में भी ये टेस्ट नौकरी देने से पहले लिया जाता है. इस प्रक्रिया का मक़सद ये जानना होता है कि आप अच्छे से अपनी नौकरी का रोल निभा पाएंगे कि नहीं.
अर्जेंटीना के मनोवैज्ञानिक कार्ला बाफ़िको कहती हैं कि इससे पता चलता है कि अचानक कोई हालात बन जाने पर नौकरी मांगने वाला क्या करेगा. बारिश का मतलब बाहरी दबाव होता है. और जिस तरह भीगते हुए आदमी को बनाया जाता है उससे मनोवैज्ञानिक को अंदाज़ा होता है कि नौकरी मांगने वाला शख़्स इस दबाव से कैसे निपटेगा.
लेकिन बहुत से लोग इस टेस्ट से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते. जर्मन मनोवैज्ञानिक सोफिया स्टॉकिंगर कहती हैं कि अब तक किसी तजुर्बे से ये साबित नहीं हुआ कि ये टेस्ट किसी इंसान का सही किरदार बताता है. मसलन अगर किसी ने भीगते हुए शख़्स के पैरों तले ज़मीन बनाई है, तो वो ज़मीनी होगा ये ज़रूरी नहीं.
सोफिया के मुताबिक़ अर्जेंटीना में होने वाले ऐसे किसी भी परीक्षण के नतीजों को लेकर कोई रिसर्च नहीं हुई है. यानी साफ है कि ये टेस्ट आदमी की सही तस्वीर बताएं, ये ज़रूरी नहीं.
हालांकि अर्जेंटीना की मनोवैज्ञानिक रेजिना मोइरानो कहती हैं कि ये टेस्ट बहुत काम के हैं. किसी को नौकरी देने का सिर्फ यही आधार नहीं होता. मगर इससे नौकरी मांगने वाले को समझने में कंपनियों को मदद मिलती है.

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शायद अर्जेंटीना की सभ्यता में ही मनोवैज्ञानिक पड़ताल की अहमियत है. तभी वो 'साइकोटेक्निको' टेस्ट को इतनी अहमियत देता है. जबकि अमरीका और यूरोपीय देशों में ये टेस्ट बंद हो चुका है.
अमरीका के अलावा जर्मनी और दूसरे उत्तरी यूरोपीय देशों में एप्टीट्यूड टेस्ट को अहमियत दी जाती है. इन देशों में इस बात पर भी रिसर्च होती रहती है कि ऐसे टेस्ट लोगों की सही क़ाबिलियत परखने में कितने कारगर हैं. वहीं फ्रांस, इटली, यूनान और स्पेन जैसे देशों में अभी भी मुलाज़िमों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल की जाती है.
हाथ की लिखावट से मिलती है नौकरी
फ्रांस में लोगों को नौकरी देने से पहले उनसे पर्चे लिखवाए जाते हैं. फिर मनोवैज्ञानिक हाथ की लिखावट से लोगों के व्यक्तित्व के अंदर झांकने की कोशिश करते हैं.
फ्रांस की हैंडराइटिंग एक्सपर्ट सिल्वी शर्मेट-कैरॉय 35 साल से ये काम कर रही हैं. उन्हें ग्राफोलॉजिस्ट कहा जाता है.
सिल्वी बताती हैं कि लोगों के हाथ की लिखावट से पता चलता है कि वो कितने मिलनसार हैं. वो लोगों से किस तरह बातें करते हैं. वो कितने अक़्लमंद हैं. इसके लिए किसी के हाथ की लिखावट के साथ-साथ उसकी लिखने की रफ़्तार भी देखी जाती है.
1991 में फ्रांस की 91 फ़ीसद कंपनियां हैंडराइटिंग टेस्ट लिया करती थीं. आज ये तादाद कितनी है, कहना मुश्किल है. क्योंकि आज तो ज़्यादातर टेस्ट ऑनलाइन होते हैं. मोटे अंदाज़े के मुताबिक़ आज भी फ्रांस की 50 से 60 फ़ीसद कंपनियों में नौकरी देने से पहले हाथ की लिखावट का टेस्ट होता है. कुछ लोग मानते हैं कि फ्रांस में अभी भी 70 से 80 प्रतिशत कंपनियों में ये टेस्ट होता है.
सिल्वी का मानना है कि हाथ की लिखावट इंसान के बारे में बहुत सी जानकारियां देती हैं. हालांकि, सिल्वी की बात को सही साबित करने वाली अब तक कोई रिसर्च नहीं हुई है.

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हर देश में नौकरी देने का अलग पैमाना
भारत और चीन जैसे देशों में नौकरी देने से पहले तरह-तरह के टेस्ट होते हैं. ज़्यादातर एप्टीट्यूड टेस्ट होते हैं. इसके अलावा शरीर की बनावट की नाप-जोख होती है. एक नौकरी के लिए हज़ारों, कई बार लाखों अर्ज़ियां आ जाती हैं. ऐसे में कम क़ाबिल लोगों को छांटने के लिए ऑनलाइन टेस्ट भी लिए जाते हैं, ताकि असल इम्तिहान में ज़्यादा भीड़ न जुटे.
जैसे-जैसे दुनिया में नौकरी के लिए मुक़ाबला कड़ा होता जा रहा है, अच्छे लोगों की तलाश में कंपनियां नए-नए टेस्ट ले रही हैं.
मगर, अभी भी बहुत से ऐसे देश हैं, जहां पुराने ढर्रे पर ही चला जा रहा है. ऐसे में अर्जेंटीना में नौकरी चाहिए, तो आप भीगते इंसान की अच्छी सी तस्वीर बनाना ज़रूर सीख लीजिए. और फ्रांस में नौकरी करनी है, तो हाथ की लिखावट बेहतर करने पर काम कीजिए.
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