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मामूली बीमारियां जानलेवा बन जाएंगी, बेअसर होते एंटीबायोटिक्स
मेडिकल साइंस ने ज़बरदस्त तरक़्क़ी कर ली है. गंभीर से गंभीर बीमारी का इलाज खोजा जा चुका है.
मगर हम बहुत जल्द ऐसे दौर में पहुंचने वाले हैं जब यह तरक़्क़ी धरी की धरी रह जाएगी. जब छोटी-छोटी बीमारियों से पहले की तरह लोग मरने लगेंगे. मामूली समझे जाने वाले इन्फ़ेक्शन जानलेवा साबित होंगे.
इसकी वजह है एंटीबायोटिक दवाओं का बेतहाशा इस्तेमाल. पूरी दुनिया एंटीबायोटिक की इस कदर आदी हो चुकी है कि अब बहुत से बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक बेअसर है. और अगर यही रफ़्तार रही तो कैंसर की कीमोथेरेपी, अंगों का प्रत्यर्पण, जोड़ों का रिप्लेसमेंट और वक़्त से पहले पैदा होने वाले बच्चों की देखभाल बेहद मुश्किल हो जाएगी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की महानिदेशक डॉक्टर मार्गरेट चैन ने पिछले साल ही संयुक्त राष्ट्र को आगाह किया था कि हमें एंटीबायोटिक के बेतहाशा इस्तेमाल को रोकना होगा. डॉक्टर चैन ने कहा था कि, आज हम जितनी तेज़ी से एंटीबायोटिक का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे बहुत जल्द ही हम पुराने दौर में पहुंच जाएंगे. मेडिकल साइंस की तरक़्क़ी बेकार साबित होगी.
भले ही हमें यह चेतावनी बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही गई मालूम हो, मगर है यह हक़ीक़त के बेहद क़रीब.
बेकार हो जाएंगे एंटीबायोटिक
दुनिया भर में एंटीबायोटिक की बैक्टीरिया मारने की क्षमता कम हो रही है. पहले आम संक्रमण के लिए जो एंटीबायोटिक कारगर साबित होते थे, वे अब बेअसर हो गए हैं. यही रफ़्तार रही तो एक वक़्त ऐसा आएगा जब कोई भी एंटीबायोटिक बीमारी दूर करने में कारगर साबित नहीं होंगे.
अमरीका की एमोरी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉक्टर डेविड वाइज़ कहते हैं कि हम उस दौर में पहुंच जाएंगे, जहां छोटी सी चोट भी जानलेवा साबित हुआ करती थी.
पर अच्छी बात यह है कि दुनिया को इस चुनौती का एहसास है. तमाम देश मिलकर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल कम करने के लिए काम कर रहे हैं.
पर बुरी ख़बर यह है कि यह मामला जितना सुनने में आसान है, उतना है नहीं. यह काफ़ी पेचीदा मसला है, जिससे निपटने के लिए कई तरह के क़दम एक साथ उठाने होंगे.
आख़िर क्या है प्रतिरोधक चुनौती?
मान लीजिए कि आपको कोई इन्फेक्शन हो जाता है. आप इसके इलाज के लिए कोई एंटीबायोटिक लेते हैं. मसलन पेन्सिलिन. लेकिन बहुत मुमकिन है कि पेन्सिलिन से आपका संक्रमण ठीक ही न हो. क्योंकि वह ऐसे बैक्टीरिया की वजह से हो सकता है, जिस पर पेन्सिलिन बेअसर हो.
आज की तारीख़ में बहुत से ऐसे बैक्टीरिया हैं, जिन पर एंटीबायोटिक का असर ही नहीं होता. आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है? बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक का असर क्यों नहीं होता?
असल में दूसरे जीवों की तरह ही बैक्टीरिया का भी डीएनए होता है. और जैसा कि इंसानों में होता है, यह डीएनए अपने आप से बदल भी सकता है. अब जैसे कोई बैक्टीरिया पहले किसी एंटीबायोटिक से ख़त्म हो जाता था. मगर उसकी नस्ल के कुछ बैक्टीरिया ने अपने डीएनए में बदलाव किया. इससे उस पर एंटीबायोटिक का बेअसर हो गई. ऐसे बैक्टीरिया तेज़ी से फैलते हैं. ये अपना एंटीबायोटिक से लड़ने वाला डीएनए दूसरे बैक्टीरिया को भी देते हैं.
नतीजा ये होता है कि एंटीबायोटिक से बेअसर बैक्टीरिया तेज़ी से दूर-दूर तक फैल जाते हैं. बैक्टीरिया में यह ख़ूबी भी होती है कि वो एक ही नस्ल के न होने के बावजूद एक-दूसरे को अपना डीएनए और जीन दे सकते हैं. इसी तरह इंसानों या दूसरे जानवरों के भीतर रहने वाले बैक्टीरिया भी आपस में ये एंटीबायोटिक रेसिस्टेंट जीन एक-दूसरे को दे देते हैं.
हम जितनी ज़्यादा एंटीबायोटिक इस्तेमाल करेंगे, उतना ही बैक्टीरिया में उससे लड़ने की ताक़त पैदा होगी. इसकी नई नस्ल तेज़ी से फैलेगी और एंटीबायोटिक बेअसर साबित होंगी.
इसके उलट अगर हम कम एंटीबायोटिक इस्तेमाल करेंगे, तो उसकी प्रतिरोधक क्षमता वाले बैक्टीरिया की नस्ल कम पनपेगी.
आख़िर ये चुनौती कितनी बड़ी है?
अमरीका का सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन कहता है कि बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक का असर न होने से हर साल सिर्फ़ अमरीका में 23 हज़ार लोगों की मौत होती है. हालांकि अमरीकी डॉक्टरों की एसोसिएशन इन्फेक्शन डिज़ीज़ेज सोसाइटी ऑफ़ अमरीका की अमांडा जेज़ेक कहती हैं कि ये आंकड़ा बहुत कम है. असल में एंटीबायोटिक के असर न होने से इससे ज़्यादा लोग अमरीका में मौत के शिकार होते हैं.
इसके मुक़ाबले साल 2000 से 2010 के बीच पूरी दुनिया में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल तीस फ़ीसदी बढ़ गया.
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया भर में सिर्फ़ टीबी के ऐसे क़रीब पांच लाख मरीज़ हैं जिनके शरीर में इस बीमारी के ऐसे बैक्टीरिया हैं जिन पर एंटीबायोटिक बेअसर है.
2014 में टीबी के 3.3 फ़ीसद ऐसे मरीज़ सामने आ रहे थे जिन पर किसी भी एंटीबायोटिक का असर नहीं हो रहा था.
इसी तरह पेट के आम इन्फेक्शन से लेकर गोनोरिया, यूटीआई, न्यूमोनिया, मलेरिया जैसी बीमारियां देने वाले बैक्टीरिया की कई ऐसी नस्लें पनप चुकी हैं जिन पर एंटीबायोटिक का असर नहीं होता.
इंग्लैंड के सरकारी विभाग पब्लिक हेल्थ के मुताबिक़, वहां की सरकार एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया के ख़तरे को महामारी और भयंकर बाढ़ की तरह की बड़ी चुनौती मानती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन का अंदाज़ा है कि 2050 तक एंटीबायोटिक का असर न होने से दुनिया भर में एक करोड़ लोगों की मौत होगी. इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था को 66 ख़रब डॉलर का नुक़सान होगा.
आख़िर यह हुआ कैसे?
इंसान ने एंटीबायोटिक का इतना इस्तेमाल किया है कि आज ऐसे हालात बन गए हैं. बात-बात पर डॉक्टर एंटीबायोटिक लिखते हैं. भारत समेत बहुत से देशों में तो सिर्फ़ बता देने भर से दवा के दुकानदार एंटीबायोटिक दे देते हैं. इसके लिए डॉक्टर के पर्चे की भी ज़रूरत नहीं होती.
यूरोप में ही बहुत से देशों में एंटीबायोटिक का बेहिसाब इस्तेमाल होता है.
कई पश्चिमी देशों में तो जानवरों को तेज़ी से बढ़ाने के लिए भी एंटीबायोटिक दी जाती हैं. जिससे उनके शरीर में ऐसे बैक्टीरिया विकसित हो जाते हैं, जिन पर एंटीबायोटिक का असर नहीं होता. जब इंसान इन जानवरों का मांस खाते हैं, तो इन जानवरों के अंदर एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया इंसानों में पहुंच जाते हैं.
वैसे लोग ये कह सकते हैं कि पुराने एंटीबायोटिक असर नहीं कर रहे, तो नए विकसित कर लिए जाएं.
नई एंटीबायोटिक विकसित करना इतना आसान नहीं है. यह महंगा सौदा है. यही वजह है कि पिछले तीस-चालीस सालों में कोई नई एंटीबायोटिक बाज़ार में नहीं आई है.
फिर अगर कोई नई एंटीबायोटिक विकसित कर भी ली जाएगी, तो उसका बेतहाशा इस्तेमाल होने लगेगा. दो साल के अंदर बैक्टीरिया अपने जीन में बदलाव करके इस नई एंटीबायोटिक से लड़ने की ताक़त हासिल कर लेंगे.
इससे बचने का रास्ता क्या है?
दो साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन की अगुवाई में तमाम देश एंटीबायोटिक की इस चुनौती से लड़ने के लिए ग्लोबल एक्शन प्लान के लिए राज़ी हुए थे.
इसके तहत एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया की पहचान करने का काम होगा. साथ ही डॉक्टरों को प्रोत्साहित किया जाएगा कि वो कम से कम एंटीबायोटिक लिखें. साथ ही तमाम देशों में आपसी सहयोग से इस चुनौती से पार पाने की कोशिश की जाएगी.
पिछले ही साल संयुक्त राष्ट्र की महासभा में एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया की चुनौती पर चर्चा हुई. यह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सिर्फ़ चौथी बार था जब सेहत से जुड़े किसी मसले पर चर्चा हुई हो.
इसी तरह जी-20 देशों के नेता भी एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया की चुनौती से निपटने के लिए मिलकर काम करने को राज़ी हुए.
अमरीका की तमाम सरकारी संस्थाएं, अस्पतालों के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रही हैं. वो डॉक्टरों के लिए गाइडलाइन तैयार कर रही हैं, जिनमें एंटीबायोटिक के कम इस्तेमाल की सलाह शामिल होगी. बच्चों को बहुत मजबूर होने पर ही एंटीबायोटिक लेने की सलाह दी जाती है. अमरीकी बच्चों के एंटीबायोटिक खाने का चलन कम हुआ है. हालांकि बड़ों में यह तादाद कम तो नहीं हुई, पर बढ़ भी नहीं रही है.
दस साल पहले यूरोप में जानवरों को बढ़ाने के लिए एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. अमरीका ने इसी साल ये पाबंदी लगा दी है. अब किसानों के बीच एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ जागरूकता पैदा करने की कोशिश की जा रही है.
रिसर्च पर खर्च हो रहे हैं करोड़ों डॉलर
सबसे बड़ी मुश्किल एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया की पहचान की है. इसके लिए अमरीका में नेशनल एंटीमाइक्रोबियल मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया गया है. इसके ज़रिए पूरे देश में ही नहीं दूसरे देशों में एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया के आंकड़े जमा किए जाते हैं. ताकि इनसे निपटने की तैयारी की जा सके.
इसी तरह अमरीका की एमोरी यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक और डॉक्टर मिलकर इस चुनौती से लड़ रहे हैं. डॉक्टरों को जब भी एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया का पता लगता है वो इसकी जानकारी यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स को देते हैं. ताकि उनकी ज़रूरतों के हिसाब से नई रणनीति बनाई जा सके.
इंग्लैंड में जागरूकता अभियान के चलते 2014 के मुक़ाबले 2015 में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल 5.3 फ़ीसद कम हुआ है.
इसके अलावा दवा कंपनियों और वैज्ञानिकों को नए एंटीबायोटिक्स विकसित करने के लिए भी मदद की जा रही है.
जैसे अमरीका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ और बायोमेडिकल एडवांस्ड रिसर्च ऐंड डेवेलपमेंट अथॉरिटी ने मिलकर CARB-X नाम का अभियान शुरू किया है. इसके तहत क़रीब पांच करोड़ डॉलर की रक़म नई एंटीबायोटिक खोजने के काम में ख़र्च की जा रही है.
नई दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल में भी सरकारें मदद कर रही हैं. ताकि दवा कंपनियों का एंटीबायोटिक विकसित करने का ख़र्च कम हो और वो नई दवाएं बनाकर मुनाफ़ा कमा सकें.
इन कोशिशों से इंसानियत के लिए नई उम्मीद जगती है. ऐसा लगता है कि हम एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया से निपटने का कोई रास्ता निकाल लेंगे.
एंटीबायोटिक का इस्तेमाल बहुत ज़रूरी होने पर ही किया जाए तो भी इसके प्रतिरोधक बैक्टीरिया पनपेंगे. यानी इस चुनौती से हमें लगातार निपटना होगा.
(अंग्रेज़ी का मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
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