अभिजीत दीपके की हिरासत, हंगामा और रिहाई, शनिवार को क्या हुआ

अभिजीत दीपके
इमेज कैप्शन, अभिजीत दीपके को शुक्रवार को तिरंगा मार्च से पहले हिरासत में लिया गया था (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, दुष्यंत कुमार
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिंदी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के फ़ाउंडर अभिजीत दीपके को शनिवार को रिहा कर दिया गया. इसकी जानकारी सीजेपी की लीगल सेल की हेड रत्ना सिंह ने बताया.

बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित के मुताबिक़, सीजेपी ने कहा कि रिहाई के बाद अभिजीत दीपके वहां से चले गए.

एनसीपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनीष गवांडे ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, "अभिजीत को मनमाने ढंग से हिरासत में रखे जाने के 24 घंटे बाद रिहा कर दिया गया है. मुझे उम्मीद है कि सौरव और आशुतोष को भी जल्द ही तिहाड़ जेल में उनकी ग़ैरक़ानूनी हिरासत से रिहा कर दिया जाएगा."

दरअसल अभिजीत दीपके दिल्ली में अनीष के घर रुके हुए थे.

रिहाई के बाद अभिजीत दीपके की मां अनीता दीपके ने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा, "अब हम काफी बेहतर महसूस कर रहे हैं और राहत मिली है, क्योंकि कल से हम बहुत तनाव में थे. मेरी सास को गुज़रे अभी 10 दिन भी नहीं हुए हैं और उसके बाद हमें यह ख़बर मिली, जिससे हम बहुत परेशान हो गए थे."

दीपके ने शुक्रवार शाम को 'लहरा दो तिरंगा' मार्च का आह्वान किया था लेकिन उन्हें मार्च से पहले ही प्रिवेंटिव डिटेंशन में ले लिया गया था.

सीजेपी के दो दूसरे प्रमुख चेहरे सौरव दास और आशुतोष रांका पहले से ही न्यायिक हिरासत में हैं. उन्हें जंतर-मंतर में बिना अनुमति दाख़िल होने के मामले में पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.

शनिवार को क्या हुआ

मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन
इमेज कैप्शन, मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर शनिवार को वकीलों और सुरक्षा बलों के बीच बहस से तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी

शनिवार को दोपहर अभिजीत दीपके को कनॉट प्लेस के पास मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन लाया गया. वहां उन्हें स्पेशल एग्ज़ीक्युटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

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बार एंड बेंच के मुताबिक़, एसईएम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ ज़मानत दी.

लाइव लॉ के अनुसार, दीपके को बॉन्ड की शर्तें माननी होंगी. इनमें से एक शर्त ये भी है कि उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखनी होगी.

शनिवार शाम को ही वापमंथी छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में ले लिया गया था लेकिन उन्हें शनिवार तड़के रिहा कर दिया गया.

मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर शनिवार को उस समय तनाव की स्थिति पैदा हो गई जब वकीलों और सुरक्षा बलों के बीच बहस होने लगी.

इस बीच रत्ना सिंह ने सुनवाई में देरी पर सवाल उठाते हुए एक्स पर लिखा, "सुनवाई दोपहर 12 बजे होनी थी. लेकिन शाम 3.38 बजे तक इसके कोई संकेत नहीं मिल रहे. अगर यह जानबूझकर नहीं है तो क्या है."

मौके पर मौजूद बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित ने बताया था कि हिरासत में लिए गए लोगों से मिलने या उनकी पैरवी करने की अनुमति वकीलों को नहीं देने की वजह से पुलिस स्टेशन के बाहर तनाव का माहौल पैदा हो गया.

उन्होंने बताया कि मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत है और यहां गेट पर कुछ समय के लिए हंगामा हुआ.

आंदोलन के प्रमुख युवा चेहरों के पुलिस कार्रवाई के दायरे में आने के बावजूद शुक्रवार को कनॉट प्लेस और उसके आसपास सैकड़ों लोग जमा हुए. इनमें से कई लोगों के हाथों में तिरंगा था. इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया.

इंडिया टुडे ने पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया कि प्रदर्शन के दौरान करीब 150 लोगों को हिरासत में लिया गया.

अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन को सीजेपी 2.0 कहा था, लेकिन पुलिस की सख़्त कार्रवाई से सवाल उठने लगा है कि इस आंदोलन का अब आगे क्या होगा.

सरकार के सामने चुनौती

अभिजीत की हिरासत के बाद आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में लिया गया.
इमेज कैप्शन, अभिजीत की हिरासत के बाद आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को भी हिरासत में लिया गया

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि सरकार को इस तरह के आंदोलन को बहुत ध्यान से देखना चाहिए.

की कार्रवाई से आंदोलन को और दिशा मिल सकती है.

वह कहते हैं, "जब भी किसी राजनीतिक आंदोलन के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होती है, तो उसमें और उभार आता है. "

"कॉकरोच जनता पार्टी का उदय अलग तरीक़े से हुआ है. उसने पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए और उसके प्रदर्शन में हर वर्ग के लोग, ख़ासकर युवा शामिल हुए."

रशीद किदवई कहते हैं, "साल 2014 से मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जो भी राजनीतिक विरोध सामने आया, सरकार ने उसे नक्सलियों, विदेशी ताक़तों या देश विरोधी गतिविधियों से जोड़कर उसका असर कम करने की कोशिश की."

"लेकिन जुलाई से अब तक सरकार इस आंदोलन को किसी ख़ास खांचे में फिट नहीं कर पाई है. पहली बार सरकार इस विरोध को क़ाबू करने में विफल रही है. हालांकि, यहां मामला युवाओं का है, इसलिए सरकार कोई मौक़ा नहीं देना चाहती."

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई.

विश्लेषकों मानना है कि अधिक सख़्ती से सरकार के लिए आंदोलन को रोकना मुश्किल हो सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "जब इस तरह के विरोध होते हैं या सरकार इतनी ज़्यादा सख़्ती करती है, तो उसके लिए मुश्किल बढ़ जाती है. अब शायद सरकार इसे आसानी से नहीं दबा सकेगी."

"भले ही यह राजनीतिक मुद्दा हो, मगर यह छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन है."

पड़ोसी देशों में हुए प्रदर्शनों से इसकी तुलना किए जाने पर लव कुमार मिश्रा कहते हैं, "भले ही इन प्रदर्शनों की तुलना बांग्लादेश से हो रही है, लेकिन वहां की सरकारें बहुत नाज़ुक मोड़ पर थीं. भारत के हालात अलग हैं. भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार काफ़ी मज़बूत है."

आपको बता दें कि बांग्लादेश में जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों की कोटा व्यवस्था के ख़िलाफ़ छात्रों का प्रदर्शन शुरू हुआ था.

बाद में यह शेख़ हसीना सरकार के ख़िलाफ़ बड़े आंदोलन में बदल गया और पांच अगस्त 2024 को हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़ कर देश से बाहर शरण लेनी पड़ी.

इसी तरह नेपाल में सितंबर 2025 में भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर पाबंदी के ख़िलाफ़ युवाओं का 'जेन ज़ी' आंदोलन भड़का. हिंसक प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया और पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी.

प्रदर्शनकारी
इमेज कैप्शन, शुक्रवार को हुए प्रदर्शन में कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया

बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम 'दिनभर' में शामिल वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनीषा प्रियम ने कहा, "ये युवा हैं और झंडा ही तो फहरा रहे हैं. इसमें क्या दिक़्क़त होनी चाहिए? इन युवाओं की लड़ाई बिल्कुल भी राजनीतिक नहीं थी. इन्होंने नीट और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठाए थे."

वह कहती हैं, "ये बच्चे कोई क़ानून नहीं तोड़ रहे हैं. पुलिस उन्हें किस तरह पीट रही है, यह सबके सामने है. पुलिस बच्चों की पिटाई कर रही है और अगर वे ज़रा-सा कुछ कहते हैं, तो उसे अवमानना बताया जा रहा है."

उन्होने कहा, "किसी भी सरकार को युवाओं की इस भावना को नहीं छेड़ना चाहिए. इसके बजाय सरकार को उन सवालों के जवाब देने चाहिए, जो ये युवा पूछ रहे हैं."

अभिजीत दीपके को हिरासत में क्यों लिया गया?

नेहा बोरा और अभिजीत दीपके
इमेज कैप्शन, सीजेपी ने शुक्रवार शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में 'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम की कॉल दी थी

सीजेपी ने शुक्रवार शाम पांच बजे कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में 'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम बुलाया था.

शुक्रवार सुबह दिल्ली पुलिस की एक टीम उस घर पर पहुंची, जहां अभिजीत दीपके ठहरे हुए थे.

पुलिस ने उन्हें नोटिस देकर मार्च में शामिल नहीं होने को कहा. नोटिस के मुताबिक़, अभिजीत ने कनॉट प्लेस में लोगों से जमा होने की अपील की थी, लेकिन इसके लिए क़ानूनी अनुमति नहीं ली गई थी.

बाद में शाम क़रीब चार बजकर 50 मिनट पर अभिजीत घर से बाहर निकले. उन्हें रोकने के लिए वहां मौजूद पुलिसकर्मी आगे बढ़े.

इंडियन एक्सप्रेस ने पुलिस सूत्रों के हवाले से बताया कि अभिजीत को दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली के जाफ़रपुर कलां पुलिस स्टेशन ले जाया गया था.

हालांकि, सीजेपी ने बाद में दावा किया कि उसे अभिजीत के ठिकाने की जानकारी नहीं दी जा रही और उन्हें वकीलों से बात करने की अनुमति भी नहीं दी गई.

सौरव और आशुतोष पहले से न्यायिक हिरासत में

सौरव दास और आशुतोष रांका
इमेज कैप्शन, बीते 13 अक्तूबर को आशुतोष रांका और सौरव दास ने जंतर मंतर के अंदर घुसकर तिरंगा झंडा लहराया था

इससे पहले 13 अक्तूबर को सीजेपी के 14 कार्यकर्ता जंतर-मंतर पहुंचे थे. इनमें सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे भी शामिल थे.

पुलिस का आरोप है कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने और वहां भारी बैरिकेडिंग के बावजूद ये लोग एक निजी परिसर के रास्ते अंदर पहुंचे.

पुलिस के मुताबिक़, इन लोगों ने एक बंद लोहे के गेट को पार किया, जंतर-मंतर पहुंचे, तिरंगा फहराया और नारे लगाए.

पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की और उनके काम में बाधा डाली.

इस मामले में कनॉट प्लेस और संसद मार्ग पुलिस स्टेशनों में दो अलग मामले दर्ज किए गए.

पुलिस ने कहा कि सौरव और आशुतोष ने बार-बार क़ानून का उल्लंघन किया और सोशल मीडिया के ज़रिए दूसरे लोगों को भी ऐसी गतिविधियों के लिए उकसाने की कोशिश की.

दोनों को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

सीजेपी का कहना है कि उसके नेता केवल तिरंगा फहराने और 'भारत माता की जय' के नारे लगाने के लिए वहां गए थे.

सीजेपी नेता अजिंक्य शिंदे को पांच हज़ार रुपये के बॉन्ड पर छोड़ दिया गया. इसके साथ यह शर्त लगाई गई कि वह एक साल तक ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे, जिससे शांति भंग हो.

इससे पहले विमान से हिरासत में लिए गए थे तीनों नेता

शॉर्ट वीडियो देखिए
वीडियो कैप्शन, अभिजीत दीपके को पुलिस ने विमान से ही हिरासत में लिया

अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को 10 अक्तूबर को भी हिरासत में लिया गया था.

तीनों मुंबई से दिल्ली पहुंचे थे और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल होना चाहते थे. दिल्ली पुलिस ने विमान के उतरने के बाद उन्हें उसके अंदर से ही हिरासत में ले लिया था.

अगले दिन एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने तीनों को रिहा करने का आदेश दिया.

सौरव और आशुतोष को 50 हज़ार रुपये के मुचलके और एक साल तक शांति भंग न करने की शर्त पर छोड़ा गया था.

पुलिस ने इसी शर्त के कथित उल्लंघन को दोनों को तिहाड़ भेजे जाने का एक आधार बताया है.

सरकार और बीजेपी ने क्या कहा?

सरकार ने विपक्ष पर युवाओं का इस्तेमाल करके अराजकता फैलाने का आरोप लगाया है
इमेज कैप्शन, सरकार ने विपक्ष पर युवाओं का इस्तेमाल करके अराजकता फैलाने का आरोप लगाया है

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर युवाओं का इस्तेमाल करके अराजकता फैलाने और बांग्लादेश जैसे 'सत्ता परिवर्तन' की कोशिश करने का आरोप लगाया.

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा कि विपक्ष की लड़ाई चुनाव सुधार, एसआईआर या युवाओं के भविष्य के लिए नहीं है.

उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष अराजकता फैलाकर सत्ता हासिल करना चाहता है.

नितिन नबीन ने कहा, "लोकतंत्र में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता जनादेश से होकर जाता है, अराजकता से नहीं."

वहीं, अभिजीत दीपके ने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों से जवाब मांगना अराजकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी अभिव्यक्ति है.

उन्होंने कहा, "कारोबार शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि सरकार की ओर से शहर बंद करने, इंटरनेट रोकने और लोगों की आवाजाही पर पाबंदियां लगाने से प्रभावित होता है."

सीजेपी का कहना है कि वह महात्मा गांधी के शांति और अहिंसा के रास्ते पर चल रही है.

तिरंगा मार्च में सुरक्षा बंदोबस्त

पुलिस का कहना था कि बिना अनुमति जमा होने वाले लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.
इमेज कैप्शन, पुलिस का कहना था कि बिना अनुमति जमा होने वाले लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी

सीजेपी के कार्यक्रम को देखते हुए शुक्रवार को नई दिल्ली और उसके आसपास 25 हज़ार से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान तैनात किए गए थे.

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क और राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के पास सीसीटीवी कैमरे लगाए गए.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत कनॉट प्लेस और आसपास के इलाक़ों में लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी लगाई गई थी.

नई दिल्ली नगर पालिका परिषद ने सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्तूबर के लिए बंद कर दिया.

सेंट्रल पार्क के आसपास प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के लिए बसें पहले से खड़ी की गई थीं.

पुलिस का कहना था कि बिना अनुमति जमा होने वाले लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी. प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए भी पहले अनुमति लेनी होगी.

अभिजीत दीपके को दिए गए नोटिस में पुलिस ने कहा कि कनॉट प्लेस एक व्यस्त कारोबारी इलाक़ा है, जहां आने-जाने के रास्ते सीमित हैं.

पुलिस का कहना था कि बड़ी भीड़ जमा होने से आसपास की सड़कों पर यातायात रुक सकता है. इससे लोगों को वहां से निकालने और एंबुलेंस व दमकल की गाड़ियों के आने-जाने में भी मुश्किल हो सकती है.

नोटिस में कहा गया कि राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से रोज़ औसतन करीब दो लाख यात्री सफ़र करते हैं.

पुलिस ने कनॉट प्लेस के व्यापारियों, कर्मचारियों और वहां आने वाले लोगों के अधिकारों का भी हवाला दिया.

हालांकि, पुलिस ने कहा था कि सीमित संख्या में लोगों को किसी उचित स्थान पर तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने की सुविधा दी जा सकती है.

सरकार उलझती दिखाई दे रही है?

शुक्रवार को दिल्ली में तिरंगा यात्रा निकालते कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ता.
इमेज कैप्शन, शुक्रवार को दिल्ली में तिरंगा यात्रा निकालते कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ता

यह पूछे जाने पर कि सरकार इस आंदोलन को क्यों नहीं दबा पा रही है या इसमें क्यों उलझती जा रही है, रशीद किदवई कहते हैं, "विडंबना देखिए, अगर कोई दिल्ली के कनॉट प्लेस में झंडा लहराने जा रहा है और पुलिस उस पर डंडे चलाए, तो क्या किसी ने सोचा था कि मोदी राज में ऐसा हो सकता है?"

"सरकार कॉकरोच जनता पार्टी के साथ सख़्ती से पेश आ रही है. जबकि राहुल गांधी जब मार्च करते हैं, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचने दिया जाता है."

वह कहते हैं, "महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि कभी-कभी हम अपने राजनीतिक विरोधियों के कारण आगे बढ़ते हैं."

"इसलिए यह देखना होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी के साथ सख़्ती बीजेपी की सोची-समझी राजनीति है या इसके पीछे कोई और वजह है."

लव कुमार मिश्रा का मानना है कि भारत की राजनीतिक स्थिति बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से अलग है और नरेंद्र मोदी सरकार काफ़ी मज़बूत है.

लेकिन उनके मुताबिक़, सरकार की सख़्ती और प्रदर्शनकारी युवाओं की आंदोलन जारी रखने की कोशिश के बीच टकराव बना रह सकता है.

वह कहते हैं, "सरकार चाहेगी कि प्रदर्शन ख़त्म हो, मगर छात्र चाहेंगे कि यह चलता रहे. सरकार को इस आंदोलन को बातचीत की मेज़ पर लाना पड़ेगा."

पिछली कार्रवाई में क्या हुआ था?

अभिजीत दीपके
इमेज कैप्शन, 10 अक्तूबर के प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को हिरासत में लिया गया था और फिर मुचलके पर छोड़ा गया था

बीबीसी की प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल हलफ़नामे में कहा था कि 10 और 11 अक्तूबर की कार्रवाई ख़ुफ़िया सूचनाओं के आधार पर की गई थी.

पुलिस ने दावा किया कि उसकी कार्रवाई से दिल्ली में क़ानून-व्यवस्था का एक बड़ा संकट टल गया.

पुलिस के मुताबिक़, हिरासत में लिए गए आम प्रदर्शनकारियों को अस्थायी केंद्रों में रखा गया और दो से छह घंटे के भीतर छोड़ दिया गया.

पुलिस ने यह भी दावा किया कि हिरासत में लिए गए राजनीतिक नेताओं को थानाध्यक्षों के कमरों में बैठाया गया और उन्हें चाय, कॉफ़ी और खाना दिया गया.

इस कार्रवाई के दौरान दिल्ली आने-जाने वाली करीब 241 ट्रेनें रद्द की गई थीं. 45 मेट्रो स्टेशन 25 घंटे तक बंद रहे.

रायसीना हिल्स के चार किलोमीटर के दायरे में 24 घंटे तक मोबाइल इंटरनेट भी बंद रखा गया था.

पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए 20 जुलाई को हुए सीजेपी के प्रदर्शन का भी हवाला दिया.

पुलिस का आरोप है कि उस प्रदर्शन में 30 हज़ार से अधिक लोग शामिल हुए थे और 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे.

सीजेपी ने इसके उलट पुलिस पर प्रदर्शनकारियों, ख़ासकर महिलाओं के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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