मुजरा मुर्दा या मॉडर्न

    • Author, कल्पना शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

इन दिनों फिल्म एजेंट विनोद के गाने ‘दिल मेरा मुफ्त का’ के जलवे हैं और फ़िल्म के निर्माता कह रहे हैं कि इस मुजरे के साथ बॉलीवुड में मुजरे की वापसी हुई है.

फ़िल्म की अभिनेत्री करीना कपूर से जब पूछा गया कि ये मुजरा कितना पारंपरिक है तो करीना ने स्वीकार किया कि ये एक मॉडर्न ज़माने का ‘मॉडर्न मुजरा’ है और 2012 के दर्शकों को ध्यान में रख इसे बनाया गया है.

करीना का मुजरा देख सवाल उठे कि क्या ये ही मुजरा है. इस मॉडर्न मुजरे में और पाकीज़ा में देखे गए मुजरों में ज़मीन आसमान का अंतर है . वैसे मुजरों ने पाकीज़ा से पहले ही फिल्मों में जगह ले ली थी पर मेरी याददाश्त ने मुझे पाकीज़ा तक ही पहुंचाया. तो चलिए ज़रा पास से देखा जाए मुजरे का बदलता चेहरा.

‘राम झरोखे बैठके सबका ‘मुजरा’ ले जैसी जाकी चाकरी ताको तैसा दे.’

तुलसीदास की इन पक्तिंयों का जिक्र करते हुए कत्थक गुरु पंडित बिरजू महाराज बताते हैं कि मुजरा मुग़लकाल से कहीं पहले आ चुका था और मुजरा दरअसल कत्थक द्वारा अपनी हाजिरी प्रस्तुत करना है .

हिंदी फिल्मों में मुजरे की मौजूदगी पर बिरजू महाराज ने बीबीसी को बताया कि उनके चाचा लच्छु महाराज जी ने महल, मुग़लेआज़म और पाकीज़ा जैसी फिल्मों में मुजरे को बड़ी खूबसूरती से दिखाने की शुरूआत की.

बिरजू महाराज मुजरे में भाव को अहमियत देते हुये कहते हैं, ‘पुरानी हिरोइनें आंखों से बात किया करती थी, आंखों के नीचे उतरने ही नहीं देती थी .इतना शुद्ध भावों का प्रदर्शन था.आजकल भाव आंखों के नीचे से शुरु होते हैं.ये तो भाव नहीं अभाव हो गया’ .

मुजरे में बोल भी खास रहे, ज़ाहिर सी बात है नज़र लागी राजा तोहरे बंगले पर या ये क्या जगह है दोस्तों या फिर चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था जैसे मुजरों को सिर्फ भाव या नृत्य के लिये क्रेडिट तो नहीं दिया जाता .

बिरजू महाराज कहते हैं कि पहले के ज़माने में तवाएफें मुजरा करने से पहले ख्याल, ठुमरी और गज़ल को स्टडी करती थी तब जाकर नृत्य पर बात आती थी .

लेकिन करीना के इस मॉडर्न मुजरे के बाद अगर मॉडर्न मुजरों की लाइन लग गयी तो पता नहीं उसमें गानों के बोल का स्तर ऊपर होगा या नीचे गिरेगा, इसके तो कयास ही लगाए जा सकते हैं.

एजेंट विनोद के इस मुजरे को निर्देशित करने वाली सरोज खान ने माना कि इसे मॉडर्न मुजरा कहना थोड़ा गलत होगा पर उन्हें इससे कोई आपत्ति भी नहीं . सरोज कहती हैं, ‘मॉडर्न बोल के चले, चाहे इंडियन बोल के ..बस चलना चाहिये.’

ये जवाब सुनकर मुजरे के हश्र पर थोड़ी दया सी आ गई पर फिर सरोज खान की इस बात ने थोड़ी तसल्ली दी कि कि ये मुजरा सिर्फ एक शुरुआत है. जब युवाओं को मुजरे की आदत पड़ जायेगी तब इन्हें असली मुजरा भी दिखायेंगे.

अस्सी के दशक में हिंदी फिल्म उमराव जान में मुजरे को पूरी नफ़ासत और नज़ाकत से पेश करने वाले निर्देशक मुज़्जफ़र अली, मुजरे की प्रासंगिकता पर जोर देने की बात कहते हैं .

मुज़्जफर अली कहते हैं, “उमराव जान में मुजरे को मैंने ज़िंदगी से जोड़ा था, एक तहज़ीब से जोड़ा था. वो एक ठूंसा हुआ आइटम नंबर नहीं था, स्क्रिप्ट का हिस्सा था . अगर आज के फिल्मकारों की मुजरे में रुचि बढ़ती है तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है पर मुजरे को फिल्म में शामिल करने के लिये उस तहज़ीब की फ़िल्म बनना ज़रुरी है . वो तहज़ीब नहीं बची जिसमें मुजरा होता था, ना वो तमीज़ के लोग हैं .”

मुज़्ज़फ़र अली कहते हैं कि अगर कद्रदान के सामने मुजरा नहीं होगा तो मुजरे को भी मज़ा नहीं आयेगा, मुजरा मुर्झा जाएगा.

2002 में आई फिल्म देवदास में माधुरी दीक्षित को ठुमरी पर मुजरा कराने वाले पंडित बिरजू महाराज कहते हैं, “अगर मुजरा खुबसूरत ढंग से दिखाया जाये तो कोई हर्ज नहीं लेकिन अगर वो मुजरे के नाम पर सिर्फ अंग प्रदर्शन होगा तो मैं उसे कैबरेट मानूंगा, मुजरा नहीं.”

मुजरा हो या कोई और कला - उसको असल रुप में दिखाने में वक्त लगता है और प्रमोशन और पब्लिसिटी में जुटे आजकल के फिल्मकारों के पास वक्त की सबसे ज्यादा कमी है.

दिमाग कहता है कि अपनी बात मुज़्जफर अली के इस ताने से खत्म करूं कि मुजरे के ज़माने गये, मुजरा मुर्दा हो गया है . पर फिर दिल कहता है ठारे रहियो !