तालियों से पेट नहीं भरता: इरशाद कामिल

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- Author, स्वाति बक्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
चमेली, जब वी मेट, मेरे ब्रदर की दुल्हन और रॉकस्टार जैसी फ़िल्मों के गाने लिखने वाले गीतकार इरशाद कामिल अपने सुकून भरे गीतों के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस नाज़ुक दिल शायर के अंदर रहता है एक शख़्स जिसमें ज़माने भर के लिए ग़ुस्सा और खीझ है. इरशाद कामिल दिल्ली आए तो उनकी ज़िंदगी के तमाम पहलुओं पर एक ख़ास बातचीत हुई. सिलसिला शुरू हुआ उनके नाम से.
नाम में क्या रखा है?
ऐसा लगता है कि मेरे पेशे के साथ मेरे नाम का बेहद गहरा ताल्लुक़ है. हां, जब मेरी अम्मी ने मेरा नाम <link type="page"><caption> इरशाद कामिल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/10/111007_imtiazali_dk.shtml" platform="highweb"/></link> रखा था तब मुझे ये बिलकुल पसंद नहीं था.
पांचवीं-छठीं क्लास तक मैं अम्मी को बोलता रहा कि अभी मेरे बोर्ड के एक्जाम नहीं हुए हैं, अभी भी मेरा नाम बदल दो. वसीम रख दो, या कुछ और रख दो. इरशाद भी कोई नाम होता है?
अगर किसी को मैं अपना नाम बताऊंगा, तो वो इरशाद इरशाद करने लगेगा और चिढ़ाएगा.
<link type="page"><caption> गीतों के साथ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/09/110913_music_review_mere_brother_ki_dhulan_pn.shtml" platform="highweb"/></link>, साहित्य के साथ जुड़ जाने के बाद अब लगता है कि मेरे लिए इससे खूबसूरत नाम कोई और नहीं है.

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पत्रकारिता, इत्तेफ़ाक और टीवी लेखन, मामला क्या है ?
ये बड़े इत्तेफाक़ की बात है. मेरा दोस्त ट्रिब्यून अखबार में सब-एडिटर के लिए इंटरव्यू देने गया था. मैं उसके साथ था. संयोग ऐसा हुआ कि वो भाई साहब रह गए और मैं चुन लिया गया. इस तरह ये सिलसिला शुरू हुआ. पहले ट्रिब्यून, इसके बाद जनसत्ता.
एक दिन जनसत्ता में अचानक रात के डेढ़ बजे मैं अपना डबल कॉलम लिख कर घर आ रहा था. अचानक दिमाग में बात आई कि, इरशाद कामिल क्या तुमने ये सोचा था कि बड़े होकर खुशवंत सिंह बनोगे, या कुलदीप नैयर बनोगे? तो अंदर से आवाज़ आई, नहीं ये तो नहीं सोचा था.
और अगली ही सुबह मैंने इस्तीफ़ा दे दिया. फिर कुछ दिन चंडीगढ़ में घुमक्कड़ी और थिएटर करने के दौरान यूं ही एक दिन लेख टंडन से मुलाकात हो गई.
लेख टंडन को लेखक की ज़रूरत थी. फिर क्या था मैंने उनके सीरियल 'कहां से कहां तक' के लिए 22 दिन सेट पर बैठकर डायलॉग लिखे.
गीतकार बनना है, क्या ये सोचा था?
हां, बिलकुल ध्यान में था. तब मैं इस तरह के सवाल भी झेल रहा था कि <link type="page"><caption> गीत लिख</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2011/11/111111_nargisfakhri_dk.shtml" platform="highweb"/></link> कर क्या कभी किसी का पेट भरा है. मैंने पीएचडी के दौरान कविता विषय यही सोच कर चुना था कि काम की जो बारीकियां हैं, उसे सीखूं.
मैं इन दिनों अपने भीतर वह ज़मीन तैयार कर रहा था, जहां से एक लेखक का जन्म हो सके. ये भी इत्तेफ़ाक की ही बात है कि इम्तियाज़ अली से मुलाक़ात हो गई और उन्होंने मुझे 'सोचा न था' में मौक़ा दे दिया.
इम्तियाज़ के साथ का जो सिलसिला चला वो अब तक चल रहा है.
गीतकार की कामयाबी क्या संगीतकार की लोकप्रियता पर निर्भर है?

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हां, ये इस इंडस्ट्री की रवायत है. 'जब वी मेट' के सारे गाने लोगों को बहुत पसंद आए थे. इस फ़िल्म ने मुझे एक अलग तरह की पहचान दी थी.
इसके बाद आई 'रॉकस्टार'. 'रॉकस्टार' ने असल वाले इरशाद को, जिसके लिए रोमांस उतनी सस्ती और उतनी उथली चीज़ नहीं थी, लोगों के सामने ला खड़ा किया.
अब लोगों के सामने वो इरशाद आया जो सिर्फ गीतकार नहीं है, थोड़ा सा साहित्यकार, थोड़ा सा शायर भी है. जिसके अंदर दुनिया के लिए खीझ है. जो ऊपर से भले ही बहुत नरम लगता
हो, मगर अंदर पूरा का पूरा जल रहा है.
व्यावसायिक होते हुए भी हम किस हद तक साफ दिल हो सकते हैं, अपनी सीमाओं को बढ़ा सकते हैं, ये रॉकस्टार ने बता दिया.
बाज़ार और रचनात्मकता क्या हमक़दम हो सकते हैं?
मुझे लगता है, दोंनो एक साथ चल सकते हैं. कला व्यवसाय के बिना चल ही नहीं सकती.
यदि मैं, और मेरे जैसे गीतकारों को केवल लिखने से ही प्यार है तो वे घर में बैठकर लिखते ही रहें ना. क्यों लोगों तक पहुंचाएं ये सब.
तालियों से पेट बिलकुल नहीं भरेगा. और यदि पेट नहीं भरेगा तो कोई भी कला या कलाकार ज़िंदा नहीं रह सकते.
क्या 'नॉस्टाल्जिया' और 'मेमोरी' समकालीन सिनेमा के आड़े आते हैं?
'मेरे ब्रदर की दुल्हन' का टाइटिल ट्रैक था- 'मेट्रीमोनियल सी हो आंखें, काम में जो ना हो लेज़ी, जिसमें हो थ्री जी की तेजी'. दूसरा गाना, 'कैसा ये इश्क है, अजब सा रिस्क है'. शुद्धतावादी लोगों को इस पर काफी परेशानी है.

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भाषा पर खूब हायतौबा मचती है. हम राग अलापते हैं कि जो पुरानी चीजें थीं वे अच्छी थीं. हम नॉस्टाल्जिया में ही रहना चाहते हैं.
मेरा मानना है कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत, उसकी याददाश्त है. और उससे भी बड़ी ताकत है, भूल जाना. यदि आप बंधी-बंधाई परिपाटी पर चलने के आदी हैं, तो अपनी राह नहीं खोज सकतें.
जहां तक शुद्धतावाद या भाषा की बात है, सिनेमा कला और साहित्य का एक बहुत ही छोटा सा उदाहरण है. पूरे का पूरा सिनेमा कला या साहित्य नहीं है.
सिनेमा का अहम पहलू है, मनोरंजन. सबका मनोरंजन भाषा की शुद्धता से हो, साहित्य से हो, ये ज़रूरी नहीं है.
कोई शिकायत ?
अपने आप से तो कोई शिकायत नहीं है दुनिया से ज़रूर है. मेरे अंदर बहुत कुछ ऐसा है जिसे सिनेमा निकाल नहीं पाएगा क्योंकि वो बिकता नहीं है. उसके पैसे नहीं मिल सकते. ख़ुद को ख़ुश करने के लिए कभी कविताएं लिख लेता हूं. नाटक लिखता हूं. जो कुछ मुझसे हो सका है अब तक उससे मैं बहुत ख़ुश हूं. सफ़र तो अभी जारी है.
(बीबीसी संवाददाता स्वाति बक्शी के साथ हुई खास बातचीत पर आधारित)
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