एमएफ़ हुसैन के पोते का कैमरे से कमाल

    • Author, चिरंतना भट्ट
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

ट्रैवल, फैशन, सेलिब्रिटी और कैमरा....मानों ये सब सलामत हुसैन के लिए काफ़ी नहीं थे..लिहाजा उन्होंने थिएटर में भी अपना हाथ आज़मा लिया.

कोई शख़्स इतना कुछ एक साथ करे तो उसकी बात तो जरूर होगी, लेकिन अगर वह शख़्स नामचीन कलाकार एमएफ़ हुसैन के ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाला हो तो बात करेंगे, लेकिन आपको ज़्यादा अचरज नहीं होगा.

एमएफ़ हुसैन के पोते सलामत हुसैन की तस्वीरों की प्रदर्शनी मुंबई में शुरू हुई है. यह तस्वीरें मुंबई, दुबई, लंदन, न्यूयार्क, सिंगापुर और तुर्की सहित कई शहरों को अपने में क़ैद किए हुए हैं.

बीबीसी से बात करते हुए सलामत ने अपने प्रसिद्ध दादा की यादें, फोटोग्राफ़ी और अपनी अब तक की यात्रा के बारे में बातें की.

यादें एमएफ़ हुसैन की

दादा एम.एफ. हुसैन को याद करते हुए सलामत कहते हैं, "वह जब भी घर में होते तब माहौल में एक उर्जा बनी रहती. गर्म चाय के कप के साथ वह अपने दोस्तों की आने वाली एक्ज़ीबिशन, भविष्य की योजनाओं के बारे में घंटों बाते करते रहते."

सलामत कहते हैं कि कैमरा रखने की प्रेरणा उन्हें दादा से ही मिली. वे कहते हैं, "हमारा अपार्टमेंट उनके सभी दोस्तों, मीडिया और कलाकारों के लिए एक खुला घर था. दादा के साथ बिताया हर पल एक नया अनुभव था. अपनी जड़ों को कैसे जमाएं उन्होंने ही हमें सिखाया. वह कहते हमेशा कैमरा साथ रखा करो, जैसे वे पेंट-ब्रश साथ रखते थे."

सलामत ने हुसैन के साथ फ़िल्म ‘गजगामिनी’ के दौरान काम भी किया.

उस वक्त का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया, "तब मैं सेट पर प्रॉप्स संभालता था और एक दिन के 500 रुपए दिए जाते थे. तब मेरी ऊम्र 16 साल थी और जिस तरह से फिल्म इंडस्ट्री के लोग आते जाते रहते, दादा को जो सम्मान मिलता उससे मालूम होता कि लीजेंड कैसे होते हैं."

कला के विविध माध्यमों का अनुभव लेने के बाद सलामत ने फोटोग्राफ़ी को अपना क्षेत्र बनाया.

कैमरे से कारीगरी

दादा के साथ काम करने के क्रियात्मक अनुभव ने सलामत को ख़ूबसूरती परखने की नज़र दी जिसे वो अपनी तस्वीरों में इस्तेमाल करते हैं.

उनका कहना है, ''मुझे पेंटिंग पसंद है, दादा के काम का मैं बड़ा प्रशंसक रहा हूं. फोटोग्राफ़ी को पसंद करने से पहले मैंने सिरामिक्स, स्क्रीन प्रिंटिग, चारकोल स्केचिंग, बुक डिज़ाइन जैसै माध्यमों का अनुभव लिया. लेकिन फ्रेम में दृश्यों को को बांधना मुझे सबसे ज़्यादा एक्साईट करता था."

फ़िलहाल मुंबई में चल रही सलामत की प्रदर्शनी का शीर्षक '25 किलो' है क्योंकि सलामत के कैमरा उपकरणों का यही वज़न है.

इनके बगैर वह कहीं नहीं जाते क्योंकि वह कोई भी अच्छा फ्रेम छूटने नहीं देना चाहते. सलामत कहते हैं कि, ''मेरा कैमरा ख़ाली पड़ा रहे तो मुझे दिक्कत होती है, वही मेरी प्रेरणा है."

सलामत अपना ट्रैवल फोटोग्राफ़ी जारी रखेंगे. न्यूयॉर्क, लंदन, मुंबई जैसे महानगर, तुर्की, कंबोडिया, जैसे सांस्कृतिक शहर और ईस्ट अफ्रीका के ख़ूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों वाले शहर उन्हें बेहद पसंद हैं.

वे कहते हैं, "भले ही कुछ शहरों में मैं पहले जा चुका हुं लेकिन हर बार वहां नए फ्रेम मिलते हैं. पर्यटन ने मुझे नयापन, अवसर और रोमांच दिया है. मैं 25 किलो साथ के साथ यात्रा करुंगा क्योंकि दुनिया के कई किस्से, कहानियां और चहेरे मुझे ढूंढने हैं."

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