मर्दों को कमांडो ट्रेनिंग देनेवाली महिला
- Author, सुप्रिया सोगले
- पदनाम, बीबीसी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
ब्लैक बेल्ट हासिल करनेवाली डॉ. सीमा राव भारत की एकमात्र महिला कमांडो ट्रेनर हैं. उनकी ख़ासियत है "क्लोज़ क्वार्टर बैटल (सीक्यूबी)".
इसमें सैनिक 30 से 100 मीटर की दूरी के बावजूद हथियार या बिना हथियार, अकेले या टीम के साथ लड़ाई करते हैं.
पिछले 20 साल से ट्रेनिंग दे रहीं सीमा राव और उनके पति मेजर दीपक राव ने इस काम के लिए कभी सरकार से पैसे नहीं लिए.

इमेज स्रोत, Dr. Seema Rao
मुंबई में पली-बढ़ी डॉ. सीमा राव स्वतंत्रता सेनानी प्रोफेसर रमाकांत सीनरी की बेटी हैं.
जब वे स्कूल में थीं, तो शारीरिक रूप से कमज़ोर छात्रा थीं और अक्सर दूसरी छात्राओं की धौंस का शिकार होती थीं.
वे अपनी इस कमज़ोरी को दूर करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें मौक़ा नहीं मिला.
डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाक़ात उनके पति मेजर दीपक राव से हुई जो मेडिकल की पढ़ाई के साथ-साथ मार्शल आर्ट में दिलचस्पी रखते थे.
उनकी देखा-देखी सीमा ने भी मार्शल आर्ट सीखना शुरू किया और देखते-देखते कई एडवेंचर स्पोर्ट्स में पारंगत हो गईं.

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क़रीब 26 साल की उम्र में एक पुलिस अफ़सर ने उनके निहत्थे मुक़ाबले का कौशल देखा और पुलिस फ़ोर्स में प्रदर्शन के लिए निमंत्रण दिया.
फिर बतौर मेहमान ट्रेनर उन्हें भारत के कई फ़ोर्स से निमंत्रण आने लगे.
पति दीपक राव के साथ मिलकर वो अब तक क़रीब 20,000 भारतीय कमांडो सुरक्षाकर्मियों को ट्रेनिंग दे चुकी हैं जिसमें सेना, नौसेना, बीएसएफ़, असम राइफ़ल्स, एनएसजी, आईटीबीपी, मुंबई एंटी टेरेरिज्म स्क्वॉड और विभिन्न राज्यों की पुलिस में काम करनेवाले सुरक्षाकर्मी शामिल हैं.
आसान नहीं था ये सफ़र

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लेकिन एक महिला होने के नाते उनके लिए पुरुष प्रधान सुरक्षा बलों में ट्रेनिंग देना आसान नहीं था.
पुरूषों को एक महिला से सीखना अजीब ना लगे इसके लिए वो अक्सर शुरुआत में ही अपना कौशल दिखाकर साबित कर देती थीं कि वो उन्हें सिखाने के काबिल हैं.
हालाँकि 47 साल की डॉ. सीमा राव का ये सफर आसान नहीं था. वो दो बार गंभीर रूप से ज़ख़्मी हुईं. एक बार सिर पर चोट लगने से लगभग छह हफ़्तों के लिए उनकी याददाश्त चली गई और फिर कमर टूटने पर वो छह महीने के लिए अस्पताल में भी थीं.

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मुश्किलें सहीं लेकिन सरकार से पैसे नहीं लिए
डॉ. सीमा राव कहती हैं, "ये मेरे लिए सम्मान का काम है, एक कर्तव्य है. मैं देश के काम आ रही हूँ, उन जवानों के काम आ रही हूँ जो हमारी रक्षा करते है. ये मेरे पिता के लिए बहुत ही गर्व की बात थी."
ज़िंदगी के मुश्किल लम्हों को याद करते हुए डॉ. राव आगे कहती हैं, "एक समय ऐसा भी आया था जब हमारा दीवाला निकल गया था. घर चलाने तक के पैसे नहीं थे तब मैंने अपना मंगलसूत्र और सोने के गहने बेचे. हमने सरकार से पैसे इसलिए नहीं लिए क्योंकि ट्रेनिंग हमारा देश के प्रति कर्तव्य है. उसका पैसे से क्या मोल?"

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साल के आठ महीने ट्रेनिंग देने वाली डॉ. सीमा राव ने मातृत्व को त्याग दिया ताकि वो उनकी ट्रेनिंग के आड़े ना आए. पति मेजर दीपक राव ने इस फ़ैसले में उनका साथ दिया.
डॉ. सीमा राव अपने पिता के अंतिम संस्कार पर भी पहुँच नहीं पाई जिसका उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है.
वो कहती हैं कि, "उस समय मैं कोलकाता पुलिस को ट्रेनिंग दे रही थी. जब पिता के देहांत की ख़बर आई तो तीन दिन की ट्रेनिंग बाकी थी. मैंने तय किया कि बिना ट्रेनिंग ख़त्म किए मैं नहीं लौटूंगी और मुझे पता है कि इससे मेरे पिता को भी गर्व ही महसूस हुआ होगा."

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बढ़ती उम्र ने उनका हौसला कम नहीं किया है और अपने आपको मज़बूत रखने के लिए वो अक्सर अपने से आधे उम्र और दोगुने वज़न वाले लोगों से हाथापाई की ट्रेनिंग करती रहती हैं.
डॉ. सीमा राव का सपना है कि भारत का हर व्यक्ति देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाए और भारत की हर महिला अपने पैरों पर खड़ी हो सके.
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