बीएचयू मामले में भी ‘ब्लेम-गेम’ ही चलेगा या फिर कुछ हल निकलेगा?

- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, वाराणसी से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
बीएचयू में छात्रा के साथ छेड़छाड़ और उसके बाद हुए हंगामे का मामला अभी गर्म ही था कि इस बीच राज्य के तीन और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से ऐसी ही ख़बरें आ गईं.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और आईआईटी कानपुर से पिछले दो दिनों के भीतर कैंपस के अंदर छात्राओं से कथित छेड़छाड़ के मामले सामने आए हैं.
जहां तक बीएचयू की घटना का सवाल है, तो सरकार ने देर से ही सही जांच और कार्रवाई की शुरुआत की लेकिन यहां भी कुछ वैसा ही दिख रहा है जैसा कि पिछले छह महीने में कुछ अन्य गंभीर मामलों में देखने को मिला है.
उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा कहां?
पहली बात तो यह कि जिस महिला सुरक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने सरकार के बनते ही सक्रियता दिखाई, उसी मोर्चे पर वो बार-बार मात खा रही है. इस मामले में तो पुलिस वाले बिना किसी सरकारी आदेश के ही सक्रिय हो उठे.
ऐसा शायद ही कोई दिन बचा हो जब इससे जुड़ी कोई बड़ी ख़बर न आई हो.
सरकार बनी भी नहीं थी कि बीजेपी के घोषणा पत्र के मुताबिक जगह-जगह 'एंटी रोमियो दस्ते' खड़े कर दिए गए लेकिन महीने-दो महीने में ही उनका क्या हाल हुआ, ये किसी से छिपा नहीं है.
यही नहीं, केंद्र सरकार का भी 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे नारों पर कितना ज़ोर रहता है ये सरकारी विज्ञापनों में भले ही दिखता हो, सरकारों के क्रियान्वयन में इन नारों का खोखलापन ही नज़र आता है.
बीएचयू के विभिन्न छात्रावासों में रह रही छात्राओं का साफ़ कहना है कि उन्हें 'एंटी रोमियो दस्ते' तो कैंपस के आस-पास कभी दिखे नहीं.

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कहां गया एंटी रोमियो दस्ता?
वाराणसी की ही रहने वाली हरिश्चंद्र डिग्री कॉलेज की एक छात्रा आकृति का कहना था, "मेरे घर से कॉलेज की दूरी क़रीब सात किलोमीटर है. रास्ते में अभी तक मुझे कोई एंटी रोमियो दस्ता नहीं दिखा जबकि रास्ते में कई जगह ऐसे हैं जहां अकसर लड़कियां ख़ुद को सुरक्षित नहीं महसूस करतीं. शिकायत घर में भी करते हैं, फिर बात पुलिस तक पहुंचती है लेकिन पुलिस वालों के इतने सवाल होते हैं कि छात्राओं को चुपचाप बैठ जाना ही बेहतर लगता है."
ऐसा कहने वाली आकृति अकेली नहीं हैं बल्कि पिछले पांच-छह दिनों में जिन छात्राओं से भी बात हुई, लगभग सबकी राय एक जैसी थी. सरकार और प्रशासन महिला सुरक्षा के लिए ख़ुद को कटिबद्ध बताते हैं, लेकिन इसका हाल किसी से छिपा नहीं है. जहां तक कार्रवाई का सवाल है तो उसके लिए सिर्फ़ एक उदाहरण काफ़ी है कि बीएचयू में जिस छात्रा के साथ छेड़छाड़ हुई, एफ़आईआर दर्ज कराने के छह दिन बाद तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है.
वहीं इस मामले में बीएचयू प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक, सभी ज़िम्मेदारी को दूसरों पर टालने में लगे हैं. राज्य सरकार वैसे भी हर मामले को पिछली सरकारों पर थोपने की कोशिश में लगी रहती है.

आख़िर ज़िम्मेदारी किसकी?
इसी कड़ी में यहां भी सीधे तौर पर 'साज़िश' और बाहरी तत्वों को ज़िम्मेदार बताया जा रहा है. दिलचस्प ये है कि ये बात उप कुलपति से लेकर मुख्यमंत्री तक कह रहे हैं लेकिन ज़िला और पुलिस प्रशासन ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है.
सवाल उठता है कि यदि ये साज़िश थी और इसे बाहरी तत्व हवा दे रहे थे, तो इन तत्वों को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी थी? विश्वविद्यालय प्रशासन और ज़िला प्रशासन के बीच समन्यव की बेहद कमी है, ये बात वाराणसी के ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक स्वीकार कर चुके हैं. लेकिन ये कहकर हिंसा की ज़िम्मेदारी से वो बच जाएंगे, ऐसा भी नहीं है.

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बीएचयू की ज़िम्मेदारी भी कुछ है?
वाराणसी में वरिष्ठ पत्रकार और आईनेक्स्ट अख़बार के संपादक विश्वनाथ गोकरण कहते हैं, "बीएचयू की घटना में कोई बाहरी तत्व शामिल नहीं था, यहीं के ही लोग थे, चाहे वो कैंपस के भीतर के लोग हों या फिर बाहर के. ये कहना समझ से परे है कि जब तक विश्वविद्याल प्रशासन नहीं कहेगा तब तक कैंपस में ज़िला प्रशासन और पुलिस का हस्तक्षेप नहीं होगा. "
"अचानक कोई बड़ी घटना या आतंकी घटना हो जाए तो क्या पुलिस पहले विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति लेगी, तभी वहां पहुंचेगी? गंभीर मामलों में कुछ उसकी भी ज़िम्मेदारी है. अनुमति लेने की यदि ज़रूरत हो तो हरसंभव इसकी कोशिश करनी चाहिए. बीएचयू की घटना में पुलिस और प्रशासन की ओर से भी ऐसी कोई कोशिश नहीं हुई."
बीएचयू के छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में अध्यापकों के भी गुट बंटे हुए हैं और छात्रों को भी गुटबाज़ी में शामिल होने के लिए बाध्य किया जाता है. ऐसे में तमाम मामले होते हैं जहां छात्र अपनी समस्याओं पर भी एकराय क़ायम नहीं कर पाते हैं.
लेकिन इस घटना में एक बात साफ़ दिखी की अलग-अलग संगठनों से जुड़े छात्र भी 'महिला सुरक्षा' और 'विश्वविद्यालय की गरिमा' से जुड़े मुद्दे पर साथ दिख रहे हैं.
कहां से आए बाहरी तत्व?
कुछ छात्रों का साफ़ कहना था कि बाहरी तत्वों की बात ग़लत भी नहीं है लेकिन ये बाहरी तत्व दिल्ली और दूसरी जगहों से नहीं बल्कि यहीं से आते हैं.
विनय यादव शोध छात्र हैं. उनका कहना है, "परिसर के गेट पर ही यहां का सबसे बड़ा अस्पताल है और बीचों बीच बड़ा मंदिर. ये दोनों जगहें ऐसी हैं जहां आने से किसी को रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इतना तो ज़रूर किया जा सकता है कि परिसर में अन्य जगहों पर बाहरी लोगों को अनावश्यक रूप से जाने की अनुमति न हो."
तो, कौन बनेगा बलि का बकरा?
बहरहाल, जानकारों का कहना है कि इस मामले में भी गोरखपुर मेडिकल कॉलेज की तरह कुछ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई करके कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाएगी, 'बड़े लोगों' का कुछ नहीं होगा, 'ब्लेम-गेम' का खेल कुछ दिनों तक चलेगा और फिर कोशिश ये होगी कि लोग ये सब भूल जाएं.
लेकिन बीएचयू के छात्र-छात्राएं इस बात पर अड़े हैं कि जब तक उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं होती है और पीड़ित छात्रा को न्याय नहीं मिलता है, तब तक वो लोकतांत्रिक तरीक़े से लड़ते रहेंगे.
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