मैनपुरी का सरकारी अस्पतालः न डॉक्टर, न उपकरण फिर भी मरीज़ ख़ुश

- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी हिंदी
- प्रकाशित
उत्तर प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर बीबीसी की ख़ास सिरीज़ की पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि किस तरह आगरा में अस्पतालों का बाज़ार सा लगा है और वहां ठेके पर इलाज हो रहा है. दूसरी कड़ी में आपने फ़र्रुख़ाबाद के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की बदहाली देखी. इस तीसरी कड़ी में पढ़िए एक ऐसे सरकारी अस्पताल की कहानी जहां न पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही उपकरण लेकिन फिर भी लोग वहां इलाज कराकर ख़ुश हैं.
इस अस्पताल में न एक्सरे की सुविधा है और न ही कोई विशेषज्ञ डॉक्टर. बिना चारदीवारी के इस सरकारी अस्पताल से फिर भी मरीज़ ख़ुश होकर घर जाते हैं.
तो फिर मैनपुरी ज़िला मुख्यालय से करीब चालीस किलोमीटर दूर किशनी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ऐसा क्या है कि तमाम असुविधाओं और कमियों के बावजूद यहां रोज़ाना ढाई सौ से अधिक मरीज़ आते हैं?
यहां आए लोगों से बात करके पता चलता है कि अस्पताल के अधीक्षक शम्भू सिंह डॉक्टरों और उपकरणों की कमी के बावजूद मरीज़ों का तसल्ली-बख़्श इलाज करते हैं.
सिरीज़ की पहली कड़ीःआगरा का अस्पताल बाज़ार, जहां ठेके पर होती है डिलीवरी
सीरीज़ के दूसरी कड़ीःयहां 40 सेकंड में मरीज़ को 'निबटा' देते हैं डॉक्टर
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पहुंचने वाले अधिकतर मरीज़ ग़रीब तबके से हैं. निजी अस्पताल इनकी पहुंच से दूर हैं. सरकारी अस्पताल में एक रुपए की पर्ची बनती है और दवा फ्री मिलती है.
मुझे अस्पताल में ऐसा कोई मरीज़ नहीं मिला जिससे एक रुपए से अधिक लिए गए हों या जिसे दवाई के पैसे देने पड़े हों.
एक ही डॉक्टर!
साइकिल चलाकर क़रीब 12 किलोमीटर दूर से आए एक मरीज़ ने बताया कि उसके गांव के पास भी एक सरकारी अस्पताल है, लेकिन वो वहां से दवाई नहीं लेते क्योंकि वहां तैनात सरकारी डॉक्टर उससे सौ रुपए फ़ीस मांगते हैं.
एक महिला मरीज़ ने रुआंसी आवाज़ में बताया, "छोटे डॉक्टर ने कह दिया था कि अस्पताल बंद है कल आना, लेकिन बड़े डॉक्टर साहब ने दवा दी और इंजेक्शन लगाया. वो डॉक्टर साहब बहुत अच्छे हैं."
ये महिला, अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर शम्भू सिंह की बात कर रही थी जो चार साल से इस अस्पताल में तैनात हैं. वो यहां के एकमात्र एमबीबीएस डॉक्टर हैं.

डॉ शम्भू सिंह बताते हैं, "यहां दूर-दराज़ से मरीज़ आते हैं जिन्हें हम स्वास्थ्य सेवाएं देने की कोशिश करते हैं. ज़्यादातर मरीज़ मौसमी बीमारियों से ग्रसित होते हैं."
इस अस्पताल में न ही कोई विशेषज्ञ है और न ही कोई सर्जन. स्टाफ की भी कमी है.
शम्भू सिंह कहते हैं, "हमारे पास विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं. अल्ट्रासाउंड और एक्सरे की भी सुविधा नहीं है. यहां ईएनटी विशेषज्ञ, मेडिसिन विशेषज्ञ और सर्जन होने चाहिए लेकिन सरकार ने अभी नियुक्ति नहीं की है."
सीज़ेरियन की सुविधा नहीं
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हर महीने करीब तीन सौ डिलीवरी होती हैं, लेकिन यहां सीज़ेरियन की सुविधा उपलब्ध नहीं है.

जटिल मामलों को सैफ़ई के मेडिकल कॉलेज या ज़िला अस्पताल मैनपुरी रैफ़र कर दिया जाता है.
यूं तो ये ढाई लाख की आबादी के लिए सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है. लेकिन सरकार इसे किस तरह नज़रअंदाज़ कर रही है ये साफ़ नज़र आता है.
अस्पताल की चारदीवारी तक नहीं है. डॉ. शम्भू सिंह कहते हैं, "हमें लगता है कि सुरक्षा का इंतेज़ाम होना चाहिए. कई बार मरीज़ तकलीफ़ में होते हैं तो उनके परिजन हिंसक हो जाते हैं."
ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में डॉक्टर काम नहीं करना चाहते हैं क्योंकि यहां बिजली के अलावा बच्चों के लिए अच्छे स्कूल की भी समस्या रहती है.
अस्पताल में डॉक्टर, स्टाफ़ नर्स, वार्ड ब्वॉय से लेकर चपरासी तक के पद खाली हैं. लैब टेक्नीशियन भी नहीं हैं.

जिस सरकारी अस्पताल को ग़रीब मरीज़ उम्मीद की नज़र से देखते हैं सरकार ने उसकी अनदेखी कर रखी है.
सिर्फ़ उम्मीदें
शम्भू सिंह कहते हैं, "हम हर स्तर पर अपनी ज़रूरतों को उठाते हैं. हम बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि सरकार क़दम उठाएगी."
स्थानीय पत्रकार अनिरुद्ध दुबे कहते हैं, "इस अस्पताल में मरीज़ों को इलाज मिलता है लेकिन डॉक्टरों की भारी कमी है. ज़रूरत पड़ने पर विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हो पाते और मरीज़ों को इधर-उधर भटकना पड़ता है."
अनिरुद्ध दुबे कहते हैं, "इस अस्पताल में छोटी मोटी बीमारियों का इलाज हो जाता है. लेकिन ये क्षेत्र का सबसे बड़ा अस्पताल है और यहां सुविधाएं उसी हिसाब से होनी चाहिए."
मैंने जब ये सवाल शम्भू सिंह से किया तो उन्होंने कहा, "हमारे पास जो संसाधन हैं हम उनमें बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. संसाधन मुहैया कराना सरकार का काम है. हमारा काम बस अपनी ड्यूटी करना है जो हम कर रहे हैं."
किशनी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से निकलते वक़्त मेरे मन में यही सवाल कौंध रहा था कि अगर ये सरकारी अस्पताल न हो तो फिर ग़रीबों का क्या हो?
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