जनरल भगत जिन्हें बनना चाहिए था भारत का सेनाध्यक्ष

जनरल प्रेम भगत
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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

यूं तो भारतीय सेना ने कई साहसी जनरल पैदा किए हैं, लेकिन शारीरिक और नैतिक साहस का सम्मिश्रण बहुत कम सेनानायकों में रहा है. जनरल प्रेम भगत उनमें एक थे.

वे भारतीय सेना का सर्वोच्च पद कभी नहीं पा सके, लेकिन अगर कोई एक शख़्स भारतीय सेनाध्यक्ष बनने का हक़दार था, तो वो थे जनरल प्रेम भगत.

वर्ष 1941 में सूडान के मोर्चे पर उन्होंने लगातार 96 घंटे जागकर 55 मील लंबी सड़क पर 15 बारूदी सुरंगें नष्ट कीं, जिसके लिए उन्हें उस समय का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस दिया गया.

उनकी बेटी और 'विक्टोरिया क्रॉस-ए लव स्टोरी' की लेखिका अशाली वर्मा कहती हैं, "उनकी सोच थी कि नौजवान उनके साथ लड़ रहे थे और जिनकी लड़ाई में मौत हो गई थी, उनको ये सम्मान मिलना चाहिए था. इसीलिए वह इस बारे में कभी बात नहीं करते थे. हम जब बड़े हो रहे थे तो हमें पता नहीं था कि उन्हें ये पदक मिला था. दूसरों से और पढ़कर हमें इस बारे में पता चला."

अशाली बताती हैं, "उनका मानना था कि ये उनका कर्तव्य था कि वह चार दिन बिना सोए 55 मील लंबी सड़क पर बिछाई गए बारूदी सुरंगें हटाएं. वहीं एक विस्फोट में उनके कान का पर्दा फट गया और वो ताउम्र एक कान से नहीं सुन पाए. भारत वापस आने पर राष्ट्रपति भवन के सामने उस समय के वॉयसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 2000 लोगों के सामने उन्हें विक्टोरिया क्रॉस प्रदान किया."

भारत-चीन युद्ध पर रिपोर्ट

प्रेम भगत की बेटी अशाली वर्मा
इमेज कैप्शन, प्रेम भगत की बेटी अशाली वर्मा बीबीसी के दिल्ली स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ

जनरल भगत ने इसके बाद नाम कमाया जब भारत-चीन युद्ध के बाद उन्हें इस लड़ाई में भारत की हार की जांच के लिए बनाई गई हेंडरसन भगत कमेटी का सदस्य बनाया गया.

उन्होंने इतनी बेबाक रिपोर्ट पेश की कि उसे आज तक भारत सरकार सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है.

दरियादिली

जनरल अब्दुल हमीद ख़ान से मिलते हुए जनरल प्रेम भगत.
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के जनरल अब्दुल हमीद ख़ान से मिलते हुए जनरल प्रेम भगत

जनरल भगत का जुनून था भारतीय सैनिकों और अफ़सरों की बेहतरी के लिए काम करना. जनरल भगत पर किताब लिखने वाले मेजर जनरल बताते हैं कि 1970 में जालंधर में एक नवविवाहित कैप्टन अपनी पत्नी को वहां इसलिए नहीं बुला पाया क्योंकि वहां मकानों की कमी थी.

उनके सीओ ने उन्हें सलाह दी कि वे कोर कमांडर भगत से मिलें. जब वो जनरल भगत से मिलने पहुंचे तो उन्होंने उन्हें चाय पिलाई. उनकी बात सुनते ही अपने एडीसी से कहा कि मकान अलॉट करने वाले स्टेशन कमांडर और ब्रिगेडियर को बुला लें.

जब वो दोनों अफ़सर वहां पहुंचे तो उन्होंने उनसे पहला सवाल यही पूछा कि क्या आपके पास रहने के लिए घर है. उन्होंने जवाब दिया, जी हां. जनरल ने फिर पूछा कि तब इस नवविवाहित अफ़सर को घर क्यों आवंटित नहीं किया गया है?

कमांडर ने जवाब दिया कि घरों की कमी है.

जनरल भगत का जवाब था, "अगर कल लड़ाई होती है तो ये युवा अफ़सर युद्धभूमि पर जाएंगे. हम और आप कोर मुख्यालय पर बैठकर अपने अंगूठे से खेल रहे होंगे. अगर आपके पास मकान नहीं हैं तो किराए पर लीजिए. अगर इस शख़्स को अगले हफ़्ते तक घर न मिला तो मैं आपके घर का आवंटन कैंसिल कर इन्हें दे दूंगा.."

एडीसी को अपने सैलून में सुलवाया

राष्ट्रपति राधाकृष्णन, जनरल भगत, अशाली वर्मा
इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति राधाकृष्णन के साथ जनरल भगत और उनकी बेटी अशाली वर्मा

उनकी उदारता का एक और उदाहरण देते हैं मेजर जनरल अनिल रायकर. रायकर पांच साल तक उनके एडीसी रहे.

जनरल भगत को जब कहीं दूसरे शहर जाना होता था तो वो अपने रेलवे सैलून से यात्रा करना पसंद करते थे.

उसमें जनरल के लिए एक बेडरूम होता था और एडीसी के लिए छोटा कमरा. एक बार श्रीमती भगत उनके साथ सफ़र नहीं कर रही थीं, जबकि रायकर अपनी पत्नी के साथ ट्रेन में उनके साथ थे.

रात को रायकर ने उसी ट्रेन में बगल के डिब्बे में जाने की इजाज़त मांगी तो जनरल भगत ने कहा कि तुम दोनों मेरे बेडरूम में क्यों नहीं सो जाते. मैं चूँकि अकेला हूँ तो मैं आपके कमरे में सो जाऊंगा. एडीसी अनिल रायकर ने बहुत मना किया लेकिन जनरल भगत नहीं माने.

अगले दिन जब ट्रेन अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची तो उनको स्टेशन पर लेने आए अफ़सर ये देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि जनरल भगत तो एडीसी के कमरे में बैठे हैं और उनके बेडरूम से उनके एडीसी अनिल रायकर निकल रहे हैं. उनकी परेशानी को और बढ़ाते हुए जनरल भगत ने मज़ाक किया, "देखिए मेरे एडीसी ने मुझे मेरे ही बेडरूम से बाहर निकाल दिया."

दंगापीड़ितों को शरण

1964 में जनरल प्रेम भगत की कोलकाता तैनाती के दौरान वहां हिंदू-मुस्लिम दंगा हो गया.

उनकी बेटी अशाली वर्मा कहती हैं, "हम लोग अपनी बालकनी पर खड़े थे. अचानक हमने देखा कि अलीपुर में हमारे घर के आसपास मुसलमानों की झुग्गियों में आग लगाई जाने लगी. मेरे पिता ने तुरंत अपने बंगले का गेट खुलवाया और जल रही झुग्गियों से बचकर भागे करीब 200 मुसलमानों को अपने यहां शरण दी. उन्होंने उनके खाने-पीने का भी इंतज़ाम किया और तब तक अपने घर में रखा जब तक उनके यहां का माहौल रहने लायक नहीं हो गया."

बाढ़ रोकने का नायाब तरीक़ा

लॉर्ड लिनलिथगो, जनरल भगत
इमेज कैप्शन, लॉर्ड लिनलिथगो से विक्टोरिया क्रॉस ग्रहण करते जनरल भगत

आमतौर से जनरल अपना लोहा युद्ध के मोर्चे पर मनवाते हैं, लेकिन जनरल भगत ने उस समय लखनऊ शहर को गोमती नदी की बाढ़ से बचाया जब वो वहां के कोर कमांडर थे.

मेजर जनरल वीके सिंह याद करते हैं कि जब लखनऊ में गोमती का पानी ख़तरे से बहुत ऊपर चला गया, तो वे खुद वहां पहुंचे जहां बढ़े हुए पानी को सीमेंट की बोरियों से पाटने की कोशिश हो रही थी.

उन्होंने देखा कि इसका कोई असर नहीं हो रहा था. उन्होंने वहीं आदेश दिया कि सीमेंट की बोरियों से भरे ट्रकों को पानी में गिरा दिया जाए. उन्होंने एक के बाद एक तीन ट्रक पानी में गिरवाए, जिससे बढ़े हुए पानी का बहाव रुक गया.

लखनऊ के लोग अब तक जनरल भगत की उस अक्लमंदी को याद करते हैं.

'दम मारो दम' गाने के शौकीन

इंदिरा गांधी के साथ जनरल भगत
इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी के साथ जनरल भगत

जनरल प्रेम भगत को संगीत और नाचने का बहुत शौक था. उनके एडीसी अनिल रायकर याद करते हैं कि उनके पास एक ट्रांजिस्टर होता था जिससे वो विविध भारती और रेडियो सीलोन पर गाने सुना करते थे.

अशाली वर्मा कहती हैं कि उनको ज़ीनत अमान पर फ़िल्माया गया गाना 'दम मारो दम' बहुत पसंद था और वह अक्सर उसे गाया करते थे.

सेनाध्यक्ष का पद नहीं

वे भारतीय सेना के सबसे वरिष्ठ जनरल थे और माना जा रहा था कि वही अगले सेनाध्यक्ष होंगे लेकिन तत्कालीन सरकार ने उस समय सेनाध्यक्ष के पद पर काम कर रहे जनरल बेवूर को एक साल का सेवा विस्तार दे दिया और जनरल भगत के हाथ से सेनाध्यक्ष बनने का मौका जाता रहा.

उनके साथ काम कर चुके भारत के पूर्व उपसेनाध्यक्ष जनरल एस के सिन्हा कहते हैं कि इस फ़ैसले से पूरी आर्मी में दुख का माहौल छा गया.

''मगर जिस तरह उन्होंने इस साज़िश का सामना किया वह सराहनीय था. इसको मैं साज़िश इसलिए कहता हूँ क्योंकि जनरल बेवूर को जानबूझ कर एक्सटेंशन दिया गया ताकि जनरल भगत को रिटायरमेंट पर जाना पड़े. अगर ऐसा न होता तो वे चीफ़ बनते और पूरी सेना उम्मीद कर रही थी कि वही चीफ़ बनेंगे."

राजनीतिक तौर पर समझा जा रहा था कि जनरल भगत हेडस्ट्रॉन्ग हैं और शायद सरकार की हर बात नहीं मानेंगे. दूसरी तरफ़ नौकरशाह उनसे बहुत डरते थे. उनका मानना था कि अगर वे सेनाध्यक्ष बनते हैं तो उनका दबदबा कम हो जाएगा.

अंधेरे से लड़ाई

जनरल प्रेम भगत और उनकी पत्नी मोहिनी
इमेज कैप्शन, जनरल प्रेम भगत और उनकी पत्नी मोहिनी

इसके बाद जनरल प्रेम भगत को उस समय की सबसे बीमार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी दामोदर वैली कॉरपोरेशन का प्रबंध निदेशक बनाया गया.

वहां भी उन्होंने अपना लोहा मनवाया. सिर्फ़ 10 महीनों के अंदर उन्होंने कंपनी की बिजली पैदा करने की क्षमता 45 मेगावाट से बढ़ाकर 700 मेगावॉट करवा दी. जनरल भगत के लिए देशहित सर्वोपरि था.

इसके बाद उनके लोगों का हित आता था और उनका अपना हित सबसे बाद में आता था.. हमेशा और हर बार!

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