सेना की मदद नहीं लेंगे: पिल्लई

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, छत्तीसगढ़
- प्रकाशित
केंद्रीय गृह सचिव जी के पिल्लई ने कहा है कि नक्सलियों से निपटने में तीन से सात साल लग सकते हैं लेकिन इसमें सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.
गृह सचिव ने नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ राज्य के अपने दौरे के क्रम में सोमवार को राजनांदगांव और कांकेर जिलों का दौरा किया. सुरक्षा कारणों से उनके कार्यक्रम को गुप्त रखा गया है.
सूत्रों का कहना है कि पिल्लई जगदलपुर और दंतेवाड़ा जिलों का भी दौरा करेंगे. वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा गृह सचिव बस्तर संभाग में तैनात केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बल के जवानों और अधिकारियों से भी विचार विमर्श करेंगे.
दौरे के दौरान पिल्लई ने कहा कि छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या से निपटने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल मुहैया कराए जाएंगे. उन्होंने कहा, "नक्सलवाद से निपटने के लिए पुलिस को अन्य विभागों के साथ भी सामंजस्य बनाना पड़ेगा. नक्सल समस्या काफी गंभीर है और इससे रातोंरात निपटा नहीं जा सकता."
उन्होंने कहा, "नक्सलियों पर काबू पाने में तीन से सात साल लग सकते हैं. लेकिन इस काम में सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा."
बलि का बकरा
छत्तीसगढ़ में बढ़ रही नक्सली हिंसा को देखते हुए पिल्लई के दौरे को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अभी तक हुए नक्सली हमलों में सबसे ज्यादा नुक़सान अर्द्ध सैनिक बल के जवानों को उठाना पड़ा है.
केंद्रीय बलों के जवानों को हो रही क्षति के बीच छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के बयान से केंद्र और राज्य के रिश्तों में दरार पड़ती दिखाई दी. हालांकि विश्वरंजन अपने बयान से पीछे हट गए. लेकिन उनके बयान ने यह बहस छेड़ दी कि छत्तीसगढ़ के बीहड़ों और जंगलों में तैनात किये जा रहे अर्द्ध सैनिक बल के जवानों को कहीं बलि का बकरा तो नहीं बनाया जा रहा है.

राज्य के बस्तर संभाग तो एक तरह से रणभूमि में तब्दील हो गया है. शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रता हो जब यहाँ कोई नक्सली वारदात नहीं होती हो. युद्ध की रेखाएं साफ़ खींची हुईं हैं. यहाँ परिस्थितियां ऐसी हैं कि कोई किसी पर भरोसा नहीं कर सकता. ज़्यादातर इलाकों में बारूदी सुरंगों का जाल बिछा हुआ है.
इस इलाके में मौत आसान है मगर ज़िन्दगी काफी मुश्किल. इस संभाग का चालीस हज़ार वर्ग किलोमीटर का इलाका ऐसा है जहाँ सरकारें पहुँच नहीं पाईं हैं. यहाँ पर माओवादियों की समानांतर हुकूमत चलती है.
बीहड़ों में सुरक्षा बलों के कैंप तो ज़रूर लगाए गए हैं मगर कोई बड़ी घटना होने पर इन इलाकों में मदद पहुंचाना बहुत मुश्किल काम है. मिसाल के तौर पर जब पिछले छह अप्रैल को चिंतलनार में सीआरपीएफ के जवानों पर हमला हुआ था तो वहां कई घंटों के बाद ही अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे जा सके.
हमले में 75 जवान मारे गए थे.
दोरनापाल से लेकर चिंतलनार तक
कहा जाता है कि इस इलाके में 80 किलोमीटर की कच्ची सड़क पर मौत बिछी हुई है. इस सड़क पर केंद्रीय बलों के कैंप ज़रूर बनाए गए हैं मगर दहशत का आलम यह है कि जवान कैम्पों में ही सिमटे रहते हैं. स्थिति यह है कि इस कैंप में ज़रुरत का सामान हेलीकाप्टर से भेजा जाता है वह भी तीन महीनों में एक बार.
हाल ही में सीआरपीएफ की तरफ से सुझाव आया कि कुछ एक कैम्पों को बीहड़ों से हटाकर उन्हें हाईवे पर स्थानांतरित किया जाए. कहा जा रहा है कि पिल्लई के दौरे में इन सारे बिन्दुओं पर चर्चा की जाएगी.

























