नीतीश के लिए भागलपुर नाक की लड़ाई

- Author, अमरेश द्विवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार से
- प्रकाशित
एक नवंबर को चौथे चरण के मतदान के लिए जम कर चुनाव प्रचार चल रहा है. सभी दलों के दिग्गज नेताओं ने अपने-अपने उम्मीदवारों के प्रचार में पूरी ताक़त झोंक दी है.
इस दौर में बिहार के आठ ज़िलों की 42 सीटों पर मतदान होना है. इन 42 सीटों में से सात सीटें भागलपुर ज़िले की हैं.
पिछले चुनाव में भागलपुर की सात सीटों में से पांच पर एनडीए और दो पर आरजेडी ने जीत हासिल की थी. लेकिन इस बार एनडीए के सामने नाक बचाने की चुनौती है.
अगर हम भागलपुर की बात करें तो परंपरागत रूप से ये बीजेपी की सीट रही है. इस सीट पर 1990 से ही बीजेपी का क़ब्ज़ा है. नीतीश सरकार में मंत्री अश्विनी कुमार चौबे पिछले तीन बार से यहां से चुनाव जीतते आ रहे हैं.
लेकिन इस बार उनका मुख्य मुकाबला बीएसपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए अजीत शर्मा से है.
भूमिहार, ब्राह्मण, वैश्य और मुसलमान बहुल आबादी वाली इस सीट पर इस बार टक्कर कांटे की है क्योंकि विपक्ष में रहते हुए अश्विनी चौबे की छवि ये थी कि जनता के हक़ की लड़ाई के लिए वो हमेशा धरने पर बैठ जाया करते थे, लेकिन जब से मंत्री बने हैं उनका ध्यान भागलपुर पर कम हो गया है.
इन दोनों उम्मीदवारों के अलावा शहर की मेयर बीना यादव के पति एनके यादव भी एक प्रबल उम्मीदवार हैं जो वोट काटने की भूमिका निभा सकते हैं.
कहलगांव और नाथनगर
लेकिन भागलपुर से सटे कहलगांव में जेडीयू की सीट इस बार ख़तरे में नज़र आ रही है. कहलगांव से पांच बार एमएलए, मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष रहे कांग्रेस के सदानंद सिंह को इस बार जेडीयू की उम्मीदवार कहकशां परवीन की तुलना में तगड़ा समर्थन मिलता नज़र आ रहा है.
कहलगांव के एनटीपीसी प्लांट के आसपास रहने वाले ज़्यादातर लोग इस बार जेडीयू की उम्मीदवार कहकशां परवीन से तो ख़ुश हैं लेकिन उनकी नाराज़गी नीतीश सरकार को लेकर है.
वहां के लोगों का कहना है कि नीतीश की विकास की लहर कहलगांव तक नहीं पहुंची है और कहलगांव के पावर प्लांट के विस्थापितों को आज भी उनका हक़ नहीं मिला है.
लेकिन तुलनात्मक रूप से शहरी वोटरों की इस सोच का कहलगांव के चुनावी नतीजे पर कितना असर होगा ये वहां की बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी के फ़ैसले से तय होगा क्योंकि ग्रामीण मतदाता का रुझान साफ़ नहीं है और आने वाले तीन दिनों में काफ़ी वोट इधर-उधर हो सकते हैं.
कहलगांव से ही सटी हुई विधानसभा सीट है नाथनगर. नए परिसीमन के बाद सबौर का आधा क्षेत्र इसमें शामिल हो जाने से यहां चुनाव का समीकरण बदल गया है क्योंकि चुनाव में अहम भूमिका निभानेवाली गंगौता जाति की बहुसंख्यक आबादी अब नाथनगर में शामिल हो गई है.
यहां से जेडीयू के उम्मीदवार और कहलगांव के पूर्व विधायक अजय कुमार मंडल को पूरा भरोसा है कि जनता उन्हें चुनेगी लेकिन आरजेडी के अबू क़ैसर और कांग्रेस के परवेज़ जमाल उन्हें कड़ी टक्कर देते नज़र आ रहे हैं.
गोपालपुर और सुल्तानगंज

भागलपुर की गोपालपुर और सुल्तानगंज सीटें पिछले चुनाव में जेडीयू ने जीती थीं, इस बार पार्टी ने गोपालपुर से तो मौजूदा विधायक नरेंद्र कुमार नीरज को ही टिकट दिया है लेकिन सुल्तानगंज से टिकट सीपीएम छोड़कर आए सुबोध राय को दिया गया है.
गोपालपुर में इस बार भी नरेंद्र कुमार नीरज की टक्कर आरजेडी के अमित राणा से ही है लेकिन सुल्तानगंज में सुबोध राय की राह आसान नहीं लगती.
सुल्तानगंज एक धार्मिक महत्व वाली सीट है जहां भूमिहार और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. सुल्तानगंज को पर्यटन स्थल बनाने और देवघर मेले को राष्ट्रीय मेले का दर्जा देने की मांग लंबे समय से की जा रही है.
यहां से कांग्रेस उम्मीदवार सुरेश मोहन झा किसानों के हित को मुद्दा बना कर चुनाव प्रचार कर रहे हैं, लेकिन सुरेश मोहन झा और सुबोध राय की कांटे की टक्कर में वोट को प्रभावित करने का काम आरजेडी के रामावतार मंडल भी कर सकते हैं.
पीरपैंती और बिहपुर
इन पांच सीटों के बाद नंबर आता है पीरपैंती सुरक्षित और बिहपुर सीट का जिनपर पिछले चुनाव में आरजेडी को जीत हासिल हुई थी.
पीरपैंती में इस बार त्रिकोणीय संघर्ष है बीजेपी के अमन पासवान, कांग्रेस के दीपनारायण पासवान और आरजेडी के रामविलास पासवान के बीच टक्कर है.
उधर बिहपुर में आरजेडी के मौजूदा विधायक शैलेश कुमार उर्फ़ बूलो मंडल की एक बार फिर बीजेपी के उम्मीदवार इंजीनियर शैलेंद्र से कांटे की टक्कर है.
लेकिन जीत किसकी होगी ये इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस उम्मीदवार अशोक कुमार यादव दोनों उम्मीदवारों के वोट में कितनी सेंध लगाते हैं.

























