आरोप पत्र में बार-बार आरएसएस का नाम

अजमेर धमाके पर आए चार्जशीट में भारत के धार्मिक स्थलों पर हमले में पकड़े गए समूह के सदस्यों को 'हिन्दू आतंकवादी' के नाम से संबोधित किया गया है.
पुलिस की शब्दावली में ये एक नया नाम है और इस शब्द को लेकर व्यापक राजनीतिक विवाद हो चुका है.
पुलिस जाँच के मुताबिक़ इस समूह के सदस्यों ने लक्ष्य भले ही दूर-दूर के रखे हों, मगर कथित हमले के लिए तैयारी के तौर पर बैठकों के लिए इन्होंने गुजरात, मध्य पदेश और राजस्थान को चुना.
कई प्रमुख बैठकें झारखण्ड के जामताड़ा ज़िले में हुईं. झारखण्ड में इस दौरान भले ही सरकारें बदलती रहीं.
अजमेर विस्फोट मामले में अदालत में दाख़िल आरोप पत्र के प्रारंभिक प्रमुख 48 पन्नों में कोई बीस से ज़्यादा बार हिन्दू संगठन आरएसएस का नाम है.
आरएसएस ने ऐसी किसी घटना के पीछे अपना हाथ होने से इनकार किया है और आरएसएस का नाम शामिल किए जाने को कांग्रेस की साज़िश बताया है.
आरोप पत्र

आरोप पत्र में जिन गिरफ़्तार तीन लोगों का उल्लेख है, उनमें से पुलिस ने देवेन्द्र गुप्ता को आरएसएस का 'विभाग प्रचारक', चंद्रशेखर को मध्य प्रदेश में शाजापुर ज़िले में आरएसएस का ज़िला संपर्क प्रमुख और लोकेश शर्मा को इंदौर में आरएसएस का कार्यकर्ता बताया है.
पुलिस के मुताबिक़ अभी कुछ लोग फ़रार हैं.
पुलिस की सूची के मुताबिक़ इनमें रामजी कलसंगरा हैं जो इंदौर में आरएसएस के प्रमुख पदाधिकारी थे जबकि संदीप डागे भी वांछित हैं. उन्हें इंदौर में आरएसएस का प्रचारक बताया गया है.
पुलिस के अनुसार इसमें स्वर्गीय सुनील जोशी एक प्रमुख सूत्रधार थे. वो धमाकों को अंजाम देने के लिए अजमेर भी आए थे.
पुलिस ने जोशी को आरएसएस का अहम कार्यकर्ता बताया है.
मध्य प्रदेश पुलिस के मुताबिक़, स्वर्गीय जोशी की 29 दिसंबर 2007 को संदिग्ध हालात में देवास में हत्या कर दी गई थी.
इस घटना के बाद से उनके साथ रहने वाले चार लोग- मेहुल, राज, घनश्याम और उस्ताद ग़ायब हैं.
किसी को ये भी नहीं पता कि वो कौन थे, कहाँ से आए और कहाँ चले गए.
राजस्थान पुलिस का कहना है कि वो उनका पता लगा रही है.
जयपुर में
पुलिस कहती है कि ऐसी ही एक बैठक जयपुर में गुजराती गेस्ट हाउस में हुई जहाँ आरएसएस के नेता इन्द्रेश कुमार ने इस समूह को सम्बोधित किया.
पुलिस पड़ताल के अनुसार ऐसे विस्फोट करने के विचार का बीजारोपण 2004 के अप्रैल-मई महीनों में उज्जैन में हुए सिंहस्थ कुँभ में इस समूह की बैठक में हुआ.
ये इस कड़ी की पहली बैठक थी और स्वामी असीमानंद ने इस बैठक का नेतृत्व किया.

इस बैठक में हिन्दू धर्म स्थलों पर हमले की घटनाओं का जवाब देने का फ़ैसला किया गया.
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, "इस बैठक में कहा गया कि पहले अमरनाथ, फिर अक्षरधाम और उसके बाद जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर मुसलमान आतंकवादी हमले कर रहे है."
इन बैठकों का सिलसिला लगातार चलता रहा और 2005 में जयपुर में बैठक में इन तैयारियों का जायज़ा लिया गया.
इसमें पुलिस के मुताबिक़ आरएसएस नेता इन्द्रेश भी मौजूद थे.
सबरी मेला
आरोप पत्र में दिए गए विवरण के अनुसार फ़रवरी 2006 में गुजरात के डांग ज़िले में असीमानंद ने तीन दिन का सबरी मेले का आयोजन किया था.
समूह के लोग व्यवस्था के नाम पर कुछ दिन पहले पहुँच गए.
आरोप पत्र में कहा गया है कि इसी दौरान असीमानंद ने इन लोगों की एक गोपनीय बैठक ली, जिसमें स्वर्गीय सुनील जोशी, प्रज्ञा सिंह, रामजी और सभी ख़ास लोग मौजूद थे.
आरोप पत्र के अनुसार मार्च 2006 में फिर रामजी के घर इंदौर में एक बैठक हुई . मगर इसके बाद मार्च, 2007 को झारखण्ड के मिहिजाम में जो बैठक हुई वो निर्णायक मानी गई है.
इसमें प्रज्ञा सिंह, रामजी कलसांगरे, संदीप डागे, देवेन्द्र, लोकेश और ये सभी लोग मौजूद थे.
उधर आरएसएस के एक नेता ने बीबीसी से कहा कि संघ हिंसा के किसी काम में ना तो विश्वास करता है और ना ही ऐसी घटनाओं में उसका हाथ है

























