छत्तीसगढ़ में मलेरिया से अनेक मौतें

अधिकारियों का कहना है कि मलेरिया से कितनी मौतें हुईं हैं और उसकी जांच हम कर रहे हैं
इमेज कैप्शन, अधिकारियों का कहना है कि मलेरिया से कितनी मौतें हुईं हैं और उसकी जांच हम कर रहे हैं
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रायपुर
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पिछले दस दिनों में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मलेरिया से 28 लोगों के मरने की आशंका के बाद वहां राहत कार्य तेज़ कर दिए गए हैं.

सौ से ज्यादा लोग इस इलाक़े में पीड़ित बताए जाते हैं. खबरें मिल रहीं हैं कि मरने वालों में ज़्यादातर बच्चे हैं और ये सभी लोग आदिवासी समुदाय से हैं. वहीं राज्य के राजनंदगांव में भी मलेरिया से हालात बेकाबू होते नज़र आ रहे हैं. यहाँ भी सैकड़ों लोग मलेरिया की चपेट में बताए जा रहे हैं. हलाकि अभी तक मलेरिया से हुई मौतों पर सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है मगर जंगल के इलाक़ों में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.

संपर्क करने पर बिलासपुर के मलेरिया अधिकारी डा एसके लाल ने मलेरिया से हुई मौतों पर अपनी अनभिज्ञता ज़ाहिर की है. उनका कहना है कि जांच किए बिना नहीं बताया जा सकता कि कितनी मौतें मलेरिया से हुईं हैं. उनका कहना है कि वो मामले की जांच कर रहे हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "कितनी मौतें हुईं हैं और उसका कारण क्या है, इसकी जांच हम कर रहे हैं. अभी कहा नहीं जा सकता कि मलेरिया से कितने लोग मरे हैं."

जंगल में प्रकोप

डॉक्टर लाल का कहना है कि मलेरिया का प्रकोप पेंड्रा के इलाके में ज्यादा है. उनका कहना है कि पेंड्रा के डोरिल्ला, मझगावा, बड़गवा और कोदगार इलाक़े में मलेरिया का प्रकोप ज्यादा है चूँकि यह इलाक़ा जंगलों से घिरा है. लाल ने कहा, "अमूमन धान की कटाई के दौरान मलेरिया का प्रकोप होता है मगर इस बार बारिश भी देर तक होती रही इसलिए मलेरिया का प्रकोप ज्यादा है.'' जिला मलेरिया अधिकारी के अनुसार बिलासपुर के पेंड्रा के इलाके में कुल 14 स्वस्थ्य कैंप लगाए गए हैं जहाँ लोगों को मलेरिया निरोधक दवाइयां दी जा रहीं हैं. राज्य के स्वास्थ्य सचिव विकासशील ने कहा कि वैसे अक्तूबर से ही राज्य में मलेरिया का प्रकोप बढ़ जाता है मगर इस बार ज्यादा बारिश की वजह से मलेरिया के ज्यादा मामले होने कि आशंका थी.

विकासशील का कहना था कि वो इस वक़्त दिल्ली में हैं और लौट कर मामले की समीक्षा करेंगे. मलेरिया के मामले में छत्तीसगढ़ को सबसे संवेदनशील माना जाता है क्योंकि यहाँ के ज़्यादातर इलाके घने जंगलों से ढके हैं. बहुत सारे इलाके दुर्गम भी हैं.

मिसाल के तौर पर बस्तर संभाग का इलाका जहाँ के कांकेर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बस्तर और बीजापुर जिलों के कई ऐसे गाँव हैं जहाँ पहुंचा नहीं जा सकता है. नक्सली हिंसा के मद्देनज़र भी बस्तर काफ़ी संवेदनशील है मगर इन इलाकों में नक्सली हिंसा में कम और मलेरिया के प्रकोप से मरने वालों कि संख्या ज्यादा है.

राजनंदगांव के बीरसिंहटोला और कुम्हली के 29 मरीजों को जिला अस्पताल में भरती कराया गया है. इनमे से कुछ की हालत चिंता जनक है.

राजनंदगांव के सिविल सर्जन एमके दिवाकर का कहना है कि प्रभावित इलाकों में दवाइयां पहुंचाई जा रहीं हैं.