करूणानिधि का अंतिम युद्ध

करूणानिधि और स्टालिन
इमेज कैप्शन, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करूणानिधि और उनके बेटे और उपमुख्यमंत्री एम स्टालिन
    • Author, उमर फ़ारूक़
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, चैन्नई
  • प्रकाशित

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम के नेता मुत्तुवेलु करूणानिधि के लिए 2011 का विधान सभा चुनाव उनके लगभग पैंसठ साल लंबे राजनीतिक जीवन की आख़िरी चुनावी लड़ाई है.

86 वर्षीय नेता का स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि वे नेतृत्व की ज़िम्मेदारी लंबे समय तक संभाल सकें.

अपने पारंपरिक विरोधी अन्ना डीएमके के ख़िलाफ़ यह ताज़ा लड़ाई चाहे वे जीत भी जाएँ लेकिन यह भी तय है कि द्रविड़ आंदोलन और राजनीति के इस सबसे दिग्गज नेता के लिए आगे भी कई मोर्चों पर चुनौतियों का सिलसिला जारी रहेगा.

एक ओर 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला उनके राजनीतिक भविष्य और विशेषकर उनके कुछ परिवारजनों के लिए समस्याएँ पैदा कर सकता है.

इस घोटाले में डीएमके के एक मंत्री ए राजा की गिरफ़्तारी के बाद सीबीआई की छान-बीन का रुख़ अब करूणानिधि की एक पत्नी दयालु अम्मल और पुत्री और राज्यसभा सदस्या कनिमुझी की ओर मुड़ गया है.

ऐसा संदेह जताया जा रहा है कि इस घोटाले से मिलने वाला पैसा करूणानिधि परिवार के कलइगार टीवी चैनल में लगाया गया.

इस चैनल में दयालु अम्मल का 60 प्रतिशत और कनिमुझी का 20 प्रतिशत हिस्सा है. सीबीआई इन दोनों से पूछताछ कर चुकी है और आगे भी यह सिलसिला चलता रहेगा.

विरासत के दावेदार

दूसरी ओर करूणानिधि को अपने परिवार के अंदर इस सवाल पर कश्मकश का सामना करना पड़ेगा कि उनकी राजनीतिक विरासत किसको मिलनी चाहिए.

हालाँकि इसके कई दावेदार हैं लेकिन करूणानिधि स्वयं बार-बार यह कह चुके हैं कि उनके दूसरे बेटे एम के स्टालिन ही उनके उत्तराधिकारी होंगे.

यह बात उन्होंने ताज़ा चुनावी अभियान में भी कही.

स्टालिन गत कुछ वर्षों से करूणानिधि के उपमुख्यमंत्री के रूप में काम करते रहे हैं और उन्हें आम तौर पर एक सक्षम नेता और शासक माना जाता है.

लेकिन उनकी मुश्किल यह है की उनके बड़े भाई अलागिरी भी मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं.

हालाँकि करूणानिधि ने उन्हें केंद्र में मंत्री बनाकर इस उम्मीद पर भेजा था की वो राज्य की राजनीति से दूर रहेंगे लेकिन अलागिरी इसके लिए तैयार नहीं हैं.

परिवार

करूणानिधि का एक पोस्टर
इमेज कैप्शन, करूणानिधि पाँच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके हैं

करूणानिधि कर परिवार काफी बड़ा है जिसमें उनकी पत्नियों दयालु अम्मल और राजति अम्मल के साथ-साथ छह बच्चे भी शामिल हैं.

पहली पत्नी पद्मावति का 1944 में ही देहांत हो गया था और उनके पुत्र मुत्थु ने फ़िल्मों में हीरो के रूप में जगह बनाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सके.

दूसरी पत्नी दयालु अम्मल से जो बच्चे हुए उनमें अलागिरी और स्टालिन, एक और बेटा और पुत्री सेल्वी शामिल हैं.

जबकि तीसरी पत्नी राजति अम्मल से उन्हें केवल एक बेटी कनिमुझी हैं.

इनके अलावा उनके भांजे दिवंगत मुरासोली मारन का परिवार भी है जो काफ़ी शक्तिशाली भी है और वो ख़ुद की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखता है.

मुरासोली मारन के बेटे दयानिधि मारन भी डीएमके के अहम नेता और केंद्र में मंत्री हैं.

कुछ वर्ष पहले मारन और करूणानिधि परिवार में दूरी आ गई थी लेकिन अब वो मिल गए हैं.

दयानिधि के एक भाई तमिलनाडु के सबसे बड़े टीवी नेटवर्क सन के मालिक हैं, तमिल फिल्म उद्योग में पैसा लगते हैं, केबल नेटवर्क पर उनका नियंत्रण है और वे एक प्राइवेट एयरलाइन के भी मालिक हैं.

इस समय करूणानिधि के बारे में विपक्ष की सबसे बड़े आलोचना यही है की उनके परिवार के सदस्य लगभग हर बड़े व्यापार में हिस्सेदार हैं चाहे वो फ़िल्म लाइन हो, रियल स्टेट हो या टीवी चैनल और केबल का व्यापार.

एमजीआर

यह एक अजीब बात है कि जिस व्यक्ति ने छह दशक पहले पेरियार से प्रभावित होकर ब्राह्मण विरोधी और ऊंची जाति विरोधी आंदोलन के साथ अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था और बहुत नीचे से ऊपर आये थे और अन्ना दुर्रै जैसे नेताओं के उत्तराधिकारी के रूप में उभरे थे, वो अब राज्य के सबसे संपन्न और शक्तिशाली परिवार के प्रमुख के रूप में जाने जाते हैं.

जहाँ तक भ्रष्टाचार के आरोपों का सवाल है, करूणानिधि 1969 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही इसका सामना करते रहे हैं.

जयललिता
इमेज कैप्शन, करूणानिधि के प्रतिद्वंद्वी एमजीआर की विरासत को संभाला जयललिता ने

मज़े की बात यह है कि ऐसे पहले आरोप विपक्ष ने नहीं बल्कि ख़ुद डीएमके के अंदर उनके मित्र से विरोधी बन जाने वाले अभिनेता एम जी रामचंद्रन या एमजीआर ने लगाए थे.

इन दोनों की दुश्मनी ने द्रविड़ राजनीति में एक अहम भूमिका निभाई थी.

करूणानिधि ने तमिल फ़िल्मों के एक बड़े स्क्रिप्ट लेखक के रूप में एमजीआर को एक सुपर स्टार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी और बाद में उन्हीं के निमंत्रण पर एमजीआर डीएमके में शामिल हुए.

एक समय ऐसा था कि करूणानिधि और एमजीआर दोनों ही अन्ना दुर्रै के क़रीबी थे.

लेकिन अन्ना दुर्रै की मृत्यु के बाद इस सवाल पर दोनों में टकराव हो गया कि अन्ना का वारिस कौन बनेगा.

जहाँ करूणानिधि मुख्यमंत्री बने वहीं एमजीआर ने उन के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा और उन्हें डीएमके से निलंबित कर दिया गया.

बाद में जब एमजीआर ने ख़ुद अपनी एक पार्टी अन्ना डीएमके बनाई तो यह तमिलनाडु की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत थी.

1977 में मुख्यमंत्री बनने के बाद एमजीआर ने राजनीति में फिर कभी मुड़कर नहीं देखा और 1987 में उनकी मौत तक करूणानिधि उन्हें सत्ता से नहीं हटा सके.

जयललिता

एमजीआर की मौत के बाद भी उनकी विरासत बाक़ी रही और कई फ़िल्मों में उनकी हीरोइन रहीं जयललिता ने अन्ना डीएमके का झंडा ऊंचा रखा और दो बार मुख्यमंत्री भी बनीं.

11 बार विधान सभा के लिए चुने जाने और पाँच बार मुख्यमंत्री बनने वाले करूणानिधि के लिए ये चुनाव जितना अहम है उतना ही यह जयललिता के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर लगातार दूसरी बार भी वे यह चुनाव हार जाती हैं तो उनके नेतृत्व पर सवाल उठ सकते हैं और उनकी पार्टी के भीतर बग़ावत हो सकती है.

नतीजा चाहे कुछ भी निकले और कोई भी दल सत्ता में आये, द्रविड़ आंदोलन से उत्पन्न होने वाले इन दोनों दलों और उनपर नियंत्रण रखने वाले दोनों व्यक्तियों की आपसी कड़वी दुश्मनी ऐसे ही चलती रहेगी.