क्या कभी छूटेगी जाति ?

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने हलफ़नामा दे कर अपनी जाति का त्याग करते हुए सरकार से आग्रह किया है कि उनकी जाति से जुड़े सभी प्रमाण सरकारी दस्तावेज़ों से मिटा दिए जाएं.
उत्तर प्रदेश पुलिस की अपराध अनुसंधान शाखा में मेरठ में अधीक्षक के रूप में पदस्थ अभिताभ ने अपने नाम के आगे से कुलनाम हटाने की भी घोषणा की है
अमिताभ ने बातचीत के दौरान कहा, " जाति एक नासूर बन गई है. इसकी वजह से समाज को केवल नुकसान हो रहा है और इसका विभाजन हो रहा है. मैं सहमत नहीं हूँ कि अच्छाई बुराई सबका आधार जाति हो इसलिए मैंने अपने विरोध को रेखांकित करने के लिए हलफ़नामा दे कर जाति छोड़ी है."
अमिताभ के अनुसार उनकी पत्नी उनके कदम से सहमत नहीं हैं और उन्होंने अपनी जाति का परित्याग नहीं किया है. हालांकि अमिताभ के दोनों बच्चे उनके कदम से सहमत हैं और उन्हें उम्मीद है कि वयस्क होने पर वो भी अपनी जाति त्याग कर आगे बढ़ेगें. ये दोनों बच्चे अभी स्कूल में पढ़ते हैं.
`व्यापक बदलाव के बिना निरर्थक'
नागपुर में अंबेडकरवादी विचारक भाऊ लोखंडे अमिताभ के कदम की सराहना करते हैं लेकिन कहते हैं कि जब तक समाज में ये बहुत व्यापक स्तर पर नहीं होता, इसका कोई अर्थ नहीं.
लोखंडे ने कहा "अमिताभ का कदम अच्छा है. उनकी नीयत अच्छी है लेकिन इसका फर्क तभी पड़ेगा जब ये सार्वजानिक रूप से होगा. जैसे गांधी जी दलित बस्तियों में जा कर रहते थे लेकिन दलित तो छुआछूत करते नहीं थे. छुआछूत तो ऊँची जाति वाले करते थे इसलिए गांधीजी को ऊँची जाति वालों के बीच जा कर उनका ह्रदय परिवर्तन करना था वो तो हुआ नहीं."
लोखंडे कहते हैं कि आज छूआछूत के मोर्चे पर परिवर्तन तो आया है लेकिन जाति की भावना ने आधुनिक रूप धारण करते हुए भेद भाव के रूप में कानूनी छुआछूत का रूप ले लिया है.
वो आगे उदाहरण देते हुए कहते हैं, " निजी क्षेत्र की कम्पनियां सरकारी ज़मीन, पानी, बिजली तो रियायती भावों पर लेतीं हैं पर दलितों को कोई आरक्षण देने के लिए तैयार नहीं. बजाज गांधी जी को तो वर्धा ले गए लेकिन उनके बेटे राहुल बजाज निजी क्षेत्र में आरक्षण के सख्त खिलाफ़ हैं."
`अपने अपने सच'
जाने माने समाजशास्त्री सतीश देशपांडे कहते हैं कि जाति व्यवस्था के दो छोर पर खड़े लोगों के लिए जाति के अलग अलग अर्थ हैं.
देशपांडे बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, " जाति जो संस्थान है वो कथित रूप से ऊंची जाति और निचली जाति के व्यक्ति के लिए अलग है. अगर आप किसी कथित रूप से निचली जाति के हैं तो आप अपनी अस्मिता के बारे में चाहे जो सोचें समाज आपको रोज़ सबक सिखाता है और बताता है कि आपकी औकात क्या है."
पर अमिताभ, भाऊ लोखंडे और सतीश देशपांडे तीनों इस बात को ले कर आशान्वित हैं कि एक दिन भारत में एक जाति विहीन समाज होगा वैसे ही जिसकी कल्पना भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी ने की थी. हाँ समय और रास्ते को लेकर तीनों के विचार अलग हैं.

























