हैदराबाद में खजाने की अंधाधुंध खोज जारी

- Author, उमर फ़ारूक़
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद
- प्रकाशित
हैदराबाद में पुरातत्व विभाग कथित ख़जाने की खोज में एक स्कूल के पास बीते दो दिनों से अंधाधुंध खुदाई कर रहा है लेकिन ख़जाना तो दूर, अब तक एक मरी चुहिया भी नहीं मिली है.
एक मशीन की मदद से खुदाई का काम रविवार सुबह शुरू हुआ था जिसे सोमवार की दोपहर रोक दिया गया.
पुरातत्व विभाग के निदेशक चन्ना रेड्डी का कहना है कि उन्होंने नेशनल मिनरल डेवेलपमेंट कार्पोरेशन के अधिकारियों से भूमिगत चीजों का पता लगाने वाले उपकरण मांगे हैं.
रेड्डी का कहना है कि इन उपकरणों के आने के बाद यहां खुदाई का काम दोबारा शुरू किया जाएगा.
जिस पहाड़ी पर खुदाई की जा रही थी, उसे नौबत पहाड़ के नाम से जाना जाता है जिस पर मशहूर बिरला मंदिर बना हुआ है.
राज्य सचिवालय भी यहां से नजदीक है.
खजाने के दावेदार
चन्ना रेड्डी की अगुआई में बड़ी गंभीरता से खुदाई कर रहे पुरातत्व विभाग के अधिकारियों को भरोसा है कि यहाँ एक गुफा और ख़जाना निकलेगा.
लेकिन स्थानीय लोग और अन्य पुरातत्व विशेषज्ञ इस प्रयास का मज़ाक उड़ा रहे हैं. उनका कहना है कि इस जगह पर कभी कोई गुफा नहीं थी.

आंध्र प्रदेश के पुरातत्व विभाग के मंत्री वट्टी वसंत कुमान ने खुदाई वाली जगह का मुआयना भी किया है.
चन्ना रेड्डी का कहना है कि नौ लोगों ने उन्हें ज्ञापन देकर इस जगह पर गुफा और ख़जाना होने का दावा किया था, जिसके बाद खुदाई का काम शुरू किया गया.
दावा करने वालों में कोल इंडिया कंपनी के मैनेजर डीएस राम राजू भी हैं. वो कहते हैं कि उन्होंने एक वर्ष पहले यहां एक गुफा देखी थी.
जिन नौ लोगों ने इस जगह पर ख़जाना होने का दावा किया है, उनका कहना है कि कानून के मुताबिक इस खजाने का 20 प्रतिशत हिस्सा उन्हें मिलना चाहिए.
पुरातत्व विभाग को इस जगह खजाना होने के दावे पर इसलिए भरोसा है क्योंकि यहां पहले एक बड़े ज़मींदार अरू नवाब रहा करते थे.
अधिकारियों का कहना है कि इसी इलाके में बीते साल उन्हें एक गुफा का पता चला था, ये अलग बात है कि वहां से कोई ख़ज़ाना नहीं मिला था.
'फैशन बन गया'
हैदराबाद के एक इतिहासकार मोहम्मद सफीउल्लाह के मुताबिक़, हो सकता है कि यहां कोई गुफा या भूमिगत जगह हो, लेकिन खजाने की बात में दम नहीं लगता.
वो कहते हैं, ''इस तरह के दावे करना आजकल एक फ़ैशन बन गया है. अगर किसी ने कुछ देखा भी है तो उसे कैसे मालूम कि इस ख़ज़ाने का मूल्य 20,000 करोड़ रूपए है.''
उनका कहना है कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय जापान की बमबारी के भय से कई नवाबों और दूसरे लोगों ने भूमिगत कमरे बनाए थे, हो सकता है कि उनमें से कुछ लोगों ने तब अपनी कीमती चीजें वहां रखी हों.
फिलहाल खुदाई में कुछ नहीं मिला है और अधिकारी खुदाई की जगह तीन बार बदल चुके हैं. खुदाई की वजह से एक पेड़ भी गिर चुका है.
इस जगह पर वानपर्ति संस्थान का मालिकाना हक है और परिवार के लोग खुदाई से काफी नाराज हैं.
परिवार की सदस्य और इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज की संयोजक अनुराधा रेड्डी का कहना है कि परिवार से मंजूरी लिए बिना ही अधिकारियों ने खुदाई का काम शुरू करा दिया.

























