साल 2013 की किताबें, बच्चों का साहित्य

- Author, रंगनाथ सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
जब हममें 'बड़ा-पन' कुछ कम था और टेलीवीज़न श्वेत-श्याम था तब हमारी दुनिया में रंग भरते थे कॉमिक्सों से.
रंगीन पन्नों पर छपी कमांडो ध्रुव, नागराज, डोगा और चाचा चौधरी की कहानियों के नए अंक पढ़ने के लिए गली-गली साइकिल की पैडल मारते हुए, परीक्षा के टाइम में भी स्कूल की किताबों के अंदर कॉमिक्स या बाल पत्रिकाएँ छुपाकर पढ़ते हुए हम, शायद आजकल के बच्चों से अलग बचपन जी रहे थे.
वीडियो गेम, कंप्यूटर गेम और इंटरनेट के वर्ष 2014 के ज़माने में कहाँ हैं बाल साहित्य? हमारी कोशिश थी कि यह शृंखला बड़े लोगों की बड़ी बातें बनकर न रह जाए इसलिए सातवीं और आख़िरी क़िस्त में साल 2013 में प्रकाशित उल्लेखनीय बाल साहित्य.
टुलटुल विश्वास

- जादुई मच्छी
गोंड कहानीकार चन्द्रकला जगत की कहानी – जादुई मच्छी - नाउम्मीदी और कठिनाइयों के समय में उम्मीद और उद्यम को बनाए रखने की कहानी है. यह कहानी रिनचिन और महीन ने चन्द्रकला से जबलपुर में सुनी थी और इस पर एक फ़िल्म बनाने के उद्देश्य से इसे कुछ और बुना, जैसा कि लोककथाओं के साथ होता आया है. फिर शकुनलता कुशराम के जादुई चित्रों ने इसे सचमुच किताब की शक्ल में सँवारा.
यूँ तो लोककथाएँ बाल साहित्य का एक अभिन्न अंग रही हैं. परन्तु इस किताब में लोककथा को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह आज के सन्दर्भ में भी मौजूँ लगती है. तूलिका, चैन्नई द्वारा प्रकाशित यह किताब महँगी ज़रूर है, परन्तु बाल साहित्य में इस साल की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति है.
- सातवाँ सूरज
ओड़िया आदिवासी बच्चों के समूह द्वारा कही गई और उन्हीं के द्वारा चित्रित यह सरल कहानी दरअसल एक आदिवासी लोककथा है, जो उस समुदाय के पर्यावरण प्रेम को सामने रखते हुए पाठकों का भी इस तरफ़ ध्यान खींचती है. इसे द्विभाषा (हिन्दी व अँग्रेज़ी) में प्रकाशित किया है प्रथम बुक्स ने. अच्छी बात यह भी है कि कई अन्य भाषाओं के साथ-सात इसे अँग्रेज़ी-ओड़िया में भी प्रकाशित किया गया है.
अपने आसपास के सामाजिक व पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में बच्चों के साथ बात करना ज़रूरी तो है. परन्तु अक्सर बच्चों की किताबों में ये चर्चाएँ उपदेशात्मक हो जाती हैं. यह सुखद है कि यह कहानी इससे कुछ हद तक बची हुई है – शायद इसलिए कि यह बच्चों की लेखनी से निकली है.
- हमारी गाय जनी

बाल साहित्य में अक्सर बच्चों की लेखनी को, उनके द्वारा कही गई या लिखी गई कहानियों को जगह नहीं दी जाती है. परन्तु अब धीरे-धीरे सूरत बदल रही है और बच्चों की कल्पना की उड़ान को और दुनिया को देखने के उनके ख़ास नज़रिए को भी तरजीह दी जा रही है. इसी धारा का प्रतिनिधित्व करती है एकलव्य द्वारा प्रकाशित यह किताब – हमारी गाय जनी.
अभिलाषा राजौरिया द्वारा चकमक बाल पत्रिका के लिए लिखी गई यह कहानी ग्रामीण बच्चों के जीवन के एक ख़ास दिन की कहानी है – जिस दिन घर में गाय ने एक बछड़ा पैदा किया. बहुत ही सरल पर सूक्ष्म अवलोकनों को वारली शैली के चित्रों से सजाया है रमेश हेंगाड़ी व सन्तोष पेठकर ने.
उल्लेखनीय है कि इस किताब पर भी इसी नाम से एक एनिमेशन फ़िल्म बनी है, जिसका निर्देशन किया है शिल्पा रानडे ने.
- ग़ुस्सा
घर में ग़ुस्सा, स्कूल में ग़ुस्सा, सड़क पर ग़ुस्सा – ग़ुस्सा आजकल की एक बहुत ही आम भावना है. तो बाल साहित्य में भी इसकी जगह क्यों न हो. आख़िर बाल साहित्य भी तो समाज का ही आइना है. तो इसी ग़ुस्से के मिज़ाज पर है यह किताब. इसे नेशनल बुक ट्रस्ट ने नेहरु बाल पुस्तकालय सीरीज़ के अन्तर्गत प्रकाशित किया है. लेखक हैं कुलवन्त कोचड़ और चित्रांकन किया है अजन्ता गुहाठाकुरता ने.
- मुझे धूप चाहिए

अब थोड़े बड़े बच्चों की भी बात हो जाए. गिरिजा कुलश्रेष्ठ एक शासकीय स्कूल में पढ़ाती हैं और इस नाते उनके काम का अधिकांश समय बच्चों के बीच गुज़रता है.
तभी तो वे बच्चों के क्रियाकलापों को, उनके मनोभावों को इतनी बारीकी से पकड़ पाती हैं. इसी की एक झलक मिलती है मुझे धूप चाहिए नामक कहानियों के इस संकलन में.
इस किताब में वे तमाम तरह के रिश्तों को एक किशोर या किशोरी के नज़रिए से प्रस्तुत करती हैं – दोस्ती का रिश्ता, इन्सान और जानवर का रिश्ता, इन्सान और पेड़-पौधों का रिश्ता, भाई-बहन का रिश्ता, आदि. इसके सरल-सुन्दर चित्रों को उकेरा है किशोर उम्र की सौम्या शुक्ला ने.
प्रकाश मनु

सन 2013 में प्रकाशित बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें
- मेरे प्रिय बाल नाटक – डॉ. श्रीप्रसाद, शांति पुस्तक मंदिर, कृष्णा नगर, दिल्ली
डॉ. श्रीप्रसाद बाल साहित्य के सुप्रसिद्ध लेखकों में से हैं जिन्होंने बाल कविता और कहानी के साथ-साथ बच्चों के लिए सुंदर नाटक भी लिखे हैं.
इस पुस्तक में डॉ. श्रीप्रसाद के बड़े ही मज़ेदार हास्य नाटक शामिल हैं, तो साथ ही बहुत से पद्य नाटक भी हैं, जिनमें कविता और नाटक दोनों का आनंद आता है.
कुछ लोककथाओं को भी डॉ. श्रीप्रसाद ने सुंदर नाटकों में ढाल दिया है. पुस्तक के सभी नाटक बड़े मज़े में खेले जा सकते हैं.
- डॉ. श्रीप्रसाद की चुनिंदा बाल कहानियाँ – डॉ. श्रीप्रसाद, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू भवन, वसंतकुंज, नई दिल्ली
डॉ. श्रीप्रसाद की चुनिंदा बाल कहानियों के इस संग्रह में उनकी आठ ऐसी कहानियाँ हैं, जिन्हें पढ़कर बच्चे कभी भूल नहीं पाएँगे.
इन कहानियों में बच्चे हैं और उनकी दुनिया का पसारा है.
बच्चों के छोटे-छोटे सुख-दुख, सपने और सीधे-सरल मनोभाव इन कहानियों में बड़े करीने से आते हैं और इन कहानियों को यादगार कहानियों में बदल देते हैं.
पुस्तक की ‘रूनू रूठी है’ कहानी तो भुलाई ही नहीं जा सकती.
- सात सूरज, सत्तावन तारे – सूर्यनाथ सिंह, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू भवन, वसंतकुंज, नई दिल्ली

प्रसिद्ध कथाकार सूर्यनाथ सिंह के इस अद्भुत विज्ञान फ़ंतासी उपन्यास के नायक हैं दो बच्चे आकाश और मार्था.
उनका टॉय प्लेन किसी अज्ञात ग्रह में जा पहुँचता है, जहाँ विज्ञान के अद्भुत करिश्मों की दुनिया बसी है. वहाँ क़दम-क़दम पर रोमांचक अनुभवों के साथ जीवन के कुछ नए पाठ सीखकर आकाश और मार्था लौटते हैं. विज्ञान की दुनिया और वैज्ञानिक करिश्मों को किसी परीकथा जैसे रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत करता बड़ा ही दिलचस्प बाल उपन्यास.
- मेरी प्रिय बाल कविताएँ – भगवतीप्रसाद द्विवेदी, विद्यार्थी प्रकाशन, कृष्णा नगर, दिल्ली
भागवतीप्रसाद द्विवेदी की एक से एक सुंदर और चुनी हुई बाल कविताएँ.
सब में बच्चे और उनका हँसी-ख़ुशी से भरा सपनीला संसार है. इन कविताओं में कहीं बच्चों की नटखट कल्पनाएँ हैं तो कहीं बड़ों से छोटे-छोटे शिकवे-शिकायतें. “समझे यहाँ कौन लाचारी, सोनू जी का बस्ता भारी...” सरीखी कविताएँ बड़ी मजेदार हैं, जिन्हें बच्चे एक बार पढ़कर कभी भूल नहीं पाएँगे.
- नटखट कुप्पू के अजब-अनोखे कारनामे– प्रकाश मनु, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू भवन, वसंत कुंज, नई दिल्ली
बच्चों के लिए लिखे गए इस उपन्यास का नायक है—छोटा-सा कुप्पू. बड़ा ही भोला, बड़ा ही नटखट. इस पूरे उपन्यास में कुप्पू का नटखटपन और मीठी शरारतें है, जो उसके मम्मी-पापा, भैया, दीदी और दोस्तों को ख़ूब हँसाती हैं. कुप्पू सपनों की दुनिया में भी विचित्र देशों की सैर पर निकल जाता है और लौटकर जो किस्से-कहानियाँ वह सुनाता है, उन्हें सुनते हुए सब पेट पकड़कर हँसते हैं और एक ही बात कहते हैं—‘सच, कुप्पू जैसा कोई नहीं!’
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