'शेम द रेपिस्ट' अभियान पर उठे सवाल

- Author, मुकुल देवीचंद
- पदनाम, एडिटर, बीबीसी ट्रेंडिंग
- प्रकाशित
एक चर्चित चैट ऐप पर रेप वीडियो शेयर किए जाने के बाद दुष्कर्म करने वालों को लज्जित करने के लिए वो वीडियो यूट्यूब पर शेयर कर दिया गया.
इसके बाद ये बहस छिड़ गई है कि इस तरह रेप वीडियो ऑनलाइन शेयर करना सही है?
कुछ महीने पहले व्हाट्सअप पर युवकों के एक लड़की के साथ दुष्कर्म करता हुए एक वीडियो अपलोड किया गया.
इस वीडियो को वही युवक शेयर कर रहे थे जो दुष्कर्म में शामिल थें.
जानी-मानी नारीवादी सुनीता कृष्णन ने जब ये वीडियो देखा तो उन्हें गहरा सदमा लगा.
वे महिला हिंसा के प्रति समाज के रवैये को चुनौती देते हुए इंटरनेट जोर-शोर से अभियान चलाती रही हैं.
सुनीता खुद एक रेप सर्वाइवर हैं. 15 साल की उम्र में उनके साथ गैंगरेप हुआ था.
"आई नेवर आस्क्ड फॉर ईट" जैसे ऑनलाइन अभियान या 'बलात्कार पीड़िता प्रिया, नई सुपरहीरो' नाम के कॉमिक्स जैसे अभियानों ने ऑनलाइन बहस में गंभीरता ला दी है.

अब इस विषय पर खूब बहस होने लगी है. खासकर साल 2012 में हुए दिल्ली बस गैंग रेप और हत्या के बाद.
विवादित रुख
सुनीता कृष्णन के वीडियो ऑनलाइन शेयर करने के बाद इस बहस ने एकदम नया और विवादित रुख ले लिया.
दरअसल सुनीता ने अभियुक्तों के खिलाफ ऑनलाइन अभियान शुरू करते हुए कुछ कांट-छांट कर वीडियो को यूट्यूब पर डाल दिया.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मुझे लगा कि बस अब बहुत हो चुका. अगले ही दिन मैंने ये वीडियो सोशल नेटवर्किंग साइट पर डाल दिया ताकि लोग इन लड़कों को पहचान सकें और उन्हें सजा मिल सके."

सुनीता के इस कदम से बेशक लोगों का ध्यान वीडियो की ओर गया और ये गुस्सा भड़काने वाला साबित हुआ.
रेप कल्चर
लेकिन सवाल ये है कि 'रेप कल्चर' से लड़ने का क्या ये तरीका सही है?
इस बारे में चिंता ये जताई जा रही है कि कानूनी प्रक्रिया से गुजरने से पहले ही अपराध में शामिल व्यक्ति की पहचान उजागर कर देना सही नहीं है.
बीबीसी ने जब सुनीता से ये पूछा कि क्या ऐसा करके वे कानून अपने हाथ में नहीं ले रहीं.
उनका जवाब था, "अपराधी जब किसी को शर्मसार करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं तो फिर मैं क्यों उनके प्रति संवेदनशीलता क्यों बरतूं?"
सुनीता ने बताया कि ऑनलाइन पोस्ट करने के बाद वीडियो को भारत के केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया गया है और इस मामले में अभी तक तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
इरादे पर सवाल?

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भारत में कई लोगों ने कृष्णन के इस अभियान की निंदा की और इसे न्याय व्यवस्था कमजोर करने वाला कदम बताया.
नारीवादी समूह सहमति को भी यहां एक मसला मानते हैं क्योंकि चेहरा और पहचान छिपाए जाने के बावजूद वीडियो को फिर से जारी किए जाने से पहले रेप पीड़िता से इजाजत नहीं ली गई थी.
एक ऑनलाइन नारीवादी समूह' ब्लैंक नॉएज' की जासमीन पथेजा कहती हैं, "मैं सुनीता के इरादे पर सवाल नहीं कर रही लेकिन ये तरीका सही नहीं है."
पथेजा का कहना है, "हकीकत बताने का हक़ पीड़िता को है."
ऑनलाइन अभियान और ऐसे मसलों पर मीडिया के रुख ने साल 2012 के बाद निश्चित तौर पर बड़े बदलाव लाए हैं.

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पथेजा कहती हैं, "एक बड़ा बदलाव आया है."
वे कहती हैं कि सोशल मीडिया पर, टीवी न्यूज चैनलों पर, फिल्मों में, यहां तक कि विज्ञापनों में भी जहां एक समलैंगिक जोड़ा एक दूसरे को चूमता दिखता है, ये बदलाव नजर आता है.
उनका कहना है कि "शेम द रेपिस्ट" जैसे अभियान बेशक थोड़े उग्र हैं लेकिन ये 'बदलाव का हिस्सा' हैं.
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