बंदर या किसान, किसका बचना ज़रूरी

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- Author, रूपक शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
हिमाचल प्रदेश की 75 फ़ीसदी आबादी खेती के जुड़ी हुई है लेकिन यहाँ के किसान अब खेती से भाग रहे हैं. इसकी वजह हैं, बंदर.
आलम ये है कि कुछ इलाकों में किसानों ने खेती बंद ही कर दी है. हिमाचल की कुल 3243 पंचायतों में से 2301 पंचायतें बंदरों से प्रभावित हैं.
कसौली के किसान अनंत राम कहते हैं, “ज़रूरत भर के लिए घर के पास ही फसल लगाते हैं. दूर वाली ज़मीन पर फ़सल की रखवाली मुमकिन नहीं है.”
वहीं रेणुका के किसान दिनेश का कहना है, "बंदर पहले तो सिर्फ़ मक्के और सब्जियों को नुकसान पहुंचाते थे लेकिन अब आलू, प्याज़ और अरबी भी खोद कर खा जाते हैं."
कंडाघाट के किसान मनुज कहते हैं कि अगर सरकार ने मदद नहीं की तो यहाँ खेती बंद करनी पड़ेगी.
करोड़ों का नुक़सान

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हिमाचल किसान सभा के प्रदेश प्रधान कुलदीप सिंह तंवर का दावा है कि बंदर खरीफ़ और रबी की फ़सलों का सालाना 350 से लेकर 375 करोड़ तक का नुकसान कर रहे हैं.
तंवर के मुताबिक नील गाय, शाइल, जंगली सूअर, खरगोश और मोर भी फसलों को तबाह करते हैं. लेकिन 70 से 80 फीसदी फसलों की बर्बादी के लिए केवल बंदर जिम्मेदार हैं.
तंवर कहते हैं कि समस्या काफ़ी बड़ी हो चुकी है फिर भी सरकार कोई समाधान नहीं निकाल रही है.
बंदरों से सिर्फ किसान ही परेशान नहीं. राजधानी शिमला में राह चलते लोगों को ये काटने से गुरेज़ नहीं करते. कई शहरों और क़स्बों में यही स्थिति है.
शिमला में इन्हें रोकने के लिए अल्ट्रासोनिक गन का इस्तेमाल किया गया था लेकिन इससे फ़ायदा नहीं हुआ.
राज्य में 2004 से लेकर 2014 तक बंदरों के काटने के 2050 मामले सामने आए थे जिनके लिए 96 लाख रुपए की राहत राशि दी गई.
बंदरों की गिनती

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वन विभाग ने 2004 में बंदरो की गिनती की थी जिसमें उनकी संख्या 3.19 लाख थी. साल 2013 की गिनती के अनुसार बंदरों की संख्या 2.27 लाख थी.
इन आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 10 सालों में बंदरों की संख्या में गिरावट आई है. जानकर इसकी एक वजह बंदरों की नसबंदी को भी मानते हैं.
बीते आठ सालों में क़रीब 94 हज़ार बंदरों की नसबंदी की गई. जिस पर 12 करोड़ ख़र्च हुए.
लेकिन ये तरीका भी उतना कारगर नहीं रहा, जितनी इससे उम्मीद थी. इसके बाद इन्हें ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव देने पर भी विचार किया गया है.
राज्य में बंदरों का आंतक पहले मुद्दा नहीं था लेकिन अब इस मसले ने सियासी शक्ल ले ली है.
क्या कांग्रेस और क्या भाजपा, चुनाव के दौरान सभी दल बंदरों से निजात दिलाने के वादे करते हैं.
दो रास्ते

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हिमाचल प्रदेश की मौजूदा वीरभद्र सिंह सरकार ने केंद्र से बंदरों को अपराधी या नाशक जीव घोषित करने की मांग की थी ताकि इन्हें मारने का रास्ता साफ़ हो सके. लेकिन केंद्र ने ये मांग ठुकरा दी.
केंद्र का तर्क है कि अगर हिमाचल प्रदेश को बंदरों को मारने की इजाज़त दी गई तो ऐसी मांग दूसरे राज्य भी कर सकते हैं.
जानकारों की मानें, तो इन पर दो तरीके से ही काबू पाया जा सकता है. एक या तो इन्हें दूसरे देशों में किसी प्रयोग के लिए भेजा जाए या फिर चरणबद्ध तरीके से मारा जाए.
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