यूपी तक पहुंची कांग्रेस, सपा की खटास

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- Author, अतुल चंद्रा
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के मधुर संबंधों में अचानक कड़वाहट आ गई है.
राजनीतिक विश्लेषक लोकसभा में गतिरोध तोड़ने के लिए कांग्रेस से अलग दिखने की मुलायम सिंह यादव की कोशिश को इसकी वजह मानते हैं.
हालांकि प्रदेश कांग्रेस के नेता इससे इनकार करते हैं.
सदन में 11 अगस्त को लिए गए मुलायम के इस फैसले का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वागत भी किया था.
इस घटनाक्रम के बाद प्रदेश कांग्रेस को अपने विपक्ष में होने की याद आई और 17 अगस्त को कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रदेश की 'बिगड़ी क़ानून व्यवस्था' के ख़िलाफ़ जुलूस निकालने की कोशिश की.
उनके इस प्रयास को विफल करने के लिए प्रशासन ने उन पर जम कर लाठियां भांजीं.
विधान सभा में हंगामा

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लाठी चार्ज के विरोध में पार्टी के नेताओं ने दूसरे दिन विधान सभा में हंगामा किया.
जिस खराब क़ानून व्यवस्था को लेकर कांग्रेसियों ने लाठियां खाईं उसी के लिए 25 जून को कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप माथुर ने कहा था कि प्रदेश की क़ानून व्यवस्था के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है.
अपने बचाव में प्रदीप माथुर कहते हैं, "हम लोग मुद्दों की लड़ाई लड़ते हैं. क्षेत्रीय कामों के लिए हमें और अन्य विधायकों को मुख्यमंत्री से मिलना होता है."
वो आगे कहते हैं, "जब राज्य सभा चुनाव की बात थी तो समाजवादी पार्टी ने हमारा साथ दिया था और जब विधान सभा की बात थी तब हमने सपा का साथ दिया."
उन्होंने कहा, "बात मिठास और कड़वाहट की नहीं, बल्कि राजनीतिक तालमेल की होती है. लेकिन अगर हम खराब क़ानून व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाएंगे तो जनता क्या सोचेगी."
बदला

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2013 में हुए राज्य सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की मदद से कांग्रेस के नेता प्रमोद तिवारी निर्विरोध चुने गए थे.
उससे पहले लोक सभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने रायबरेली में सोनिया गांधी के विरुद्ध अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था.
बदले में, मुलायम ने भी केंद्र में यूपीए-2 को राष्ट्रपति चुनाव जैसी कई कठिन परिस्थितियों से उबारा था.
इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस विपक्ष कम, समाजवादी पार्टी सरकार के दोस्त की भूमिका ज़्यादा कुशलता से निभा रही थी और तीन साल से खामोश बैठी रही.
कांग्रेस के भूतपूर्व प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव प्रदीप माथुर की ही बात दोहराते हैं.
सुबोध श्रीवास्तव ने कहा, "अपने क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार और मुख्यमंत्री की मदद के बिना काम नहीं चलता है. इसलिए गन्ना, बिजली और क़ानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर हम उनका विरोध करते हैं."
सोनिया को चिट्ठी

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सपा सरकार विरोधी रैली निकालने के इस प्रयास से पहले 14 अगस्त को प्रदीप माथुर ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि कपिल सिब्बल द्वारा नोएडा के निलंबित इंजीनियर यादव सिंह के पक्ष में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मुक़दमा लड़ा जाना पार्टी विरोधी है.
सिब्बल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं.
माथुर ने अपने पत्र में ये भी लिखा कि शाहजहाँपुर में आग से जल कर मरे पत्रकार जगेंद्र सिंह के मामले में भी सिब्बल उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे हैं जो ग़लत है.
माथुर ने कहा, "हमने सोनिया जी को लिखा है कि कपिल सिब्बल को इन दोनों मुकदमों से अपना वकालतनामा वापस ले लेना चाहिए."
उनके इस पत्र का समर्थन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री ने भी किया था.
भूला-बिसरा विपक्ष

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कांग्रेस के इन सरकार विरोधी क़दमों पर समाजवादी पार्टी ने कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया. पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा, "देखिए कांग्रेस के बारे में हमसे कुछ मत कहलवाइए."
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर एसके द्विवेदी कहते हैं कि संसद में मुलायम के दूर होने से घबरा कर कांग्रेस ने प्रदेश में दबाव बनाना शुरू कर दिया.
भूले-बिसरे विपक्ष की भूमिका के सहारे कांग्रेस को उम्मीद होगी कि 2017 के विधान सभा चुनाव में उसके विधायकों की संख्या 28 से कुछ बढ़ जाएगी.
लेकिन उससे पहले पंचायत चुनाव में पार्टी को असलियत का अंदाज़ा हो जाएगा.
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