स्वदेशीकरण के नाम पर 'रक्षा क्षेत्र को बट्टा'

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- Author, वरुण रामचंद्रा और नितिन पाई
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ने हाल ही में रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के साथ पोषण संबंधी उत्पादों पर एक समझौता किया है.
ये समझौता डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च और पतंजलि के बीच तकनीकी हस्तांतरण के लिए हुआ है.
संस्था ने इसी तरह के समझौते डॉबर, गुजरात फ्लोरोकेमिकल्स और भिलाई इंजीनियरिंग जैसे संस्थानों के साथ भी किए हैं.
डीआरडीओ उपकरण नहीं बनाता, उसकी प्रारंभिक ज़िम्मेदारी अनुसंधान और विकास से है, उस समय तक जबतक वो तकनीक के हस्तांतरण के स्टेज तक न पहुंच जाए.
हालांकि पतंजलि के साथ हुआ समझौता डीआरडीओ के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन इस बात की तरफ़ ध्यान देने की ज़रूरत है कि संस्था की लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट और कावेरी जेट इंजन जैसी कई अहम परियोजनाएं सालों से लटकी हैं. इनका सीधा संबंध रक्षा तैयारियों से है.
इसलिए ज़रूरी है कि सबसे पहले डीआरडीओ के उद्देश्यों की पड़ताल की जाए.
उद्देश्यों की पूर्ति मेें नाकामी

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इस संगठन की स्थापना साल 1958 में भारतीय सशस्त्र सेनाओं को स्वदेशी वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग मुहैया करवाने के लिए की गई थी.
लेकिन स्थापना के 57 सालों बाद भी भारत रक्षा ज़रूरतों के लिए आयात पर ही निर्भर है.
ये डीआरडीओ की स्थापना के उद्देश्यों और अबतक के हासिल नतीजों के बीच के फर्क़ को साफ तौर पर दिखाता है.
ये उन सार्वजनिक उपक्रमों के पर भी लागू है जो रक्षा क्षेत्र से जुड़े हैं.

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साल 2007 में सरकार ने ख़ासतौर पर डीआरडीओ के कामकाज को बेहतर करने के लिए डॉ. पी रामाराव की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था.
समिति ने रिपोर्ट में संगठन को छोटी इकाइयों में बांटने का सुझाव दिया. लेकिन उसकी सिफारिशों पर आधे-अधूरे मन से लागू की गई हैं.
डीआरडीओ जैसे संगठनों पर सालाना हज़ार करोड़ रूपये ख़र्च होते हैं. अगर ऐसे संगठन अयोग्य साबित हुए हैं तो उन्हें चलाना देश हित में नहीं है ख़ासकर तब जबकि इसमें करदाताओं का पैसा लगा हो.
इस रक़म का इस्तेमाल किसी दूसरे राष्ट्रीय हित में किया जा सकता है.
स्वदेशीकरण की ज़िद

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आर्थिक सुधारों पर देशभक्ति या फिर स्वदेशीकरण का मुलम्मा चढ़ाया गया है, लेकिन हालात ये है कि भारत आज भी अपने रक्षा उपकरणों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. जबकि रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंजूरी दिए जाने पर चुप्पी है.
रक्षा क्षेत्र से जुड़े संस्थान भी विदेशी कंपनियों के दबाव से बचने के लिए बार-बार स्वदेशीकरण पर ज़ोर देते रहे हैं.
आज़ादी के बाद से स्वदेशीकरण के नाम पर जिस तरह का ज़िद्दी रुख़ अख़्तियार किया गया है उससे बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ.
कुल जमा नतीजा ये हुआ है कि देसी उद्योग रक्षा ज़रूरतों को पूरा करने में नाकाम है. वहीं अर्थव्यवस्था के राजनीतिकरण ने ज़्यादातर सार्वजनिक कंपनियों को दयनीय हालत में पहुंचा दिया है.

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रक्षा क्षेत्र में निजी और विदेशी निवेश की इजाज़त देने से एक प्रतियोगी माहौल तैयार हो सकता है.
इससे भारतीय उद्योग विश्व स्तरीय उत्पाद के निर्माण की क्षमता हासिल कर सकता है.
डीआरडीओ में बदलाव के लिए सरकार पी रामाराव कमेटी की सिफारिश पर तुरंत अमल करे.
संस्था को रक्षा व्यवस्था से सलाह मशविरा कर अहम परियोजनाओं को शुरू करना चाहिए.
और, डीआरडीओ की स्थापना देश की रक्षा में मदद के उद्देश्य से की गई थी, न कि इसलिए कि ख़ुद देश ही उसकी रक्षा को लेकर हलकान हो.
(ये लेखकों के निजी विचार हैं. वरुण रामचंद्र और नितिन पाई बैंगलोर स्थित तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के साथ जुड़े हैं.)
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