दुनिया को ब्रह्मोस बेच पाएगा भारत

ब्रम्होस मिसाइल.
    • Author, सी. उदय भास्कर
    • पदनाम, निदेशक, सोसायटी फॉर पॉलिसी स्टडीज़
  • प्रकाशित

भारत सोमवार को मिसाइल टेक्नॉलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) का सदस्य बन गया.

साल 1987 में बने इस समूह का उद्देश्य दुनिया में मिसाइल तकनीक के व्यापार पर नियंत्रण और निगरानी रखना है.

महाविनाश के हथियारों को स्थिर करने के लिए तकनीक के बारे में दुनिया भर में जितनी भी पाबंदियां लगाई गई हैं, वो सब भारत को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं.

मिसाइल तकनीक के व्यापार के नियंत्रण के लिए एमटीसीआर ने कई तरह के नियम-क़ानून बनाए हैं और पाबंदियां लगाई हैं.

भारत इसका शिकार उस समय हुआ, जब रूस ने क्रायोज़निक इंजन देने की कोशिश की. लेकिन बाक़ी के देशों के विरोध की वजह से रूस ऐसा नहीं कर पाया था.

एमटीसीआर का सदस्य बनने के बाद हम दुनिया के अन्य देशों के पास मौज़ूद मिसाइल की आधुनिक तकनीक को उनसे हासिल कर सकते हैं.

भारत की अग्नि मिसाइल.

वहीं इसका दूसरा फ़ायदा यह है कि भारत अगर अपनी मिसाइल तकनीक जैसे ब्रह्मोस को अगर किसी दूसरे देश को देना चाहता है, तो वह एमटीसीआर का सदस्य होने की वजह से दे सकता है.

एमटीसीआर का सदस्य बनने के बाद भारत की चुनौती पाकिस्तान के एक्यू ख़ान नेटवर्क को बढ़ने से रोकना है, जिसे पाकिस्तान ने बढ़ावा दिया.

एक्यू ख़ान नेटवर्क को दुनिया का न्यूक्लियर वॉलमार्ट भी कहा जाता था. वह परमाणु तकनीक के ग़ैर क़ानूनी धंधे का नेटवर्क था.

दक्षिण कोरिया के सोल में 20-24 जून 2016 तक आयोजित एनएसजी की बैठक.

इसी नेटवर्क के ज़रिए कई देश उन्नत मिसाइल तकनीक को हासिल करने की फ़िराक में थे, इनमें पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश शामिल हैं. इसे चीन का समर्थन हासिल था. यह दुनिया के लिए ख़तरा है.

इस वक्त एक्यू ख़ान नेटवर्क, अलकायदा, तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा और आईएसआईएस जैसे संगठनों के मिसाइल तकनीक तक पहुंच को रोकना बहुत जरूरी हो गया है.

चीन एमटीसीआर का सदस्य नहीं है. लेकिन वह परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का 2004 से सदस्य है. एनएसजी की सदस्यता पाने का भारत का प्रयास असफल रहा है.

हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि भारत को एनएसजी की सदस्यता के लिए एमटीसीआर में चीन की दावेदारी का समर्थन करना चाहिए. लेकिन मुझे लगता है कि यह इतना आसान काम नहीं है. क्योंकि दोनों समूहों के और भी सदस्य देश हैं और उनमें फ़ैसले आम सहमति से लिए जाते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के प्रीमियर ली किकयांग.

चीन ने 1980 में सऊदी अरब को सीएसएस-2 नाम के मिसाइल की आपूर्ति की थी. इसके बाद भी कई उदाहरण हैं, जब चीन ने एमटीसीआर के नियमों का उल्लंघन करते हुए कई देशों को मिसाइल तकनीक दी. इनमें उत्तर कोरिया और पाकिस्तान भी शामिल हैं.

इन सब बातों को देखते हुए चीन को एसटीसीआर की सदस्यता भारत के कहने पर नहीं मिलेगी, क्योंकि उसका ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत पर आधारित. )

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