कम काम करने से प्रॉडक्टिविटी कैसे बढ़ी, जानिए

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- Author, एलिना दिज़िक
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
- प्रकाशित
कम काम करके आगे जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है? ये ऐसी राय है जिससे कम ही लोग सहमत होंगे.
इसके बावजूद, बहुत सारे पेशेवर इसे अपनाने में लगे हैं. वे दफ़्तरों से जल्दी निकल जा रहे हैं और ख़ुद के आराम और परिवार के लिए ज़्यादा समय दे रहे हैं.
इसे संभव बनाने के लिए वे अपनी उत्पादकता को बढ़ाने के लिए दूसरी तरकीबों को भी अपनाते हैं. हालांकि यह बहुत संभव नहीं है. लोगों की कनेक्टिविटी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि किसी के लिए भी दफ़्तर से पूरी तरह कट जाना असंभव जैसा है.
कई लोग ऐसा भी सोचते हैं कि इस तरह से काम से कनेक्ट रहने पर उत्पादकता बढ़ जाती है, लेकिन तमाम अनुसंधान बताते हैं कि लंबे समय तक काम से कनेक्ट रहने का उत्पादकता से बहुत लेना देना नहीं होता.
इसके उलट ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनामिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की 20 साल से भी ज्यादा समय तक चली रिसर्च के मुताबिक काम के घंटे कम होने से आपकी उत्पादकता बढ़ जाती है.
बीबीसी कैपिटल आपको पांच पेशेवरों के अनुभव बता रहा है जिनकी उत्पादकता कम काम करने पर बढ़ गई.
टिम फेरनिहॉफ़, टोरंटो, कनाडा

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फेरनिहॉफ़, साफ़्टवेयर डेवलपमेंट फर्म माय प्लेनेट के आईटी विंग में काम करते हैं. 28 साल के फेरनिहॉफ़ अपने प्रोजेक्टों को पूरा करने के लिए वीकएंड पर भी काम करते थे.
इससे मुश्किल ये हुई कि उनके पास काम पूरा होने के लिए अतिरिक्त समय है, ये सोचते हुए वे सोमवार से शुक्रवार तक अपने काम को धीमा करने लगे. वहीं दूसरी ओर उनके दफ़्तर के लोग जान गए कि वे वीकएंड पर मौजूद होते हैं तो उनके लिए दूसरे काम के अनुरोध भी आने लगे. छह महीने के अंदर ही फेरिनहॉफ़ इससे तंग आ गए.
उन्होंने वीकएंड पर काम करना बंद किया. उनके मुताबिक अगर काम महत्वपूर्ण है तो उसे पहले पूरा किया जा सकता है और अगर महत्वपूर्ण नहीं है तो फिर सोमवार को पूरा किया जाएगा.
इतना ही नहीं, उन्होंने वीकएंड पर फ़ोन और ईमेल के जरिए भी जवाब देना बंद कर दिया. इसका फ़ायदा ये हुआ कि अब वे निजी कामों के लिए हर सप्ताह 10 घंटे का समय निकाल लेते हैं.
मार्क म्यूनियर, ब्राइटन, यूनाइटेड किंगडम

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ब्रिटेन की पब्लिक रिलेशन फर्म सिसियोन में काम करने वाले म्यूनियर स्मार्ट फ़ोन के साथ साथ एक सामान्य फ़ोन रखते हैं, हालांकि नंबर एक ही इस्तेमाल करते हैं. इसकी वजह ये है कि वे वीकएंड पर अपने स्मार्टफ़ोन का बिलकुल इस्तेमाल नहीं करते.
इससे वे अपने ऑफ़िस से बिलकुल कटे हुए रहते हैं. अब उनके दफ़्तर के लोगों को भी मालूम हो चुका है कि वीकएंड पर उनका कोई जवाब नहीं मिलेगा.
म्यूख चौधरी, बैंगलोर, भारत

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म्यूख चौधरी मिलाप डॉट ओआरजी के सह-संस्थापक हैं. यह स्टार्टअप जरूरतमंदों को ऋण देने का काम करता है. उन्होंने अपने काम करने के तौर तरीकों में बदलाव लाने का मन बनाया. उन्होंने अपने इनबॉक्स में आए ईमेल को तुरंत चेक करना बंद कर दिया.
इससे पहले 31 साल के चौधरी अपने पास पहुंचे हर ईमेल का जवाब दिया करते थे और इसमें उनका काफी वक्त बर्बाद होता था. अब चौधरी अपने ईमेल दिन में तीन ही वक्त देखते हैं- सुबह, दोपहर और शाम.
इस दौरान वे हर बार 45 मिनट तक ही मेल पर होते हैं. वे बूमरेंग का इस्तेमाल करते हैं कि ताकि उनके मेल नियमित समय अंतर से दूसरों के इनबाक्स में पहुंचे.
इससे एक तरकीब से चौधरी प्रत्येक सप्ताह दस घंटे का समय बचा रहे हैं. हालांकि वे मानते हैं कि इस नियम को मानने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ रही है.
जेफ़ कूपर, ईस्ट नॉरिंगटन, पेन्नसेल्वेनिया (अमरीका)
कूपर को एक दिन किसी जरूरी काम के चलते सुबह 6 बजे ही अपने ऑफ़िस जाना पड़ा. वे इवेंट रजिस्ट्रेशन की कंपनी एक्सपोलॉजिक को चलाते हैं. उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि सुबह काम करना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है.

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इसके बाद वे अपने दफ़्तर सुबह 6.30 बजे ही पहुंचने लगे. 9 बजे तक दूसरे कर्मचारी पहुंचें, उससे पहले कूपर काफी काम निपटा चुके होते हैं.
42 साल के कूपर अमूमन दिन के 3-4 बजे तक ही काम करते हैं. लेकिन ख़ुद बताते हैं कि इस रूटीन के चलते वे हर दिन एक से दो घंटे का समय बचा रहे हैं. हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी मुश्किल अपने दूसरे कर्मचारियों को दफ़्तर में बनाए रखने में हो रही है.
मेहमूद अल यूसिफ, बहरीन
यूसिफ बहरीन में कॉरपोरेट वीडियो प्रॉडक्शन कंपनी गल्फ़ ब्रॉडकास्ट के संस्थापक हैं. उनका इनबॉक्स हर वक्त मीटिंग और जरूरी सूचनाओं से भरा होता है. उनके कई घंटे तो केवल ईमेल को पढ़ने में खर्च हो जाते थे. उन्होंने अपनी कंपनी में ऑटोमेटेड ट्रैकिंग सिस्टम का उपयोग करना शुरू कर दिया है.

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कर्मचारियों के बीच पारदर्शिता बढ़ाते हुए ईमेल के इस्तेमाल को भी कम किया है. इन सबका असर ये हुआ कि वे हर सप्ताह अब कई घंटे कम काम कर रहे हैं. यूसिफ़ कहते हैं कि हमारी मीटिंग अब भविष्य के ग्रोथ पर होती है, हम टास्क की लिस्ट पर बात नहीं करते. वैसे उन्हें नए सिस्टम के उपयोग के बारे में अपने कर्मचारियों को तैयार करने में काफी मुश्किल का सामना करना पड़ा है.
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