ग़रीब देशों में मुफ़्त चिकित्सा पर ज़ोर

दुनियाभर के 60 से अधिक ग़ैर-सरकारी संगठनों ने ग़रीब देशों में बाल और प्रसव मृत्यु दर पर नियंत्रण के लिए मुफ़्त चिकित्सा व्यवस्था के विचार का समर्थन किया है.
ब्रितानी सहायता एजेंसी ऑक्सफ़ैम ने एक अध्ययन के आधार पर कहा है कि उचित चिकित्सा व्यवस्था के अभाव में दुनियाभर में हर साल लगभग पाँच लाख गर्भवती महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं.
ऑक्सफ़ैम का कहना है कि चिकित्सा अभाव के कारण हर साल 40 लाख बच्चे पैदाईश से 28वें दिन तक पहुँचते-पहुँचते दुनिया से चल बसते हैं.
रिपोर्ट में मलावी का उदाहरण देकर बताया गया है कि एक करोड़ 40 लाख की आबादी वाले मलावी में रजिस्टर्ड डॉक्टरों की संख्या केवल 266 है.
रिपोर्ट पर ग़ैर-सरकारी संगठन वर्ल्ड विज़न नेशनल की सलाहकार केड आरली कहती हैं, "इसका कोई कारण नहीं है कि विकासशील देशों में स्वास्थ्य सेवा के लिए फ़ीस वसूली जाए, इससे लोग और ग़रीब होंगे. हर साल 10 करोड़ लोग इलाज का फ़ीस देकर ग़रीबी की दलदल में फँस रहे हैं."
मालूली बदलाव
ग़ैर-सरकारी संगठनों ने यह भी चेतावनी दी है कि 1990 से बाल और प्रसव मृत्यु दर में मामूली परिवर्तन आया है.
हालाँकि विश्व के नेता संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास लक्ष्य के तहत 2015 तक बाल और प्रसव मृत्यु दर में 75 प्रतिशत तक क़ाबू पाने की बात कर रहे हैं.
ऑक्सफ़ैम की मुख्य कार्यकारी अधिकारी बारबरा स्टॉकिंग का कहना है, "कितने लोग विश्वनेताओं के कार्रवाई से पहले अनावश्यक रुप से मारे जाते रहेंगे. सीधी बात यह है कि ग़रीब लोग चिकित्सा फ़ीस नहीं दे सकते हैं और निष्क्रियता की वजह से लाखों लोगों को चिकित्सा नहीं मिल पा रही है."
ये रिपोर्ट इस महीने के अंत में न्यूयॉर्क में होने वाले संयुक्त राष्ट्र महाविधेशन से पहले आई है जहाँ विश्व के नेता मुफ़्त चिकिस्ता व्यवस्था को और अधिक ग़रीब देशों में विस्तार देने पर बात करने वाले हैं.

























