नागरिकता को लेकर असम में विवाद

विरोध सभा में जुटे असम के बंगाली
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    • Author, सुवोजित बागची
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य में नागरिकता के मुद्दे को लेकर नया विवाद सामने आया है. राज्य के मुस्लिम समुदाय के बंगालियों ने खुल कर इसका विरोध किया है हालांकि कुछ हिंदू बंगाली भी इसमें शामिल हैं.

गत 15 जून से असम में नागरिकों की सूची "नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़ेंस" (एनआरसी) बनाने का काम शुरू हुआ है.

सरकार के अनुसार एनआरसी का मूल उद्देश्य भारतीय नागरिकों की पहचान करना तथा उन्हें सूचीबद्ध करना है. लेकिन बंगालियों को इससे एतराज है. जबकि छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन या आसू ने सरकार के इस क़दम का स्वागत किया है.

उल्लेखनीय है कि इसके पहले 1951 में पहली बार एनआरसी बनाई गई थी.

दो जिलों में पायलट प्रोजेक्ट

राज्य के दो जिलों बारपेटा और कामरूप में एनआरसी के तहत नागरिकों की सूची बनाने का काम चल रहा है. हालांकि यह काम अभी पूरे ज़िले में नहीं बल्कि कुछ चुने हुए क्षेत्रों में ही चल रहा है. नागरिकों को 10 अगस्त तक अपनी नागरिकता का प्रमाण देना होगा.

असम में नागरिकों की सूची बनाने के पायलट प्रोजेक्ट का नोटिस
इमेज कैप्शन, असम में नागरिकों की सूची बनाने के पायलट प्रोजेक्ट का नोटिस

इसके लिए लोगों को सरकारी कार्यालय से आवेदन पत्र लेकर उसके साथ नागरिकता को प्रमाणित करने वाले दस्तावेजों को संलग्न करके जमा करना होगा. इन दस्तावेजों में 24 मार्च 1971 के पहले की मतदाता सूची या फिर 1951 में बनाये गये एनआरसी की प्रतिलिपि शामिल है.

सरकार द्वारा जारी गज़ेट में कहा गया है कि 31 दिसंबर 2010 तक एनआरसी तैयार करना होगा.

एनआरसी का विरोध

राज्य के जिन मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया है उनमें जमीयत-उलेमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) जैसे संगठन शामिल है. हालांकि जमात–ए-इस्लामी हिंद का विरोध बहुत सशक्त नहीं है.

जमात-ए-इस्लामी हिंद की उत्तरी असम शाखा के अध्यक्ष मोहम्मद शम्स अहमद ने एनआरसी का स्वागत करते हुए कहा, "एनआरसी को लेकर छोटी-छोटी समस्याएं हैं लेकिन उनकी वजह से इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए."

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का भी कहना है कि वह एनआरसी का नैतिक रूप से तो समर्थन करते हैं लेकिन इसकी प्रक्रिया बड़ी जटिल है और वे उस प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं.

यूडीएफ के कार्यकारी अध्यक्ष हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी कहते है, "2003 में एक नियम बना था जिसके तहत एनआरसी को लागू किया गया. लेकिन इसे संसद में पास नहीं कराया गया. इस तरह क्या यह क़ानून का उल्लंघन नहीं है. इसके विरोध में हम अदालत की शरण में जाएंगे"

कुछ इसी तरह की आवाज़ बारपेटा में असम खिलंजिया (मूल निवासी) मुसलमान उन्नयन परिषद ने भी उठाई. परिषद के अध्यक्ष इसहाक़ अली दीवान कहते हैं, " एनआरसी के आवेदन पत्र के 11वें और 15वें कॉलम पर उन्हें एतराज़ है. इसमें पूछा गया है कि आवेदक के माता-पिता कब से असम में रह रहे हैं. इसका अर्थ क्या यह नहीं है कि असम के बंगाली यहां के मूल निवासी या भूमि-पुत्र नहीं है."

बारपेटा के छह गांवों में लोगों ने इसहाक़ अली दीवान के सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि वे ये आवेदन किसी भी हालत में जमा नहीं करेंगे.

समुज्ज्वल भट्टाचार्य
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असमिया भाषी ख़ुश

दूसरी ओर असमिया भाषी लोगों के संगठन एनआरसी का खुलेआम स्वागत करते हैं. उनका कहना है कि यह प्रक्रिया राज्य में दशकों से हो रही विदेशी घुसपैठ की समस्या से निजात दिलाएगी.

सरकार के साथ-साथ ये संगठन भी एनआरसी को सफल बनाने के लिए लोगों के बीच प्रचार कर रहे हैं.

एनआरसी को राज्य में क्रियान्वित कराने में आसू की अहम भूमिका रही है, इसके लिए उसने बार-बार दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्रालय के साथ बैठकें की है. अब वह एनआरसी के विषय में लोगों को जानकारी देने के लिए प्रचार अभियान चला रहे हैं.

गुवाहाटी के आमबाड़ी स्थित ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के कार्यालय में आसू के सलाहकार समुज्ज्वल भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा, "असम में बांग्लादेशियों की घुसपैठ बहुत भारी समस्या बन गई है और यह न केवल राज्य के लिए बल्कि पूरे देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन गया है. अब एनआरसी से भारतीय नागरिकों और बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान हो जाएगी. हम लोग ख़ुश हैं कि हमारे 30 वर्षों से चलाएं जा रहे अभियान को सरकार ने समझा और एनआरसी को लागू किया."

राज्य के मुख्य सचिव और गृह सचिव दोनों ने बीबीसी के साथ लंबी बातचीत की लेकिन उन्होंने यही समझाया कि यह मामला काफ़ी 'संवेदनशील' है और इस पर वो कोई 'ऑन रिकार्ड' बयान नहीं दे सकते.

बारपेटा ज़िले के सूत्र के मुताबिक़ पहले दो सप्ताह तक लोगों ने भारी संख्या में आवेदन पत्र लिए लेकिन जमा करने वालों की संख्या बहुत कम है.