अमरीका में चुनाव का माहौल

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन
- प्रकाशित
अमरीका में चुनाव का माहौल है, और यह माहौल इतना गर्म है कि राजनीतिक रूप से देश लगभग दो भागों में बंट कर रह गया है.
लेकिन इसमें बराक ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति डाँवाडोल नज़र आ रही है.
अमरीका में हर दो साल बाद होने वाले ये चुनाव दो नवंबर को होंगे.
ये चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब राष्ट्रपति बराक ओबामा की लोकप्रियता दो साल में 62 प्रतिशत से घटकर 47 प्रतिशत तक रह गई है.
उनकी गिरती हुई लोकप्रियता का सीधा असर चुनाव में उनकी पार्टी पर पड़ सकता है.
लगभग सभी विशेषज्ञों और नतीजों की भविष्यवाणी करनेवाली संस्थाओं के अनुसार इस चुनाव में राष्ट्रपति ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी की शिकस्त होगी.
अहम चुनाव

लेकिन यह चुनाव महत्वपूर्ण क्यूँ हैं और राष्ट्रपति ओबामा को हार के कारण कितना नुक़सान होगा?
दरअसल इस समय सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटिव, दोनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है और ख़तरा इस बात का है कि चुनाव के बाद कम से कम हाउस में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत मिल जाएगा.
इस समय 435 सीटों वाले हाउस में डेमोक्रेटिक पार्टी को 40 सीटों का बहुमत प्राप्त है जबकि सीनेट की 100 सीटों में 59 पर इस पार्टी का कब्ज़ा है.
अमरीका में अभी हाउस की सभी सीटों और सीनेट की 37 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं.
अगर कॉंग्रेस के दोनों भागों में डेमोक्रेटिक पार्टी अपना बहुमत खो देती है तो राष्ट्रपति ओबामा के लिए बिल पारित करवाना, प्रशासन में अपनी पसंद के लोगों की नियुक्ति कराना और कॉंग्रेस से अपनी बातें मनवाना मुश्किल काम होगा.
मुश्किलें कैसी होंगी

उदाहरण के तौर पर ओबामा प्रशासन ने पिछले सप्ताह पाकिस्तान को दो अरब डॉलर की सैनिक मदद का ऐलान किया है. कॉंग्रेस की रज़ामंदी के बग़ैर यह मुमकिन नहीं.
तो अगर दो नवंबर के बाद कॉंग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत प्राप्त हो गया और यह पार्टी इस मदद के पक्ष में नहीं है तो पाकिस्तान को यह मदद नहीं मिल सकती.
दूसरे शब्दों में इस तरह का माहौल पैदा होने पर राष्ट्रपति और कॉंग्रेस के बीच अगले राष्ट्रपति चुनाव तक तनाव बना रह सकता है.
इसीलिए राष्ट्रपति ओबामा, उनकी पत्नी मिशेल और भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने देश भर में दर्जनों चुनावी सभाओं को संबोधित किया है.
लेकिन इनकी मेहनत के बावजूद संकेत इस बात के मिल रहे हैं कि जनता रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों को मत देगी.
आम अमरीकी बढ़ती हुई महंगाई और रिकॉर्ड बेरोज़गारी से परेशान है. उस पर आर्थिक प्रगति कछुए की चाल से आगे बढ़ रही है.
वर्ष 2008 में राष्ट्रपति ओबामा को आम जनता का बहुमत प्राप्त था लेकिन अब आम लोग उनसे बेज़ार नज़र आते हैं.
यहाँ तक कि ओबामा प्रशासन ने पिछले साल जिन कंपनियों को आर्थिक संकट से निकलने के लिए भारी आर्थिक मदद दी थी वो कम्पनियां भी रिपब्लिकन पार्टी को चंदा दे रही हैं.
इसके अलावा 'टी पार्टी' आंदोलन भी डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए मुसीबतें कम नहीं कर रहा. 'टी पार्टी' के कार्यकर्ता मानते हैं कि संघीय ख़र्चे, घाटा और कर बहुत अधिक हैं. अपना विरोध जताने के लिए 'टी पार्टी' आंदोलन सार्वजनिक प्रदर्शन करता रहता.
इससे ज़ाहिर तौर पर रिपब्लिकन पार्टी को फ़ायदा हो रहा है.
नकारात्मक नतीजों के बाद भी राष्ट्रपति ओबामा के पद को अगले दो साल तक यानि अगले राष्ट्रपति चुनाव तक कोई ख़तरा नहीं है.
लेकिन अगर उनकी पार्टी की पराजय हुई तो राष्ट्रपति ओबामा को जहाँ अपने एजेंडे पर काम करने में बाधाएँ आएँगी वहीं दूसरी ओर अगले राष्ट्रपति चुनाव में उनके दुबारा चुने जाने की संभावना कम हो जाएगी.
अमरीका का इतिहास

राष्ट्रपति ओबामा की एक नज़र अमरीकी इतिहास पर भी ज़रूर होगी.
आम तौर से यह देखा गया है कि अधिकतर अमरीकी राष्ट्रपतियों के पहले काल में उनकी पार्टी को चुनावों में कई सीटों में पराजय होती है.
लिंडन जॉन्सन, हैरी ट्रूमैन और बिल क्लिंटन के दौर में उनकी पार्टी को इन दो साल बाद होने वाले चुनावों में पराजय का सामना करना पड़ा था.
क्लिंटन के काल में डेमोक्रेटिक पार्टी को हॉउस में 54 सीटों का नुक़सान हुआ था लेकिन इसके दो वर्ष बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में वो दोबारा चुन लिए गए.
ऐसी और भी मिसालें हैं.
इस बार अगर डेमोक्रेटिक पार्टी की हार के बावजूद दो साल बाद राष्ट्रपति के चुनाव हुए तो ओबामा दोबारा चुने जा सकते हैं.
लेकिन उन्हें कॉंग्रेस के साथ एक ऐसा रिश्ता बनाना पड़ेगा जिससे वो अपनी बातें मनवाने में कामयाब हो सकें.
साथ ही अगर एक साल बाद बेरोज़गारी कम हुई और अर्थव्यवस्था मज़बूत हुई तो ऐसा संभव है कि वो दूसरे काल के लिए भी राष्ट्रपति चुन लिए जाएँ.

























