बर्मा बना रहा है परमाणु संयंत्र?

विकीलीक्स पर जारी ताज़ा कूटनीतिक दस्तावेज़ के अनुसार हो सकता है कि उत्तर कोरिया की मदद से बर्मा गोपनीय रूप से परमाणु संयंत्र बना रहा हो.
'द गार्डियन'में प्रकाशित इस दस्तावेज़ के अनुसार दस्तावेज़ में कहा गया है कि तीन सौ उत्तर कोरियाई एक मिसाइल संयंत्र में काम कर रहे हैं और साथ में वे एक भूमिगत ठिकाने पर भी काम कर रहे हैं.
हालांकि इस दस्तावेज़ में ऐसे कोई प्रमाण नहीं दिए गए हैं जिससे इन अटकलों की पुष्टि की जा सके.
कई संदेश
पिछले कई महीनों से मीडिया में ये ख़बरें आ रही हैं और इस क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ पत्रकार कह रहे हैं कि बर्मा, उत्तर कोरिया के सहयोग से परमाणु संयंत्र बना रहा है.
बर्मा में सैन्य सरकार के विरोधियों से मिल रही सूचनाओं और सैटेलाइट से मिले चित्रों को जोड़कर जो तस्वीर बनाई जाती रही है उससे पुख़्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता.
विकीलीक्स पर अमरीका के जो संदेश प्रकाशित हुए हैं वे वर्ष 2004 से पिछले साल नवंबर तक के हैं और ये संदेश इस कहानी में दिलचस्प संकेत जोड़ते हैं.
उदाहरण के तौर पर वर्ष 2004 में एक विदेशी व्यावसायी ने अमरीकी दूतावास को बताया कि उसने ये अफ़वाह सुनी है कि बर्मा परमाणु संयंत्र बना रहा है और इसके लिए हर हफ़्ते एक ठिकाने पर ढेर से कॉन्क्रीट के स्लैब लाए जा रहे हैं.

उसने कहा कि पास ही में एक हवाई अड्डा बनाया गया है जिसकी लंबाई सामान्य हवाई अड्डे से अधिक है. उसका कहना था, "आप इसमें अंतरिक्ष यान उतार सकते हैं."
एक और संदेश में कहा गया है कि तीन सौ उत्तर कोरियाई नागरिक एक मिसाइल संयंत्र में और एक गुप्त परमाणु संयंत्र के निर्माण में लगे हुए हैं.
अमरीकी दूतावास ने इस संदेश के साथ टिप्पणी की है कि तीन सौ की संख्या कुछ ज़्यादा लगती है.
जनवरी, 2007 में भेजे गए एक संदेश में 'मिश्रित खनिजों' से भरा एक जहाज़ रंगून से चीन भेजे जाने का ज़िक्र है.
इसके अलावा बर्मा के एक अधिकारी का एक ऑस्ट्रेलियाई राजदूत से चलते फिरते किया गया ज़िक्र है जिससे पता चलता है कि उत्तर कोरिया परमाणु संयंत्र की स्थापना में बर्मा की मदद कर रहा है.
लेकिन बाद में इस अधिकारी ने अपनी कहानी बदल दी और ठोस रुप से यह कहने के लिए कोई सबूत नहीं बचा कि बर्मा और उत्तर कोरिया मिलकर आख़िर कर क्या रहे हैं.
बीबीसी के कूटनीतिक संवाददाता जोनाथन मार्कस का कहना है इन संदेशों से सूचनाओं की उस पहली पर एक नज़र डालने का अवसर ज़रुर मिलता है जिसके आधार पर पश्चिमी देशों का ख़ुफ़िया तंत्र काम करता है.

























