'गिर सकती है सीरियाई सरकार'

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सीरिया के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी फैसल अल-कुदसी का कहना है कि विदेशी प्रतिबंधों के कारण उनके देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है और राष्ट्रपति बशर-अल-असद की सरकार छह महीने से ज़्यादा समय तक नहीं टिक सकती.
उनके मुताबिक सीरियाई सरकार को ईरान से मदद मिल रही है लेकिन ये नाकाफी है. उनके मुताबिक सीरिया का व्यवसायी वर्ग भी राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन नहीं करता.
पिछले ग्यारह महीनों से जारी इस बग़ावत में हज़ारों लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन ये तय है कि राष्ट्रपति असद अंत तक लड़ाई लड़ेंगे.
मानवाधिकार समूहों का दावा है कि इस जनआंदोलन के दौरान वहां 7,000 लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन सरकारी दावों में इसे 2,000 ही बताया गया है.
पड़ोसी देश लेबनान की राजधानी बेरूत में मौजूद बीबीसी संवाददाता जिम मुईर के अनुसार वहां के कई नामचीन लोग जिनमें कई अमरीकी भी शामिल हैं मानते हैं कि राष्ट्रपति बशर अल-असद की सत्ता इन आर्थिक प्रतिबंधों के कारण गिर जाएगी क्योंकि इस आर्थिक नुकसान का राजनैतिक असर होना तय है.
आर्थिक प्रतिबंधों का असर
बीबीसी संवाददाता के अनुसार फैसल अल-कुदसी का संबंध एक ऐसे परिवार से है जिनका लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है और जिनकी सीरिया के आर्थिक उदारीकरण में अहम भूमिका रही है. इसलिए उनकी बातों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है.
अल-कुदसी इस समय लंदन की एक निवेश करने वाली बैंकिंग संस्था के प्रमुख हैं. उन्होंने खासतौर पर सीरिया में निजी क्षेत्रों में किए जाने वाले निवेश के लिए काफी काम किया है.
उन्होंने बताया कि तेल के निर्यात और पर्यटन उद्योग में आई मंदी ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में 45 प्रतिशत तक की कमी ला दी है.
फैसल अल-कुदसी के अनुसार, ''आंदोलनकारियों के खिलाफ़ सेना की कार्रवाई छह महीने से ज़्यादा नहीं चल सकती है, क्योंकि सेना भी लड़ते-लड़ते थक गई है.''
वो आगे कहते हैं, ''ऐसे में उनके पास ज्य़ादा विकल्प नहीं बचता, उन्हें हर हाल में या तो विरोधियों से बातचीत करनी होगी या लोगों की हत्या करने से खुद को रोकना होगा. और जिस वक्त वो ऐसा करेंगे उस वक्त हज़ारों-लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरेंगे.''

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उनका कहना था, ''पूरी सरकारी प्रणाली ही ठप हो रही है. जहां मुसीबतें ज़्यादा है वहां सरकार नदारद है, पुलिस मार-काट करना नहीं चाहती और अदालतें है नहीं. ये सब चीज़ें सरकार को नुकसान पहुंचा रही है.''
लेकिन असद समर्थकों का मानना है कि वे अंत तक अपने खिलाफ़ होने वाले इन षडयंत्रों के विरुद्ध मैदान में डटे रहेंगे.
बीबीसी संवाददाता जिम मुईर के मुताबिक मानवाधिकार संगठनों को इस बात का डर है कि अगर देश में खुली लड़ाई छिड़ती है तो वहां नरसंहार हो सकता है.

























