पाक-अमरीकी रिश्तों में तनाव और रास्ता

- Author, अहमद रशीद
- पदनाम, बीबीसी के अतिथि स्तंभकार
- प्रकाशित
अमरीका और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच सार्वजनिक मतभेद अब सेना तक जा पहुँचा है.
पाकिस्तानी सेना के साथ रिश्ते बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले अमरीकी अधिकारी ने उसकी सार्वजनिक रुप से निंदा की है.
अमरीका के शीर्ष सैन्य अधिकरी एडमिरल माइक मलन ने 20 से अधिक बार पाकिस्तान का दौरा किया है और पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख जनरल अशफ़ाक़ कयानी के साथ संबंध बनाने में असामान्य रुप से बहुत अधिक समय लगाया है.
अफ़ग़ानिस्तान में वर्ष 2001 में तालिबान सरकार को हटाने के बाद उभरे मतभेदों के बावजूद अमरीकी सेना से रिश्ते मधुर बनाने में जनरल कयानी ने भी पर्याप्त समय और ऊर्जा लगाई है.
शुरुआत से ही काबुल में अफ़ग़ान नॉर्दन अलायंस के क़ाबिज़ होने का पाकिस्तानी सेना विरोध करती रही है. उसे पहली सरकार में ग़ैर-पश्तो लोगों का वर्चस्व और अफ़ग़ान सेना के पुनर्गठन में पाकिस्तान को शामिल न करने को लेकर भी आपत्ति रही है.
तनाव

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दोनों के बीच तब और मतभेद उभरे जब अफ़ग़ान तालिबान के शीर्ष कमांडरों को पाकिस्तान ने पनाह दी और समर्थन दिया. बाद में इन तालिबान ने ही वर्ष 2003 के बाद अफ़ग़ानिस्तान में विद्रोह शुरु किया.
उसके बाद से तालिबान का विद्रोह पूरे अफ़ग़ानिस्तान में फैल गया है.
अमरीकी-नैटो सेना को डेढ़ लाख सैनिक तैनात करने पड़े और बाक़ायदा युद्ध शुरु हो गया. यह युद्ध पाकिस्तान में तालिबान के संगठित होने का कारण बना, जिसे पहले तो पाकिस्तान ने गंभीरता से नहीं लिया लेकिन अब वह एक बड़ी समस्या बन गया है.
इस बीच ज़मीनी हक़ीकत और वॉशिंगटन में हालात बदलने की वजह से दोनों के बीच ताल्लुक़ हालांकि बदल गए लेकिन ये दोनों लोग दोस्त बने रहे और दोनों एक दूसरे की रणनीति बदलने की वजहों को समझने की कोशिश करते रहे.
इन दोनों ही अधिकारियों को अपने-अपने सहयोगियों के बीच इस दोस्ताना संबंध की सफ़ाई भी देनी पड़ी.
अमरीकी संसद के निचले सदन यानी कांग्रेस, ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए और उनके सैन्य सहयोगियों ने पाकिस्तान के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते हुए एडमिरल मलन की निंदा की.
अविश्वास
उधर जनरल कियानी को भी अमरीकी सेना के साथ संबंधों को लेकर सफ़ाई देनी पड़ी क्योंकि वे इस बात पर नाराज़ थे कि इसकी वजह से पाकिस्तानी सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठानों में अमरीकी दख़ल बढ़ता जा रहा है. यहाँ तक कि सेना के भीतर भी अमरीका विरोधी स्वर उभरने लगे.

ये मतभेद वास्तविक थे और इनका दूर होना संभव नहीं दिख रहा था.
पाकिस्तानियों को डर लगता है कि अमरीका ने पाकिस्तान और भारत की जो सूचनाएँ एकत्रित की हैं उसका उपयोग करके वह एक दिन उसके परमाणु हथियार प्रणाली को भेद लेगा.
दूसरी ओर अमरीका को डर लगता है कि कुछ ख़ास चरमपंथी संगठनों पर नकेल कसने से पाकिस्तान का इनकार, अमरीका और यूरोप में और चरमपंथी हमलों की वजह बन सकता है. इसकी वजह से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने की मांग भी बढ़ सकती है.
इस बात के पर्याप्त सबूत है कि पश्चिम में और भारत में हुए कई आतंकवादी हमलों में या तो पाकिस्तानी तालिबान का हाथ रहा है या फिर लश्करे तैबा का.
अमरीका की ओर से पाकिस्तान की सेना पर अरबों डॉलर ख़र्च किया जाता रहा है. मध्यपूर्व और अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी सेना की ओर से अमरीका को उपलब्ध करवाई गई सेवाओं के लिए भी बड़ी राशि दी जाती रही है. लेकिन इन सबके बावजूद दोनों की रणनीति में बड़ा फ़र्क रहा है.
दोनों के बीच रिश्ते 1965 में तब टूट गए जब पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीकी हथियारों का प्रयोग किया.
ये संबंध 1971 में एक बार फिर टूटे जब पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध छिड़ा. लेकिन ये संबंध सबसे लंबे समय तक तब अधर में लटक गए जब 90 के दशक में पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया और अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम पर अमल करने लगा.
रणनीतिक मतभेद
इस पूरे मामले में सबसे दुर्भाग्यशाली व्यक्ति रहे एडमिरल मलन क्योंकि उन्होंने दोनों सेनाओं के बीच जो रिश्ता बनाने की कोशिश की थी वह कारगर नहीं हो सकी.

आख़िर उन्होंने अपना पद छोड़ दिया जबकि जनरल कियानी का कार्यकाल अभी तीन साल बचा हुआ है.
इन दोनों ने ही पहले एक दूसरे को समझने की अपने तरह से कोशिश की फिर एक दूसरे की रणनीति को बदला लेकिन वे क़ामयाब न हो सके.
अमरीका पाकिस्तान को यह समझाने से विफल रहा कि कुछ चरमपंथी संगठनों से दोस्ती करना और कुछ से निपटना एक ऐसी नीति है जो देश के और वैश्विक सुरक्षा के लिए आवश्यक है.
न ही अमरीका पाकिस्तानी सेना को इस बात के लिए राज़ी कर सका कि उसे भारत से दोस्ती कर लेनी चाहिए. हालांकि पाकिस्तान के राजनीतिक दल, नागरिक समाज और व्यावसायी वर्ग इसके पक्ष में है.
दूसरी ओर पाकिस्तान अमरीका को यह समझाने में नाकामयाब रहा कि अफ़ग़ानिस्तान में उनकी रणनीति ग़लत रही है, चाहे वह दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध का विस्तार हो या फिर अफ़ग़ान सेना का पुनर्गठन या फिर अफ़ग़ानिस्तान में भारत की ज़रुरत से ज़्यादा उपस्थिति.
पाकिस्तानी ये महसूस करते हैं कि अमरीका ने अपनी कारगुज़ारियों से इस क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ाया ही है.
रणनीतिक रुप से अमरीका और पाकिस्तान में जो दूरियाँ आ गई हैं उससे पार पाना अब संभव नहीं दिखता और अब वे इतनी ज़ाहिर हो गई हैं कि अब पुराने जैसे रिश्तों को भी क़ायम करना संभव नहीं दिखता.
साझा कार्यक्रम
हालांकि दोनों के बीच रिश्तों में सुधार की ज़रुरत है और इसकी संभावना भी बची हुई है.

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इसमें पहला सुधार ये है कि दोनों देशों के बीच 9/11 के बाद जो गोपनीय सौदे हुए थे अब उन पर नए सिरे से बात की जाए.
इसमें चालक रहित विमान यानी ड्रोन के प्रयोग और सीआईए की तैनाती का मसला भी है और पाकिस्तान की ओर से जलालुद्दीन हक़्क़ानी और लश्करे तैबा को दिए जाने वाले समर्थन का मसला भी है.
दूसरा यह है कि दोनों ही पक्षों को ऐसे साझा बिंदुओं पर सहमत होना पड़ेगा जिससे कि अफ़ग़ानिस्तान और क्षेत्र में शांति क़ायम हो सके.
इसकी ज़रुरत इसलिए भी है क्योंकि अब दोनों देश और दोनों देशों की सेनाएँ भी मानने लगी हैं कि शांति स्थापना के लिए अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान से बातचीत ज़रुरी है.
लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि वे एक दूसरे के प्रति पारदर्शी होने और एक साझा लक्ष्य की ओर बढ़ने की बजाय एक दूसरे को पछाड़ने की कोशिशों में ज़्यादा लगे हुए हैं.
पूरी दुनिया अफ़ग़ानिस्तान में शांति चाहती है. और यह तभी संभव है जब पाकिस्तान अमरीका, नैटो और दूसरे पड़ोसी देशों के साथ सहयोग करे.
यह एक ऐसा एजेंडा है जो अमरीका और पाकिस्तान के बीच सच्ची साझेदारी पैदा कर सकता है, जो पाकिस्तानी सेना के लिए सार्थक हो सकता है और लोगों के लिए भी.

























