पैकेज से निराश हैं नेपाल के पूर्व माओवादी छापामार

- Author, संजय ढकाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नेपाल
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पूर्व माओवादी छापामारों की नेपाली समाज में वापसी एक ख़ुशनुमा मौक़ा हो सकती थी. लेकिन इस पूरे हफ़्ते इन लड़ाकों के सात शिविरों में माहौल भारी था और तनावपूर्ण भी.
इन लड़ाकों के लिए “स्वैछिक सेवानिवृति पैकेज” के तहत सात हज़ार छापामारों को आर्थिक सहायता के रूप में रकम मिली. लेकिन इसके बावजूद अधिकतर छापामारों में रोष व्याप्त था.
शिविर का मूड बयान करते हुए पूर्वी चुलाचूली शिविर के उप-कमांडर अर्जुन बिस्वकर्मा ने कहा, “ये हमें कुछ टुकड़े इस तरह बांट रहे हैं जैसे भूखे शेरों को ये कहकर खुश कर रहे हों कि आगे और मिलेगा.”
कई साल तक माओवादी सेना में काम करने के बाद बिस्वकर्मा को पांच लाख नेपाली रुपये मिल रहे हैं.
वहीं एक और छापामार श्याम बीर लिंबु सरकार की फ़ौज से लड़ते हुए घायल हो गए थे और उन्हें सात लाख नेपाली रूपये का सेवानिवृति पैकेज मिल रहा है.
लिंबु का कहना है कि वो सरकार और पार्टी के ख़राब बर्ताव से आहत हैं लेकिन चुप हैं क्योंकि ये कुर्ब़ानी नेपाल के संविधान को बनाने के लिए और शांति बनाए रखने के लिए ज़रूरी है.
सरकार इन छापामारों को पांच लाख रूपये से आठ लाख रूपये तक की आर्थिक सहायता कर रही है.
7000 छापामारों को राशि का चेक दो किश्तों में मिलेगा, जबकि 9000 लड़ाकों ने नेपाली सेना में शामिल होने का विकल्प चुना है लेकिन उनके पुनर्वास की प्रक्रिया अभी शुरु नहीं हुई है.
तनाव
स्वैछिक सेवानिवृति की प्रक्रिया में कई बार तनावपूर्ण हालात भी बने. कई शिविरों से ऐसी रिपोर्ट आई की कुछ कमांडर ये चेक छीन रहे हैं क्योंकि उन्हें भी पैसे में हिस्सा चाहिए.
पश्चिमी नेपाल के सुरखेत में एक महिला छापामार पुलिस के पास सुरक्षा कि गुहार लेकर गई क्योंकि कमांडर उसके पैकेज में हिस्सा मांग रहे थे और उसे तंग कर रहे थे.
लेकिन पार्टी ने तुरंत इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि कुछ छिटपुट घटनाएं स्थानीय झगड़ों की वजह से हुई हैं.
झ्यालतुंगडंडा शिविर के उप-कमांडर ने बीबीसी से कहा कि पार्टी ऐसे छापामारों को मिल रही राशि में हिस्सा लेने के बारे में सोच सकती है जो पिछले पांच साल में ज़्यादातर समय शिविरों से दूर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “कई लोग हैं जो कैंप छोड़कर चले गए, कुछ तो विदेशों में नौकरी भी करने लगे. लेकिन पैसा मिलने के वक़्त ही ये फिर नज़र आ रहे हैं.”
पार्टी नेतृत्व ने ऐसी रिपोर्टों को खारिज़ तो किया है लेकिन अपनी स्थिति साफ़ भी नहीं की है.
माओवादी पीएलए के प्रमुख नंदकिशोर पुन ने कहा, “सेवानिवृति चेक में कर लगाया जाए ऐसा पार्टी की पॉलिसी नहीं है.”
लेकिन इस मुद्दे को अब विपक्ष ने भी तूल देना शुरु कर दिया है और जांच की मांग की जाने लगी है.
हिंसा और रोष
चेक छीनने के आरोपों के अलावा कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएं भी हुई हैं.

पश्चिमी नेपाल में कुछ युवाओं ने एक शिविर में तोड़फोड़ की जहां से उन्हें कुछ साल पहले निकाल दिया गया था.
साथ ही पार्टी की युवा विंग यंग कम्युनिस्ट लीग के काडर भी असंतुष्ट हैं क्योंकि पीएलए के छापामारों को तो पैसा मिल रहा है लेकिन उन्हें नहीं.
इन सब के अलावा कई छापामारों में ये रोष है कि दस साल की लडाई के बावजूद निर्धन और मजदूर श्रेणी के लोगों की जीत नहीं हुई है. उनका कहना है कि इस पैकेज की तुलना उनके 15 सालों के प्रयासों और क़ुर्बानियों से नहीं करनी चाहिए.
कई लोगों का मानना है कि राजशाही का तख्तापलट एक बड़ी सफलता रही है लेकिन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का सपना दब सा गया है.
इसके अलावा नेपाल के माओवादी नेता पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' के रहन-सहन के शाही अंदाज़ ने देश के स्थानीय मीडिया में एक नई बहस छेड़ दी है. सवाल प्रचंड के अत्याधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न उस नए घर पर उठ रहे हैं जो राजधानी काठमांडू के बीचोबीच बना है.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 'प्रचंड' का लज़ीमपाट स्थित नया घर इस तरह बनाया गया है जिसमें निवास और कार्यालय के लिए अलग-अलग व्यवस्था है. इतना ही नहीं, इस परिसर में एक स्वीमिंग पूल और बैडमिंटन कोर्ट भी है.
प्रचंड का कहना है कि नया घर पार्टी उनसे मिलने आने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं के रहने के लिए भी है.
लेकिन एक शाही घर में जाने का प्रतीकात्मक अंदाज़ आम लोगों से भी छिपा नहीं है.

























