गोल्ड मेडल तो मिला लेकिन नौकरी नहीं

    • Author, राखी शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप के इतिहास में ऐसा सिर्फ़ आठ बार ही हुआ है जब भारत ने सोने का तमगा जीता हो.

इसमें ताज़ा नाम हरियाणा के इंद्रजीत सिंह का जुड़ा है. इन्होंने हाल ही में चीन के वुहान में हुई 21वीं एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता.

इसके बावजूद वो बेरोज़गारी में दिन गुज़ार रहे हैं.

जूनियर लेवल पर कई सालों तक लगातार मेडल जीतने वाले 27 वर्षीय इंद्रजीत सिंह 2010 के दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान बीमार होने के कारण चार दिन कोमा में रहे.

वहां से लेकर एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में स्वर्ण जीतने तक इंद्रजीत को ज़मीन-आसमान एक कर देना पड़ा.

साल 2013 में उन्होंने अपना पहला सीनियर इंटरनेशनल मेडल विश्व चैम्पियनशिप में शॉट पुट 19.70 मीटर फेंककर जीता. इसके बाद 2014 एशियाई खेलों में भी वो भारत के लिए कांस्य जीतकर लाए.

गोल्ड मिला पर नौकरी नहीं

देश के लिए तीन बड़े पदक जीतने के बावजूद इंद्रजीत बेरोज़गार हैं. प्रायोजकों की कमी और नौकरी ना होने की वजह से वो लोगों से उधार मांग कर विदेशी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने जाते हैं.

खेल मंत्रालय की तरफ से 2016 रियो ओलंपिक में खिलाड़ियों की आर्थिक मदद के लिए बनाई टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) में अब जाकर उनकी नाम दूसरी लिस्ट में आया है.

लेकिन फिलहाल इसका लाभ भी उन्हें मिलता नहीं दिख रहा.

वो कहते हैं, "मेरा नाम दूसरी लिस्ट में आया तो है, लेकिन जो आर्थिक मदद उन्होंने खिलाड़ियों को देने का वादा किया है वो प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं हुई है. बेरोज़गार होने की वजह से मुझे लोगों से पैसे मांगने पड़ रहे हैं. ओलंपिक को ज़्यादा वक्त नहीं बचा है. हमारे लिए प्रैक्टिस का एक-एक दिन क़ीमती है."

क्रिकेटर से बने थ्रोअर

भारतीय एकदिवसीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी फ़ुटबॉल के गोलकीपर से क्रिकेटर बने थे. इंद्रजीत क्रिकेटर से शॉट पुटर बने. हालांकि इसके ज़रिए भी वो अपने स्वर्गीय पिता का सपना पूरा कर रहे हैं.

वो कहते हैं, ''मध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं देश के लिए खेलूं. वो मुझे क्रिकेट खेलने के लिए प्रेरित करते थे.''

वो आगे बताते हैं, ''लेकिन हमारे देश में कई बार समय पर खिलाड़ियों को मौके नहीं मिल पाते, तो मुझे शॉट पुट की तरफ ध्यान देना पड़ा. हमारे देश में कई बार बच्चे ग़लती से खिलाड़ी बन जाते हैं.''

रियो की तैयारी

इंद्रजीत साल 2000 में हुई एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में भारत को गोल्ड दिलाने वाले थ्रोअर शक्ति सिंह के भाई प्रीतम सिंह से कोचिंग ले रहे हैं.

अपनी कामयाबी का श्रेय वो दोनों भाइयों को देते हैं जो उन्हें रियो ओलंपिक के लिए तैयार कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "डॉक्टर या इंजीनियर बनने में 4 से 6 साल का समय लगता है लेकिन एक एथलीट 10-12 साल की ट्रेनिंग के बाद ही इंटरनेशनल लेवल के लिए तैयार हो पाता है."

रियो की तैयारियों के लिए इंद्रजीत एशियाई ग्रां प्री, विश्व यूनिवर्सिटी खेल और विश्व चैम्पियनशिप में खेलते दिखाई देंगे.

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