पीस बॉन्ड क्या होता है? इस पर हस्ताक्षर करने के बाद लागू हो जातीं हैं ये शर्तें

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- Author, विनीत भल्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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- पढ़ने का समय: 5 मिनट
पीस बॉन्ड का नाम सुनते ही ऐसा लगता है कि शांति कायम रखने के लिए किसी वादे पर हस्ताक्षर कराया गया है. लेकिन लोकतंंत्र में विरोध के अधिकार को शांति के ख़िलाफ़ नहीं देखा जाता है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 'पीस बॉन्ड' पर हस्ताक्षर करने से कोई व्यक्ति या पॉलिटिकल एक्टिविस्ट क़ानूनी शर्तों से बंध जाता है?
आइए समझते हैं कि पीस बॉन्ड क्या है और इस पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं के हस्ताक्षर करने के मायने क्या हैं? नेहा बोरा ने पीस बॉन्ड को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती क्यों दी है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत पुलिस और प्रशासन के पास शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई अधिकार हैं.
पीस बॉन्ड क्या होता है?
पीस बॉन्ड का प्रावधान बीएनएसएस के अध्याय 9 में है. यह किसी अपराध की सज़ा के तौर पर नहीं, बल्कि एक प्रिवेंटिव क़दम के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
जब प्रशासन को लगता है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियों से सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है, तो उससे एक निश्चित अवधि के लिए शांति बनाए रखने का लिखित वादा लिया जाता है. इसे ही 'पीस बॉन्ड' कहते हैं.
हस्ताक्षर करने से इनकार करने पर क्या होता है?

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बीएनएसएस की धारा 136(3) के तहत अगर कोई व्यक्ति पीस बॉन्ड भरने से मना करता है या मजिस्ट्रेट की ओर से मांगे गए ज़मानती पेश नहीं कर पाता है, तो उसे हिरासत में लिया जा सकता है.
मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को तब तक न्यायिक हिरासत में भेज सकता है, जब तक कि वह बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं कर देता या मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती. जांच ख़त्म करने की ऊपरी समय-सीमा छह महीने है.
पीस बॉन्ड का उल्लंघन करने से क्या होता है?
बीएनएसएस की धारा 141(1)(b) के तहत, अगर मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि किसी व्यक्ति ने भरे गए पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो वह उस व्यक्ति को गिरफ़्तार करने और जेल भेजने का आदेश दे सकता है.
इसके अलावा, पुलिस को अगर लगता है कि वह व्यक्ति कोई संज्ञेय अपराध करने वाला है, तो वह धारा 170 के तहत उसे फिर से प्रिवेंटिव हिरासत में ले सकती है.
हिरासत की सीमा

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अगर यह साबित हो जाता है कि व्यक्ति ने पीस बॉन्ड का उल्लंघन किया है, तो धारा 141(1)(ख) के तहत मजिस्ट्रेट उसे उस बॉन्ड की बची हुई अवधि तक के लिए जेल में रखने का आदेश दे सकता है.
बीएनएसएस के तहत शांति बनाए रखने के लिए भरवाए गए बॉन्ड की अधिकतम अवधि एक वर्ष हो सकती है.
इन शक्तियों के इस्तेमाल पर क्या सीमाएं तय की गई हैं?
अदालतों और भारतीय विधि आयोग ने समय-समय पर इन प्रिवेंटिव शक्तियों के दुरुपयोग पर चिंता जताई है.
1969 में विधि आयोग की 41वीं रिपोर्ट में सिफ़ारिश की गई थी कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली ये शक्तियां केवल न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास होनी चाहिए.
इसके बाद 1984 के एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी पुलिस अधिकारियों को एसईएम की शक्तियां देने पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी और इसे शक्तियों के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत के ख़िलाफ़ बताया था.
2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक फ़ैसले में इसके इस्तेमाल को लेकर सख़्त दिशा-निर्देश जारी किए थे. हालांकि यह फ़ैसला पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 151 पर था, जो अब बीएनएसएस की धारा 126 और 170 बन गई हैं.
इस फ़ैसले में हाई कोर्ट में इन शक्तियों के इस्तेमाल के सिलसिले में कुछ आंकड़े पेश किए गए थे.
अदालत को दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने बताया था कि एक जुलाई 2017 से 13 जून 2018 के बीच दिल्ली में इन निवारक धाराओं के तहत 23,012 लोगों को हिरासत में लिया गया था.
इनमें से 7,335 – यानी लगभग एक-तिहाई – लोगों को जेल भेजा गया. इनमें से 1,119 लोग ऐसे थे, जिन्हें सात दिन से ज़्यादा समय तक जेल में रखा गया था.
हाई कोर्ट ने निर्देश दिया था कि प्रिवेंटिव धाराओं के तहत किसी भी व्यक्ति को एक बार में 7 दिन से ज़्यादा न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता. एसईएम को हर हफ़्ते हिरासत की समीक्षा करनी होगी.
अदालत ने यह भी कहा था कि एसईएम कॉपी-पेस्ट किए गए आदेश पारित नहीं कर सकते और उन्हें हर मामले में अपना न्यायिक दिमाग़ लगाना होगा.
इससे पहले 2008 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक फ़ैसले में कहा था कि बिना किसी ठोस कारण के शांति भंग होने की आशंका जताकर लोगों को जेल भेजना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
उस मामले में अदालत ने ग़लत तरीक़े से हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया था.
स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका को लेकर क्या चिंताएं हैं?
सबसे बड़ी चिंता हितों के टकराव की है. न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायपालिका का हिस्सा होते हैं, जबकि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सरकार और प्रशासन के अधीन काम करते हैं. दिल्ली में पुलिस के असिस्टेंट कमिश्नर रैंक के अधिकारियों को एसईएम की शक्तियां दी गई हैं.
इससे यह स्थिति पैदा होती है, जहां पुलिस ही किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करती है, पुलिस ही शिकायतकर्ता होती है और पुलिस अधिकारी ही एसईएम के रूप में यह तय करता है कि व्यक्ति को जेल भेजना है या नहीं.
2018 के फ़ैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि इन शक्तियों के इस्तेमाल में एक "स्पष्ट पूर्वाग्रह" दिखता है क्योंकि जेल भेजे गए लोगों में एक बड़ा प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय और समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों का होता है, जो भारी-भरकम ज़मानत राशि या ज़मानती का इंतज़ाम नहीं कर पाते और लंबे समय तक जेल में रहने को मजबूर होते हैं.
हाई कोर्ट ने दिल्ली में केवल एक साल के भीतर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को इन प्रावधानों के तहत जेल भेजे जाने पर भी सवाल उठाया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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