'भारत-पाक के बीच संगीत एक पुल है'

- Author, रचना श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, डैलस, अमरीका से
- प्रकाशित
फ़िल्म 'पाप' के एक गीत 'लागी तुम से लगन' ने रातों रात एक अनजान गायक को हिन्दुस्तान की आवाज़ बना दिया और आज हर दूसरी फ़िल्म में ये आवाज़ अपनी मधुरता के नए अंदाज़ स्थापित करती जा रही है.
फ़िल्म 'लव आजकल' में गाए गीत 'आज दिन चढ़्या...' के लिए उन्हें पुरस्कृत भी किया गया.
हम बात कर रहे हैं स्वर्गीय नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहेब के सच्चे उत्तराधिकारी, उनके भतीजे उस्ताद राहत फ़तेह अली खान की जो पिछले दिनों अमरीका आए और यहाँ 'सुर इंटर्टेनमेंट' के तहत आयोजित संगीत संध्या में समां बाँध दिया.
राहत फ़तेह अली जितने सुरीले है और मधुर हैं, उनका व्यक्तित्व और विचार भी उतने ही अच्छे हैं. उनके साथ एक अंतरंग गुफ़्तुगू के कुछ अंश:
जब आप ने अपना पहला स्टेज शो किया था तब आप बहुत छोटे थे तो क्या आप को डर नहीं लगा था?
जब मैंने पहला स्टेज शो किया था उस वक़्त मै सात साल का था. पाकिस्तान में एक बहुत बड़ा मौसिक़ी का दंगल हुआ करता था. उसमें शिरकत करने बहुत बड़े-बड़े कलाकार आते थे. उसमें मैने गाया था. मैं बिलकुल भी नहीं घबराया था. मुझको डर तब लगा था जब मै बड़ा हो गया. क्या है कि जब आपको किसी काम का पता चल जाता है तो आप ज़्यादा सावधान रहते हैं.
संगीत का ये रूहानी सफ़र सही मायनों में कबसे शुरू हुआ?
आप तो जानती ही हैं कि मैं नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब का भतीजा हूँ और मेरे वालिद फ़र्रुख़ फ़तेह अली ख़ान साहेब को भी संगीत का शौक़ था. बस समझ लीजिए कि पूरे घर में ही संगीत का माहौल था. जब ख़ाँ साहब (नुसरत फ़तेह अली) ने मुझे सुना तो उन्होंने बहुत तारीफ़ की. उन्होंने मुझे गोद ले लिया था.
तो आप उनके संगीत के उत्तराधिकारी हैं?
आप ऐसा कह सकती हैं. मै अपनी तरफ़ से कोशिश तो पूरी करता हूँ, अब कितना सफल होता हूँ, ये तो श्रोता ही बता सकते हैं.
आपने अपने एक साक्षत्कार में कहा था कि जब आप स्टेज पर गाते थे, आप नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब की तरफ़ देख कर गाते थे ऐसा क्यों?
जी सही है. सभी कहते भी थे कि सामने देख कर गाओ. 1975 में ख़ान साहब मुझे अपने साथ टूर पर ले गए, उस समय मै कॉलेज में था. मैं छुट्टियाँ लेकर गया था.
ख़ान साहब से सीखने का जो समय मुझे मिलता था वो टूरिंग में ही मिलता था तो शिक्षा केवल स्टेज पर ही हुआ करती थी. मेरे पास सीखने का समय कम होता था तो मै गाते समय उन्ही की तरफ़ देखा करता था कि वो क्या कह रहे हैं क्योंकि मैं कुछ भी मिस नहीं करना चाहता था.
नुसरत फ़तेह के गानों के रीमिक्स बने हैं. इस बारे में उन्होंने आपसे कभी कुछ कहा?
जी वो बहुत बुरा महसूस करते थे. उस गाने को वो सुनते ही नहीं थे. मेरा मानना तो ये है कि रीमेक कर ले पर रीमिक्स नहीं करना चाहिए. रीमिक्स तो वो है कि अगर किसी चीज़ की कोई कमी रह गई हो तो उसको मिक्स कर दिया जाए या जो मिक्स है उस को रीमिक्स किया जाए.
आज के दौर में जबकि फ़िल्मी संगीत हर किसी ज़बान पर है, आप क़व्वाली और सूफ़ी गानों का भविष्य कहाँ देखते हैं?
आज मैं जो कुछ भी हूँ, सूफ़ी गानों और क़व्वाली की वजह से ही हूँ. मेरे हिसाब से तो इनका भविष्य बहुत अच्छा है. आजकल लोगों का रुझान मध्यम सुरों के गाने, सुकून पहुँचाने वाले गानों की तरफ़ ज़्यादा है. पॉप गाने भी पसंद करते हैं पर उसमें भी सुरों की तलाश करते हैं, टेम्पो किस तरह का है, तत्व क्या हैं, टेक्नो बीट में देसी टच है या नहीं.
कम लोग जानते है कि आपने हॉलीवुड की फ़िल्म के लिए भी काम किया है. उसके बारे में हमें कुछ बताइए.
वर्ष 1995 में 'डेड मैन वाकिंग' में मैंने अपने वालिद और ख़ाँ साहेब के साथ संगीत देने में सहायता की थी. 2002 में 'फ़ोर फ़ेदर्स' के साउंड ट्रेक पर काम किया. एक मूवी ' एपोकैलिप्सो' 2006 में आई थी, उसके साउंड ट्रैक में मैंने आवाज़ भी दी है.
आप ने बॉलीवुड और हॉलीवुड दोनों जगह काम किया है, इन दोनों जगहों के काम करने के तरीक़े में क्या फ़र्क़ है?
ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है. हॉलीवुड में हम गीत नहीं देख पाते हैं, बस धुन पे संगीत देते हैं और यहाँ पूरा सीन मालूम होता है, गीत सामने होता है, पूरी सिचुएशन को समझ के संगीत दिया जाता है या फिर गाया जाता है जिससे गाने में भाव आते हैं और मेरे हिसाब से गाना तभी ख़ूबसूरत बनता है.
क्या रागों में भी कोई अंतर है?
जी कोई अंतर नहीं है क्योंकि सुर तो सुर होते हैं बस नाम का अंतर है. जैसे हमारे यहाँ 'कहरवा' है वो इसको 'फ़ोर बीट्स' कहते हैं. जब हम 'दादरा' गाएंगे तो वो इस को 'थ्री और फ़ोर' कह देंगे. 'दादरा' को वो 'वाल्व और बैले' भी कहते हैं.
आपको बॉलीवुड में काम करके कैसा लग रहा है?
बहुत ही अच्छा लग रहा है. इतनी मुहब्बत और इज़्ज़त मिली है कि दामन भर गया. मैं सभी का दिल की गहराइयों से शुक्रगुज़ार हूँ.
हिंदी सिनेमा में आपने बहुत से संगीतकारों के साथ काम किया है. उनमें से आपके पसंदीदा संगीतकार कौन-कौन हैं?
शंकर महादेवन, विशाल शेखर, विशाल भारद्वाज, प्रीतम. ये सभी मुझे बहुत पसंद हैं.
आपको अपने पहले गीत 'लागी तुम से मन की लगन 'और आजकल के गीतों जैसे 'सजदा ','दिल तो बच्चा है जी 'में क्या कोई अंतर लगता है?
जी हाँ मौसीक़ी ऐसी चीज़ है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, तजुर्बा बढ़ता है तो ये और मज़बूत होती जाती है. यही फ़र्क़ है. गीत तो सभी अच्छे हैं पर समय के साथ और परिपक्व होते जाते हैं.
आप संगीत भी देते हैं. कम्पोज़ करते समय किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?
मै सुनने वालों का ध्यान रखता हूँ. साथ ही वैरिएशन भी करता हूँ. प्रीतम भाई मेरा बहुत साथ देते हैं कहते हैं ये आपका गाना है अब आप जैसे गाना चाहते हैं गाएं.
अभी एक पंजाबी फ़िल्म आई है 'विरसा' इसमें आपका एक गाना है 'मैं तेनू समझांवाँ ' बहुत ख़ूबसूरत गाना है.
जी वो माशा अल्लाह बहुत ख़ूबसूरत गाना है. मेरे एक बहुत ही अच्छे दोस्त थे जो अभी इस दुनिया में नहीं रहे अहमद अनीज़ साहब, उनका लिखा हुआ है और ये गीत सही मायनों में उन्ही को समर्पित है.
आजकल भारत में पाकिस्तानी गायक बहुत सफल हैं और पसंद किए जा रहें हैं आप की नज़र में क्या कारण है?
मेरी निगाहों में ये दोस्ती और प्यार है. संगीत से दोनों ही देश आपस में बहुत गहरे जुड़े हैं और ये एक पुल है भारत और पाकिस्तान के बीच. इसका असर तो जानवरों पर भी होता है हम तो फिर भी इंसान हैं.
आप के एक गाने 'दिल तो बच्चा है जी ' को बहुत पसंद किया जा रहा है. इसमें संगीत बहुत कम है, थोडा़ अलग तरह का गाना है.
जी हाँ ये गाना बहुत अच्छा बना है, थोड़ा अलग है. ये एक सिचुएशनल गाना है, एक अलग तरह से फ़िल्माया भी गया है और इसके बोल भी बहुत सुंदर हैं.
फ़िल्मी गानों को गाने और कव्वाली गाने में क्या अलग-अलग नोट्स लगते हैं?
जी हाँ फ़िल्मों के ज़्यादातर गानों में एक पिच नीचे होता है और क़व्वाली में बहुत ही ऊँचे नोट्स लगते हैं. क़व्वाली गाते समय पता ही नंही होता है कि आप कितने ऊँचे नोट्स पर पहुँच गए हैं.
आपने बहुत से कॉंसर्ट किए हैं हर जगह सुनने वाले एक से नहीं होते?
जी आप ने सही कहा, कभी तो लोग केवल बॉलीवुड के गाने सुनना चाहते हैं, कभी क़व्वालियों की फ़रमाइश होती है, कहीं लोग नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब के गानों को सुनना चाहते हैं. इसीलिए आप क्या गाएंगे ये थोड़ा सोच के आ सकते हैं पर स्टेज पर आकर आपको सामईन (श्रोता) का ध्यान रखना होता है.
खुद राहत जी के शब्दों में राहत क्या है?
मै तो बस मौसीक़ी (संगीत) का ख़िदमतगार हूँ. मेरे परिवार में सभी मौसीक़ी की ख़िदमत करते आए हैं और मैं भी कर रहा हूँ.
आपको जब फ़ुर्सत मिलती है तो संगीत के अलावा आप क्या करना पसंद करते हैं?
फ़ुर्सत के पल कहाँ मिलते हैं, अगर मिले भी तो आराम करता हूँ और संगीत सुनता हूँ.

























