ब्लॉग: ‘भाई’ का फ़ोन आने पर ध्यान रखने लायक़ कुछ बातें

- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
- प्रकाशित
'जॉनी मेरा नाम' फ़िल्म में देवानंद का एक ज़बरदस्त डायलॉग है जिसमें वो पुलिसवाले को देखकर ख़ुद से ही कहते हैं: "बेटे जॉनी, ये पुलिसवाले हैं - इनकी न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी. चल पी जा ग़ुस्सा." और ये कहते ही वो शराब का पूरा गिलास हलक़ में उड़ेल लेते हैं.
मैं इसमें पुलिसवालों के साथ 'भाई लोग' और जोड़ना चाहता हूँ. 'भाई लोग' यानी 'बिज़नेस' के सिलसिले में बंबई छोड़कर दुबई, सिंगापुर, मलेशिया जैसी जगहों पर जा बसने को मजबूर लोग जिन्हें हम और आप अंडरवर्ल्ड डॉन के विशेषण से भी जानते हैं.
इन भाइयों के सबसे 'बड़े भाई' यानी दाऊद इब्राहीम के साथ बरसों पहले हुए मेरे दस मिनट के 'ऐतिहासिक' वार्तालाप पर लिखे ब्लॉग के कई पाठकों ने प्यासा छोड़ दिए जाने की शिकायत की है. उन्हें लगता है बात अभी पूरी हुई नहीं. कुछ आगे का क़िस्सा, कुछ रहस्य का पर्दाफ़ाश होना शायद अभी बाक़ी है.
अफ़सोस कि दाऊद इब्राहीम के साथ मेरे पहले और आख़िरी सत्संग का क़िस्सा उनके फ़ैक्स आने और बयान पत्रिका में छापे जाने के साथ ही ख़त्म हो गया. लेकिन उनके छोटे भाई यानी छोटा शकील के पास मेरा फ़ोन नंबर था. वही नहीं, दुबई जाकर बस गए बंबई के कुछ और ख़लीफ़ा भी गाहे-ब-गाहे फ़ोन कर ही लिया करते थे.
फ़ज़ल-उर्रहमान
इनमें एक नाम था फ़ज़ल-उर्रहमान उर्फ़ फ़ज़लू भाई, जो पुलिस के मुताबिक़ पहले दाऊद इब्राहीम की टीम में थे और बाद में दुबई के एक डॉन इरफ़ान गोगा के गैंग में शामिल हो गए. फ़ज़लू के ख़िलाफ़ इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस निकले हुए थे और उनका नाम सीबीआई की सूची में काफ़ी ऊपर था.

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फ़ज़लू बिहारी लहजे की हिन्दी में बात किया करते थे. एक बार देर रात मेरे फ़ोन की घंटी बजी और मैं उसी बिहारी लहजे से समझ गया कि फ़ोन फ़ज़लू का है. "क्या हाल हैं राजेश भाई?"- उधर से आवाज़ आई.
मेरे लिए उस दौर में दुबई के किसी भाई का फ़ोन आने का मतलब कोई तगड़ी स्टोरी हाथ लगना ही होता था.
किसी भी 'भाई' का फ़ोन आने पर चंद बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है. एक तो अपनी आवाज़ से डर नहीं झलकने देना है बल्कि एक ख़ास क़िस्म की लापरवाही से बात करनी है.
दूसरे, अपनी बातचीत से ये दिखाना है कि जितनी मुझे तुम्हारी ज़रूरत है उतनी तुम्हें भी मेरी ज़रूरत है, इसलिए मेरे समय को फ़ालतू मत समझना.
तीसरे, बातचीत को कभी नाज़ुक मोड़ पर क़तई मत पहुँचने देना. जहाँ बात थोड़ी तनाव की ओर गई तो हँसकर कह देना है — अरे भाई, हमारा पेशा ख़बर जुटाना है और हम किसी काम के नहीं हैं.

पत्रकारिता के पेशे की चुनौतियां
पत्रकारिता के पेशे में पुलिस वालों से जान-पहचान जितनी ज़रूरी होती है क़ानून तोड़ने के पेशे में लगे लोगों से भी जान-पहचान उतनी ही ज़रूरी होती है. कई बार पत्रकार इस 'जान-पहचान' को दोस्ती मानने की ग़लती कर बैठते हैं. यही ग़लती राजनीति कवर करने वाले पत्रकार भी करते हैं जब वो नेताओं से 'जान-पहचान' को दोस्ती समझ बैठते हैं.
नेता, पुलिस अफ़सर और अंडरवर्ल्ड माफ़िया के पत्रकारों से 'दोस्ती' के अक्सर तीन कॉमन मक़सद होते हैं: पहला ये कि उनकी बात मीडिया में आती रहे, दूसरे, वो अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ 'स्टोरी प्लांट' कर सकें और तीसरा मक़सद होता है कि अगर ख़बर उनके ख़िलाफ़ हो तो मीडिया के 'दोस्त' थोड़ा नरमी बरतें. इसी तरह पत्रकार इन तीन वर्गों से नज़दीकी रखते हैं ताकि उन्हें 'एक्सक्लूसिव' ख़बरों की सप्लाई मिलती रहे.

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देर रात गए फ़ज़ल-उर्रहमान का फ़ोन आने का मतलब कोई ख़बर मिलने वाली है. "ज़रा अपने दोस्तों से पता कीजिए न राजेश भाई कि क्या उन्होंने वीरेंद्र पंत का काउंटर कर दिया है" - फ़ज़ल-उर्रहमान ने चिंतित स्वर में मुझसे कहा.
वीरेंद्र पंत निम्न मध्यवर्गीय गढ़वाली परिवार का एक सुदर्शन नौजवान होता था जो हरियाणा के राइ स्पोर्ट्स स्कूल में बैडमिंटन की ट्रेनिंग ले रहा था. पर तभी उसका संपर्क अंडरवर्ल्ड के लोगों से हो गया और वो दाऊद इब्राहीम के लिए काम करने वाले बबलू श्रीवास्तव का शार्प शूटर बन गया.
बबलू श्रीवास्तव लखनऊ का रहने वाला डॉन था जिसने तांत्रिक चंद्रास्वामी के दाऊद इब्राहीम के साथ संबंध होने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी. मुझे ये ख़बर सीधे बबलू श्रीवास्तव से ही मिली पर वो एक अलग क़िस्सा है.
"मैं पता करता हूँ", मैंने फ़ज़लू से कहा और फ़ोन काट दिया. वीरेंद्र पंत का एनकाउंटर मेरे लिए बड़ी ख़बर थी क्योंकि मैं तांत्रिक चंद्रास्वामी पर अपने एक इन्वेस्टिगेशन के सिलसिले में वीरेंद्र पंत से मिल चुका था.

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वीरेंद्र पंत का एनकाउंटर
उस वक़्त वीरेंद्र पंत एक मर्डर केस के सिलसिले में तिहाड़ जेल में बंद था और जब भी उसकी पेशी होती मैं उससे मिलने अदालत पहुँच जाया करता था. वीरेंद्र पंत ने चंद्रास्वामी, बबलू श्रीवास्तव आदि लोगों के कई क़िस्से मुझे सुनाए थे और एक साधारण परिवार से अपराध की दुनिया तक पहुँचने की अपनी कहानी भी विस्तार से सुनाई थी.
उसका एनकाउंटर मेरे लिए निश्चित रूप से ख़बर थी. मैंने तुरंत लोधी रोड में दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम के अपने सूत्रों को फ़ोन किया. इत्तेफ़ाक़ से जिस अफ़सर ने फ़ोन उठाया उससे मेरी अच्छी जान-पहचान थी. उसने मेरे सवाल का सीधा जवाब दिया -"अभी अभी ठोक के आ रहे हैं वीरेंद्र पंत को".
फिर ब्यौरा दिया कि कैसे पुलिस को वीरेंद्र पंत की लोकेशन का पता चला और पूरे दलबल के साथ उस फ़्लैट में पहुँचकर उसका एनकाउंटर कर दिया गया. लेकिन उस अफ़सर को इस बात पर ज़्यादा अचरज हुआ कि 'एनकाउंटर' होते ही ख़बर मुझ तक कैसे पहुँच गई!

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उसके बहुत सालों बाद गुजरात के उद्योगपति गौतम अडानी का अपहरण कर लिया गया जिसमें फ़ज़ल-उर्रहमान प्रमुख अभियुक्त बना. आरोप था कि फ़ज़लू ने गौतम अडानी की फ़िरौती में 15 करोड़ रुपए लिए थे.
दिल्ली या बंबई से दूर दूसरे मुल्क में बैठे बड़े-बड़े डॉन ख़बरें हासिल करने के लिए अपने भरोसेमंद सूत्रों का अपना अलग तानाबाना बनाकर रखते हैं. इन सूत्रों में सरकारी या ग़ैर-सरकारी कोई भी आदमी हो सकता है, मगर पत्रकारों से मिलने वाली ख़बरें भरोसे के क़ाबिल मानी जाती हैं. पत्रकारों को इसलिए अंडरवर्ल्ड की ज़रूरत होती है क्योंकि उस दुनिया की ख़बरें उसी दुनिया के लोगों से ही आ सकती हैं.
भारत-नेपाल सीमा पर हथियारों की संभावित तस्करी की ख़बर इन्वेस्टिगेट करने की कोशिश में मैंने छोटा शकील से कुछ जानकारी हासिल करनी चाही तो उसका संक्षिप्त-सा जवाब मिला, "अरे कोई अपना खा-कमा रहा है, तुम क्यों उसके पेट पर लात मारना चाह रहे हो." मेरी स्टोरी वहीं चारों ख़ाने चित्त हो कर गिर पड़ी.
और अंत में कुछ सवाल:

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जिस डॉन के एक फ़ोन पर बड़े-बड़े सूरमा और ख़लीफ़ा घबरा जाते हों, डिप्लोमेसी फ़ेल हो जाती हो और दो देशों के बीच पुरानी दुश्मनी का एक और कारण जुड़ जाता हो - धमकी देते वक़्त उसकी 'टोन' कैसी होती है?
क्या फ़िल्मों में दिखाए जाने वाले दुबई-वासी 'भाई लोगों' की तरह असली 'भाई' भी बंबइया बोली बोलते हैं: "ऐ, अपुन नाटक नईं माँगता - क्या? मई तेरे को आठ दिन का टैम देता… उसके बाद अपुन तेरा गेम बजा देंगा, क्या?"
जब दुबई से किसी माफ़िया का फ़ोन आता है तो रिपोर्टर कैसी सनसनी महसूस करता है? क्या डर नहीं लगता?
मुझे अंदाज़ा है कि ऐसे कई सवाल आपके ज़ेहन में होंगे, लेकिन सच ये है कि ऊपर जिन 'भाइयों' का ज़िक्र किया गया है उनमें से किसी ने भी न कभी फ़िल्मी झटका दिया और न बंबइया शानपट्टी दिखाई. बस, जैसा कि मैंने पहले लिखा था, छोटे शकील ने हँसते हुए ज़रूर भरोसा दिलाया था - "चल अब कोई फ़िकर मत करना. मैं तुझे फ़ोन पर गोली नहीं मारूँगा."
मुझे हमेशा इस बात का पूरा एहसास रहता है कि ये संपर्क 'दोस्ती' में नहीं बदल सकते हैं और न ही बदलने चाहिए.
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