पंडित दीनदयाल उपाध्याय खेती-किसानी के बारे में क्या कहते थे?

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- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
25 सितंबर 2020 - एक ही दिन पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जयंती का होना और देश में कृषि आंदोलन होना संयोग ही है.
आज के दिन एक तरफ़ बीजेपी पंडित दीन दयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर उन्हें याद कर रही है तो दूसरी तरफ़ देश के हज़ारों किसान मौजूदा सरकार के कृषि बिल पास करने के फ़ैसले के विरोध में सड़कों पर हैं.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय को कैसे याद किया जा रहा है?
प्रधानमंत्री मोदी ने आज बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और कहा कि सरकार उनका सपना पूरा करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने लोगों की आत्मनिर्भरता बढ़ाने की और ग़रीबों का उत्थान करने से जुड़े दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की बात की.
हालांकि ऐसे दिन जब देश का किसान समाज सड़कों पर है प्रधानमंत्री ने कृषि क्षेत्र के लिए दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का ज़िक्र नहीं किया.
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गृह मंत्री अमित शाह का कहना है, “दीनदयाल जी ने वैकल्पिक राजनीति की नींव रखी, वो आज देश के ग़रीब, वंचित व शोषित वर्ग को विकास की मुख्यधारा में लाने का काम कर रही है.”
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खेती विकास का आधार
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कृषि और कृषक के लिए दीनदयाल उपाध्याय की राय बेहद अहम थी.
29 जनवरी 1962 में एक लेख में उन्होंने खेती के बारे में लिखा था कि "देश के आर्थिक विकास का आधार खेती है. क्योंकि भारत में 72 फ़ीसद जनसंख्या की आय का मुख्य स्रोत खेती ही है और राष्ट्रीय आय का आधा हिस्सा खेती से आता है. इस कारण खेती को पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए."

"लेकिन हमारे नेता इसे प्राथमिकता देने की बजाय देश के औद्योगीकरण पर अधिक यक़ीन करते हैं. उन्हें लगता है कि देश के ग़रीबी के जड़ में कारख़ानों का न होना है और वो कुछ हद तक सही भी हैं लेकिन उद्योग भी खेती के बिना नहीं पनप सकते."
"किसान धनी वर्ग बनेंगे तभी उद्योग के उत्पादों के लिए उचित बाज़ार मुहैया करा सकता हैं. अगर इसे नज़रअंदाज़ किया गया तो असर उद्योगों पर होगा. इसी कारण दूसरी पंचवर्षीय योजना नाकाम हो गई."
मौजूदा दौर की बात करें तो 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार देश के 50 फ़ीसद कामगार कृषि पर निर्भर हैं और ये देश की जीडीपी का 17 से 18 फ़ीसद है.
साल 2012 में फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन में प्रस्तुत किए गए कृषि जनगणना कमिश्नर के प्रेज़ेन्टेशन के अनुसार देश की जनसंख्या का पचास से अधिक फ़ीसद सीधे तौर पर खेती पर निर्भर करता है. भारत में दुनिया की खेती लायक़ ज़मीन का 11 फ़ीसद है और ये दुनिया की 18 फ़ीसद आबादी के लिए अनाज का उत्पादन करता है.
साल 2011 की कृषि जनगणना के आकलन के अनुसार देश की 61.5 फ़ीसद आबादी गांवों में रहती है और इनमें से अधिकतर खेती पर निर्भर करते हैं. देश में 15.96 करोड़ परिवार खेती पर निर्भर हैं.
किसान, ज़मीन और अर्थव्यवस्था
आर्थिक मामलों में दीन दयाल उपाध्याय के विचारों के बारे में एपी सेन मेमोरियल गर्ल्स डिग्री कॉलेज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर मंजुला उपाध्याय ने लिखा है, "उनका मानना था कि आम आदमी की आय तभी बढ़ेगी जब सभी को काम मिलेगा."
"उनका कहना था जब हम औद्योगीकरण के रास्ते पर चलें तो हमारी प्रथमिकता देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाना होनी चाहिए. भारत ने शुरुआत में उद्योगों को अधिक महत्व दिया, खेती को नहीं और ऐसा कर के भारत ने अपनी कमज़ोरी को दुरुस्त करने की कोशिश की जबकि जो उसकी मज़बूती है उसने नज़रअंदाज़ कर दिया."
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"ये नहीं समझा गया कि गांव मज़बूत हुए तो उद्योगों के उत्पादों की माँग यहां बढ़ेगी लेकिन इसके लिए सरकार को ग्रामीण इलाक़ों में लोगों की आय बढ़ाने के लिए काम करना होगा. उनकी खरीदने की क्षमता बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था में सुधार ही आएगा."
"आर्थिक रूप में ये बेहद ज़रूरी है कि हम आत्मनिर्भर हों. अपना काम पूरा करने के लिए अगर हम विदेश से आर्थिक मदद लेते हैं तो इसका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में असर हो सकता है. हम मदद देने वाले देशों के आर्थिक प्रभुत्व के असर में आ जाएंगे. अपनी आर्थिक योजनाओं को बचाने के लिए हमें चुप रहना पड़ सकता है."
"ऐसा देश जिसे दूसरे देशों पर निर्भर रहने की आदत पड़ जाती है वो अपना आत्मसम्मान खो देता है. ऐसा देश आज़ादी के महत्व को सही-सही नहीं आंक सकता. ये भी बात सही है कि कोई देश हमें अपने हिसाब से इस्तेमाल करने के लिए आर्थिक मदद नहीं देगा, वो हमारी योजनाओं की समीक्षा करेगा ताकि हमारे हित में न होने पर भी हमें आर्थिक मदद लेनी पड़े."
1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के वक़्त जब अमरीका ने भारत को दी जा रही सभी आर्थिक मदद बंद करने का ऐलान किया, उस वक़्त प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री ने कहा कि अमरीका के गेहूं की भारत को कोई ज़रूरत नहीं. दीनदयाल उपाध्याय ने इसका स्वागत किया था.
न्यूनतम मूल्य और कोऑपरेटिव फ़ार्मिंग
"अमरीका की तर्ज़ पर बड़े खेत और कृषि का आधुनिकीकरण हमारी कृषि व्यवस्था के लिए सही नहीं है. हमारे देश में मध्यम आकार के खेतों की ज़रूरत है जिन पर आसानी से काम किया जा सके और अगर ज़मीन ठेके पर न दिए जा सकें तो उस पर सीलिंग लगाना ज़रूरी है."
"पांच एकड़ की सिंचाई पाने वाली ज़मीन को एक आर्थिक ईकाई के रूप में गिना जा सकता है और इसलिए किसी किसान के पास इतनी ज़मीन तो होनी ही चाहिए."
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"खेती करने वाले को अपने उत्पाद का सही मूल्य मिलना चाहिए. सरकार को एक तय न्यूनतम मूल्य पर खेती से होने वाले उत्पाद ख़रीदने की उचित व्यवस्था करनी चाहिए और इस मूल्य की घोषणा खेती से मौसम से पहले की जानी चाहिए."
"इस न्यूनतम मूल्य के निर्धारण के वक़्त ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इससे किसान को कुछ लाभ हो और उसकी लागत वसूल हो जाए. किसानों की स्थिति सुधारने के लिए उन्हें अपने उत्पाद की लागत से अधिक क़ीमत मिलनी चाहिए."
"कोऑपरेटिव फ़ार्मिंग एक तरह से ज़मीन को एक जगह इकट्ठा करने जैसा है इसलिए ये सही क़दम नहीं है. ये न केवल गणतंत्र के लिए बुरा है बल्कि प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाने की ज़रूरत के लिए भी ये ठीक नहीं है."
दीनदयाल उपाध्याय भू-स्वामी कृषि प्रणाली को मानने वाले थे. ये एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें ज़मीन जोतने वाला ही ज़मीन का मालिक होगा.
उनका कहना था कि किसान को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि ज़मीन से उसे बेदख़ल नहीं किया जाएगा, तभी तो वो ज़मीन पर अधिक परिश्रम कर पाएगा.
एकाकी जीवन
दीनदयाल उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा में नागला चंद्रबन में 25 सितंबर 1916 में हुआ था. वो तीन साल के थे जब उनके पिता भगवती प्रसाद का देहांत हो गया. आठ साल की उम्र आते-आते उनकी मां रामप्यारी भी चल बसीं और दीनदयाल और उनसे छोटे भाई शिवदयाल अनाथ हो गए.
दोनों बच्चों को उनके नाना आगरा के फ़तेहपुर सीकरी के पास बसे अपने गांव गुड़ की मंडी ले आए. लेकिन 1926 में उनकी मौत हो गई. इसके बाद दोनों बच्चों को उनकी बुआ ने पाला.
लेकिन जीवन दीनदयाल के लिए आसान नहीं था. वो जब अठारह के हुए तो शिवदयाल की मौत चेचक से हो गई और दीनदयाल दुनिया में अकेले रह गए.
दीनदयाल ने अपनी पढ़ाई सीकर में की जिसके बाद उन्होंने स्नातक के लिए कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में दाखिला लिया. यहीं पर साल 1937 में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बने. इसके बाद कई सालों तक उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई इलाक़ों में प्रचारक के तौर पर काम किया.
रहस्यमयी हालातों में मौत
साल 1951 में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की. बाद में दीनदयाल को जनरल सेक्रेटरी चुन लिया गया. कुछ सालों तक वो पार्टी के प्रमुख भी रहे.

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फ़रवरी 1968 में एक ट्रेन सफ़र के दौरान मुग़ल सराय रेलवे स्टेशन पर उनकी मौत हो गई. दीनदयाल उपाध्याय पर लिखी अपनी किताब में रेणु सैनी ने इसे हत्या क़रार दिया है. वो कहती हैं कि हत्या के कारणों का पता नहीं चल पाया.
अपनी किताब में हरीश शर्मा लिखते हैं कि दीनदयाल की मौत पर उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी ने केंद्र सरकार से उच्चस्तरीय जाँच कराने की माँग की थी.
उन्होंने कहा था, “उनके शरीर पर जो घाव लगे हैं वे इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मृत्यु रेल दुर्घटना में नहीं हुई. मृत्यु के कुछ और कारण हैं. केंद्र सरकार को उच्चस्तरीय जाँच कराने की आवश्यकता है.”
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