ज़िंदा हैं बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल

- Author, पाणिनी आनंद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
- प्रकाशित
"वो मेरे बेटे को पकड़कर ले गए. उसे मार दिया और कह दिया कि एक दहशतगर्द मारा गया. अगर वाकई एक दहशतगर्द मारा है तो ये जाँच से क्यों बच रहे हैं. कम से कम हमें तसल्ली तो हो. पता नहीं, सरकार किसे बचाने की कोशिश कर रही है और क्यों..." कहते कहते अमीन अहमद का गला भर आता है.
एक बरस पहले यानी 19 सितंबर, 2008 को दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए संदिग्ध चरमपंथी आतिफ़ अमीन के पिता अमीन अहमद को इस बात का जवाब नहीं मिला है कि उनका बेटा क्या वाक़ई मुठभेड़ में मारा गया.
अमीन अहमद अबतक अपने बेटे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की एक कॉपी मिलने और मुठभेड़ मामले में एक प्राथमिकी दर्ज होने का इंतज़ार कर रहे हैं.
पिछले वर्ष देश के कुछ महानगरों और दिल्ली में हुए बम विस्फोटों के बाद दिल्ली पुलिस ने ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर बटला हाउस एनकाउंटर को अंजाम दिया था.
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इस एनकाउंटर में दो संदिग्ध मारे गए थे. पुलिस का कहना है कि ये दोनों चरमपंथी थे और दिल्ली सहित अन्य जगहों पर आतंकवादी गतिविधियों की साज़िश रचने में शामिल थे. एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर एमसी शर्मा भी मारे गए थे.
एनकाउंटर के कुछ दिनों बाद ही पुलिस ने तीन संदिग्धों को पकड़ा था जो अभी भी पुलिस हिरासत में हैं.
दिल्ली पुलिस इसे देश में चरमपंथी हमलों की साज़िश रचनेवालों के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई बताती है और कहती है कि उन्होंने अपना एक इंस्पेक्टर इस मुठभेड़ में खोया है. इसके फ़र्ज़ी होने का आरोप लगाना ग़लत है.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जाँच के बाद दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट देते हुए कहा है कि मुठभेड़ फ़र्ज़ी नहीं थी. दिल्ली हाईकोर्ट ने मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट को अपने रुख़ का आधार बनाया है.
दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत का कहना है, "राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जो प्रश्न हम से पूछे थे, हमने उसका जवाब दे दिया है, आयोग का फ़ैसला आ चुका है. अब मामला न्यायालय के अधीन है, इसलिए कोई भी टिप्पणी नहीं की जा सकती है."
जवाब खोजते सवाल
पर एक साल बाद भी कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके मन में इन एनकाउंटर को लेकर सवाल भी हैं. कुछ के लिए दो संदिग्धों के मारे जाने पर सवाल खड़े होते हैं तो कुछ के लिए इंस्पेक्टर एमसी शर्मा की मौत पर.
मृतक संदिग्धों के परिजन और मानवाधिकार समूह भी सवाल उठा रहे हैं. मसलन, इस मुठभेड़ की न्यायिक जाँच क्यों नहीं हुई. क़ानूनी प्रावधानों के मुताबिक एफ़आईआर की रिपोर्ट और बाक़ी अहम परीक्षण सामने क्यों नहीं आए हैं. मानवाधिकार आयोग केवल पुलिस से बातचीत के आधार पर रिपोर्ट कैसे दे सकता है.
मानवाधिकार आयोग ने इस बाबत आधिकारिक तौर पर कुछ भी कहने से मना कर दिया पर आयोग के एक अधिकारी ने अनौपचारिक तौर पर बीबीसी को बताया कि इस मामले में जो रिपोर्ट तैयार की गई है, उसे ही आयोग का फैसला माना जाए. जाँच पर सवाल उठाने वालों के लिए उन्होंने कहा कि शायद सवाल उठानेवालों को नहीं पता कि आयोग कैसे काम करता है.
जानी मानी अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "हम यह नहीं कह रहे कि आप कुछ अलग करके दिखाएं. जाँच का मतलब यह नहीं है कि पुलिस को ग़लत साबित करें. देश के लोग सच जानना चाहते हैं. उनका न्यायपालिका पर विश्वास अभी तक बचा है. फिर न्यायिक जाँच के लिए तो ख़ुद पुलिस को आगे आना चाहिए ताकि लोग सच को समझ सकें और उनपर उंगलियां उठनी बंद हों."
वो कहती हैं कि आतंकवाद की समस्या से देश रूबरू है पर आतंकवाद के नाम पर अभी तक जितने एनकाउंटर हुए हैं उनको देखकर लगता है कि असली लोग तो पकड़ से कहीं बाहर हैं. ऐसे में आतंकवाद से निपटने का विकल्प एनकाउंटर को कैसे बनाया जा सकता है.
मामले पर नज़र रख रहे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मांग है कि कम से कम उतना तो किया जाए जितना क़ानूनी तौर पर करना ज़रूरी है. मसलन, नियम कहता है कि मुठभेड़ के बाद प्राथमिकी दर्ज होनी ही चाहिए. मजिस्ट्रेट स्तर की जाँच की जानी चाहिए. जाँच पूरी होने तक संबंधित अधिकारियों की पदोन्नति और तबादले रोकने चाहिए. चार्जशीट दायर होने तक परिजनों को पूरी जानकारी दी जानी चाहिए. पोस्टमार्टम, फोरंसिक, बैलिस्टिक रिपोर्ट और पुलिस की लॉगबुक को देखा जाना चाहिए.
पर इन सवालों के जवाब अनुत्तरित हैं. कुछ विधि-विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी स्थिति पूरे मामले के बारे में संदेह पैदा करने की वजह बनती है. अगर पुलिस सही है तो ऐसी कमियों को तत्काल दूर किया जाना चाहिए ताकि लोगों का विश्वास जीता जा सके और सच्चाई को सामने लाया जा सके.
वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "इस मामले में चली क़ानूनी प्रक्रिया एक ग़लत परंपरा तय करने की कोशिश जैसी है. जिन संस्थाओं को इस मामले में यह सुनिश्चित करना था कि क़ानून का सही ढंग से पालन हो और पूरा पालन हो, उनका ध्यान इस मामले के राजनीतिक पहलु पर ज़्यादा है, क़ानूनी पहलु पर कम."
कुछ लोगों ने इस मामले में सूचना का अधिकार क़ानून के तहत जानकारी भी मांगी पर पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तक यह कहकर देने से मना कर दी गई कि इससे जाँच प्रभावित हो सकती है. जानकारी मांगनेवालों का कहना है कि जो दस्तावेज अब बदल नहीं सकता उसके सार्वजनिक होने से कैसे जाँच पर असर पड़ सकता है.
मुठभेड़ पर राजनीति
पर सवाल उठानेवाले केवल पुलिस और मानवाधिकार आयोग की ओर नहीं देख रहे. सवाल सरकारों की भूमिका पर भी उठ रहे हैं. केंद्र और राज्य दोनों. जब यह मुठभेड़ हुई थी तब दिल्ली में और केंद्र में, दोनों जगहों पर कांग्रेस की सरकार थी और अभी भी है.
जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी एसोसिएशन की मनीषा सेठी पूछती हैं कि इशरत और सोहराबुद्दीन के मुद्दे पर गुजरात सरकार को आड़े हाथों ले रही कांग्रेस ख़ुद बटला हाउस मामले में जाँच से पल्ला क्यों झाड़ रही है.
उन्होंने कहा कि जो कांग्रेस आज मीडिया के सामने गुजरात सरकार को इशरत मामले में घेरने से नहीं चूक रही, उसी ने एक हलफ़नामा सौंपकर कहा था कि इशरत का ताल्लुक चरमपंथी संगठन से है.
वो कहती हैं, "यह चिंताजनक और गंभीर स्थिति है कि मुठभेड़ों के मुद्दे पर सभी दल एक साथ खड़े दिखाई देते हैं. इस मुद्दे पर यूपीए और एनडीए में कोई फ़र्क़ नहीं दिखता. बल्कि गुजरात पुलिस को मुठभेड़ मामलों में सबसे ज़्यादा समर्थन और सहयोग कांग्रेस के नेतृत्ववाली राज्य सरकारों से ही मिला है."
दिल्ली सरकार इस मामले में लेफ़्टीनेंट गवर्नर के पीछे खड़ी नज़र आती है. दिल्ली के लेफ़्टिनेंट गवर्नर कह चुके हैं कि इस मामले की जाँच की कोई ज़रूरत नहीं है. क़ानूनविद उनकी भूमिका पर ही सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि गवर्नर संवैधानिक पद है और उसे न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है.
ग़ौरतलब है कि इस मामले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधननमंत्री तक जाँच की ज़रूरत से इनकार कर चुके हैं पर मारे गए लोगों के परिजन कम से कम क़ानूनी प्रक्रिया का पालन तो किए जाने की दुहाई देते हैं.
केंद्र सरकार के में सहकारी एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद भी इसपर कोई स्पष्ट रुख लेते नज़र नहीं आते.
वो कहते हैं, "एनएचआईसी की जाँच रिपोर्ट सामने आई है. कुछ लोग इससे संतुष्ट नहीं हैं. यह रिपोर्ट केंद्र सरकार के सामने भी आई है. गृहमंत्रालय को भी रिपोर्ट मिली है. वो इसपर बड़े ध्यान से काम करेंगे और उसके बाद जैसा ज़रूरी लगेगा, निर्णय लिया जाएगा."
इन बड़ी बहसों के बीच सवाल मीडिया की भूमिका पर भी उठते रहे कि कैसे पूर्वांचल का आज़मगढ़ ज़िला रातोंरात आतंक के गढ़ जैसी संज्ञाओं में बदल दिया गया. कैसे कभी मीडिया एक ख़ेमे में खड़ा नज़र आया तो कभी दूसरे में.
इस एक मुठभेड़ का असर आज़मगढ़ के कई युवाओं के भविष्य पर भी पड़ा है. उनकी और उनके घरों की सोच पर पड़ा है. देश के बाक़ी हिस्सों में उनके प्रति बाक़ी लोगों के रवैये पर भी पड़ा है.
इधर, एक साल बाद भी अमीन अहमद 'अभी भी न्याय पाने' और 'क़ानून का पालन होने' की आस लिए चल रहे हैं. वो चाहते हैं कि कम से कम सरकार, पुलिस और जाँच एजेंसियां इस मामले में एक पारदर्शिता तो सुनिश्चित करें. अगर वो अपने बेटे से जुड़े सच जानना चाहते हैं तो इससे किसी को क्या ख़तरा हो सकता है.

























