उलझी हुई है भोपाल कांड की डोर

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से
- प्रकाशित
भोपाल कांड के बारे में जब भी बात शुरू होती है, ज़्यादातर मरने वालों और घायलों की तादाद पर आकर रुक जाती है. पहले दिन बातचीत न हो पाने की वजह से जब मैं दूसरी सुबह अब्दुल जब्बार के कार्यालय पहुंचा तो वह अपने वकील आग्नेय सायल के साथ मुआवज़े के एक केस के सिलसिले में जबलपुर जा रहे थे. गैस पीड़ितों के साथ काम करने वाली अब्दुल जब्बार जैसी संस्थाओं का कहना है कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता से 713 करोड़ की जो मुआवज़े की राशि यूनियन कार्बाइड से ली थी, वह बहुत कम है. तर्क है कि यह राशि तीन हज़ार मृतकों और तकरीबन एक लाख घायलों के आधार पर तय की गई थी जबकि बाद में यही राशि इससे पाँच गुना लोगों के बीच बाँटी गई.
पीड़ित
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ इस दुर्घटना में 15 हज़ार लोग मारे गए और पांच लाख से अधिक घायल हुए, यानी वे कई तरह की बीमारियों का शिकार हैं.
स्वयंसेवी संस्थाओं का यह भी कहना है कि मुआवज़े की यह राशि पीड़ितों को वर्ष 1992 से मिलनीं शुरू हुई, यानी दुर्घटना के सात-आठ साल बाद से. कई लोगों को तो यह और बाद में मिली क्योंकि उन्हें यह ही साबित करने में सालों लग गए कि वह वहीं हैं जो वह अपने आपको बता रहे हैं और उनके पास पूरे दस्तावेज़ हैं या नहीं. "लेकिन यह तो मुआवज़े की बात है, इस मामले में क्या कोई आपराधिक मुक़दमा नहीं चला और क्या कोई सज़ा हुई लोगों को?" मैंने अब्दुल जब्बार से पुछा. उन्होंने कहा "सज़ा?, अरे अभी तो मामले में गवाही ही पूरी हुई है."
मुआवज़ा
हुआ यह कि जब सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता से यूनियन कार्बाइड से मुआवज़े की राशि तय हुई तो समझौता यह भी हुआ कि इस मामले में कार्बाइड के ख़िलाफ़ सभी आपराधिक मामलों को ख़त्म कर दिया जाएगा.
नतीजतन, इस मामले में सीबीआई ने अमरीका स्थित यूनियन कार्बाइड कारपोरशन, यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड, यूनियन कार्बाइड इस्टर्न हांगकांग और अन्य जिनमें कंबनी अध्यक्ष वारेन एंडरसन के ख़िलाफ़ केस चल रहा था, वह बंद कर दिया गया. कार्बाइड के ख़िलाफ़ दोबारा आपराधिक केस 1992 में शुरू करवाए गए जब राज कुमार केसवानी जैसे शहर के कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसके ख़िलाफ़ अदालत में आवाज़ उठाई. राज कुमार केसवानी कहते हैं कि इस तरह के समझौते के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना ज़रूरी था वरना यह तो एक उदाहरण बन जाता कि आप भारत में आकर फ़ैक्टरी लगाएँ और अगर आपकी लापरवाहियों से कोई दुर्घटना हो जाए तो पैसे दें और आपके ख़िलाफ़ कोई केस ही नहीं चलेगा. राजकुमार केसवानी ने इस मामले पर पत्रकार के तौर पर घटना से बहुत पहले से ढेरों लेख लिखकर यह चेतावनी देने की कोशिश की थी कि प्लांट में सुरक्षा व्यवस्था की कटौती के चलते कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है. दोबारा केस शुरू होने के बाद वारेन एंडरसन के ख़िलाफ़ वारंट जारी हुआ लेकिन अदालत के सामने उनकी पेशी नहीं हो पाई है. वारेन एंडरसन फ़िलहाल अमरीका में हैं बल्कि वह घटना के चंद दिनों बाद ही जो भारत से गए तो फिर कभी वापस नहीं आए न ही सीबीआई उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों को लेकर कुछ कर पाई है. यूनियन कार्बाइड कॉरपोरशन के अध्यक्ष पांच दिसंबर को भोपाल आए तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हाउस में रखा गया.
लेकिन थोड़ी ही देर में न सिर्फ़ उनकी ज़मानत हो गई बल्कि सरकार ने उन्हें विशेष जहाज़ से दिल्ली भिजवाया, जहाँ से वह अमरीका के लिए रवाना हो गए.
सवाल
इस घटना को लेकर कई प्रश्न पूछे जाते हैं कि आख़िर इतने बड़े अपराध में इतनी जल्दी ज़मानत कैसे मिल गई और आख़िर शासन ने वारेन एंडरसन को दिल्ली जाने के लिए अपना हवाई जहाज़ क्यों दिया? दुर्घटना के समय भोपाल के पुलिस अधीक्षक स्वराज पूरी वारेन एंडरसन की ज़मानत के मामले में सवाल करने पर कहते हैं, "मैं इतना ही कहूँगा कि यह कार्रवाई निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत की गई थी." इस बीच दो और घटनाएँ हुईं. यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के अधिकारियों ने हाई कोर्ट के सामने यह अर्जी दी कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे केस न चलाए जाए. लेकिन अदालत ने इससे मना कर दिया.
लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलेगा लेकिन दूसरी धाराओं के भीतर, इन धाराओं में सज़ा की अवधि काफ़ी कम है. कुछ ही दिनों बाद सीबीआई ने अपनी और से एक अर्जी दाखिल कर यह कहा कि वारेन एंडरसन और दूसरों के ख़िलाफ़ भी इन्हीं धाराओं में केस चलाया जाए. अब्दुल जब्बर कहते हैं, "अपने कहीं सुना है कि फ़रियादी ख़ुद ही बचाव पक्ष के ख़िलाफ़ इल्ज़ाम कम करने का अनुरोध कर रहा हो?"
अर्जी
सीबीआई की यह अर्जी कोर्ट ने ठुकरा दी है.

दूसरी अहम बात यह हुई कि यूनियन कार्बाइड को एक दूसरी अमरीकी कम्पनी डाऊ केमिकल्स ने ख़रीद लिया है और अब मामला यह उठ रहा है कि चूँकि यह कंपनी अब यूनियन कार्बाइड की भी मालिक है इसीलिए उसके ख़िलाफ़ केस चलाया जाए. एक अधिकारी ने मुझसे कहा कि भोपाल कांड से जुडा आपराधिक मामला अब इतना उलझ गया है कि इसमें शायद ही कुछ हो पाए. जब मैंने राज कुमार केसवानी से यह कहा तो वह छूटते ही बोले कि इसे उलझा कौन रहा है यह भी तो सोचिए.
उन्होंने कहा कि देश के एक अहम राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने डाऊ केमिकल्स से चंदा लिया है और कांग्रेस के एक अहम नेता कंपनी की पैरवी अदालतों में कर रहे हैं.

























