मुर्दाघर से जिंदा निकल आई कमलेशी

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवादाता, ग्वालियर
- प्रकाशित
कमलेशी रजत को मृत समझ कर मुर्दाघर के लिए भेजा गया था. अब वो जिंदा हैं और अस्पताल में भर्ती हैं.
दरअसल, उनके पति कोमल सिंह रजत ने उन्हें अपनी बहू के साथ मुर्दा समझ कर पुलिस के हवाले कर दिया था.
लेकिन मुर्दाघर में उन्हें ज़िंदा पाया गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया.
रविवार को मध्य प्रदेश के दतिया जिले के एक दूर दराज़ इलाके में भगदड़ मचने से 115 लोगों की मौत हो गई थी. कमलेशी भी इसी हादसे में घायल हो गईं थी.
45 साल की कमलेशी एक ग़रीब परिवार से हैं.
फ़िलहाल उनका ग्वलियर के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है जहाँ वो आँखें तो खोल रहीं हैं लेकिन बोल नहीं रही हैं.
मैं जिस वक्त अस्पताल पहुँचा उसके ठीक पहले उसके पति उसके बचने की उमीदें छोड़ बैठे थे और उनके अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे.
उन्होंने कहा, "मुझे ख़ुशी है मेरी पत्नी मुझे जिंदा मिल गई"
<link type="page"><caption> पुल पर शव ही शव दिखाई दे रहे थे</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131013_stampede_eyewitness_aa.shtml" platform="highweb"/></link>
चमत्कार

रविवार सुबह जब कोमल सिंह अपने परिवार के साथ दतिया के 'पवित्र' मंदिर' की तरफ बढ़े तो अचानक भगदड़ मच गई और देखते ही देखते दर्जनों लोगों की मौत हो गई.
उनकी पत्नी और बहू भगदड़ में कुचल गईं.
वे कहते हैं, "किसी तरह से हम ने दोनों औरतों को वहां से उठाया."
उन्होंने और उनके तीन साथियों ने दोनों महिलाओं को अपने कन्धों पर लादा और चार किलोमीटर तक पैदल ले गए.
वे कहते हैं कि, "उसके बाद पुलिस के हवाले कर दिया."
कोमल सिंह की पत्नी उस वक़्त बोल तक नहीं पा रहीं थी.
कोमल सिंह कहते हैं, "उसे जब होश आया तो सब से पहले बहू का नाम लिया". लेकिन उसके बाद से उनकी आवाज़ बैठी हुई है. उनके एक साथी ने कहा कि कमलेशी का ज़िंदा होना एक चमत्कार हैं.
<link type="page"><caption> भगदड़ के बाद अपनों की तलाश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131013_datia_stampede_sks.shtml" platform="highweb"/></link>
जारी है उत्सव

दशहरे के मौके पर लोग मंदिर में अब भी लाखों की तादाद में आए हैं. वे पूजा-अर्चना कर रहे हैं और उत्सव मना रहे हैं.
इतना बड़ा हादसा हो जाने के एक दिन बाद ही रंगे-बिरंगे कपड़ों और तमाम आभूषणों से लदे लोग मंदिर परिसर में तालियाँ बजाते हुए गीत गा रहे हैं और ढोलक बजा रहे हैं.
रविवार को रतनगढ़ में हुए हादसे में 115 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की जा चुकी है. कई लोग अभी भी जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं.
कुछ श्रद्धालुओं से जब पूछा गया कि उन्हें रविवार के हादसे के बाद डर नहीं लग रहा है तो उनका कहना था, "किसी तरह का भय नहीं है, रविवार का हादसा एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी और वो हादसा अब गुज़र चुका है".
ग़ौरतलब है कि रतनगढ़ मंदिर के पास ही कुछ साल पहले भी भगदड़ मचने से एक बड़ा हादसा हुआ था. उस हादसे में भी पचास से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.
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