ज्ञान ठिठुर रहा है, कोई पनाह देगा?

    • Author, अपूर्वानंद
    • पदनाम, विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

शिक्षा के क्षेत्र में बदलावों की बात जोर पर है. भारत में उपजे ज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल करने के शोर गुल में शिक्षा संस्थानों में काम थम गया है.

चाहे विश्व हिंदू कांग्रेस में प्रोफ़ेसरों, वैज्ञानिकों की मौजूदगी हो या विश्वविद्यालयों में बड़े बदलावों तरफ़ बढ़ रहे क़दम.

चर्चा उतनी नहीं है जितनी होना चाहिए. मीडिया और शिक्षा समुदाय से जुड़े लोग बेख़बर और बेपरवाह दिख रहे हैं.

पढ़िए पूरा लेख विस्तार से

सिलेबस का क्या होगा? इस प्रसंग में भगवाकरण शब्द का बार-बार इस्तेमाल किया जाता है जबकि पूछना यह चाहिए कि क्या शिक्षा का पाठ्यक्रम शिक्षा में अब तक हुए शोध से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बनाया जाएगा या किसी की सांस्कृतिक और राजनीतिक इच्छा के मुताबिक़?

<bold><link type="page"><caption> पढ़िेए: मनमोहन का 'ज्ञान' या मोदी का 'हुनर'</caption><url href="Filename: http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/12/141130_bjp_modi_education_policy1_rns.shtml" platform="highweb"/></link></bold>

पूरी बहस इस पर टिकी हुई है कि आज तक ज्ञान में भारतीय योगदान को नज़रअंदाज किया गया है.

लेकिन ज्ञान शायद भारत के बाहर भी बन रहा होगा? उसका क्या करें? क्या सबका भारतीयकरण कर दें?

भगवाकरण से अधिक उपयुक्त शब्द होगा ज्ञान का अज्ञानीकरण, अगर ऐसा कोई शब्द हम बना सकें.

उच्च शिक्षा का क्या होने वाला है? नीति संबंधी बात करने का यह वक़्त नहीं लेकिन सबसे ज़्यादा और सबसे तेज़ प्रशासन वाली इस सरकार के साथ महीने गुजरने के बाद भी 2009 में बने केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति के पद खाली पड़े हैं.

इस तरह की अफ़वाहें उड़ रही हैं कि इनके लिए 'सही विचारों' वाले लोगों की तलाश जारी है. वैसे भी अब तक उच्च शिक्षा संस्थानों ने दो बड़े काम किए हैं: एक, स्वच्छता अभियान और दूसरा, ‘यूनिटी रन’.

कुलपतियों की बैठक

दिल्ली विश्वविद्यालय

मेरी जानकारी ये है कि सरकार की तरफ़ से केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक कर कुछ समितियां बनाई गई हैं जिनका पता शिक्षा समुदाय को नहीं है.

ये समितियां इस समस्या पर काम कर रही हैं कि संस्थानों की रैंकिंग कैसे बनाई जाएगी, सारे विश्वविद्यालयों के लिए एक केन्द्रीय पाठ्यक्रम कैसे तैयार किया जाएगा और सबमें दाखिले के लिए एक केंद्रीय प्रवेश परीक्षा की पद्धति क्या होगी.

इस सूची को देखकर कम से कम सरकार की आज की प्राथमिकता और समझ का अंदाजा मिलता है.एक समिति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में सुधार को लेकर काम कर रही है.

कहाँ विकेंद्रीकृत स्वायत्तता और कहाँ केन्द्रीकरण! और यह सब पर्दे के पीछे हो रहा है. शिक्षा समुदाय को ख़बर भी नहीं और मीडिया को परवाह नहीं.

औपचारिक नीतियों से जो तब्दीली होगी, उससे ज़्यादा शायद अनौपचारिक तरीके से हो जाए.

दरबार और मुखिया

अनेक शिक्षा संस्थानों के प्रमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया और प्रचारकों के दरबार में जाकर वहाँ से उपदेश ग्रहण कर रहे हैं.

उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बहुत कुछ वे ख़ुद ही कर डालेंगे, क्या उन्हें किसी सरकारी फ़रमान की ज़रूरत पड़ेगी?

अभी हाल में संपन्न विश्व हिंदू कांग्रेस में अनेक संस्थानों के प्रमुख, वरिष्ठ वैज्ञानिक, प्रोफ़ेसर हाजिर हुए. उनसे उम्मीद करना कि वे रीढ़ की हड्डी क़ायम रख पाएँगे, ज़्यादती है.

कहा गया है कि जनवरी से नया शिक्षा आयोग काम करना शुरू कर देगा. उसका इंतज़ार ही किया जा सकता है. तब तक इतना कहा जा सकता है कि शब्द और अवधारणा के रूप में बेचारा ज्ञान ठंड में खड़ा ठिठुर रहा है और उसे पनाह की ज़रूरत है.

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