किसने सोची सरहदों के बग़ैर दुनिया?

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

फर्ज़ कीजिए कि दुनिया में कोई सरहद ना हो और इसीलिए कोई जंग ना हो. सभी लोग एक ही दुनिया के बाशिंदे हों, किसी एक देश के नहीं.

ऐसी ही क्रांतिकारी सोच पर चर्चा बढ़ाने के लिए नाटककार अकरम फ़िरोज़ पैदल चल पड़े भारत की सरहदों पर गांवों में रहने वाले लोगों से मिलने.

पढ़िए अकरम फ़िरोज़ की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी.

‘सरहदों पर नाटक’

मैं पांच साल से नाटकों के ज़रिए देशभर में घूमा हूँ और अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने की कोशिश की है.

इस बार मैंने तय किया कि मैं भारत की सरहदों पर चलूंगा और बिना सरहद की दुनिया की परिकल्पना वहां रहने वालों से बांटूंगा.

मुझे लगा कि सरहद पर रहने वालों के बीच जंग और नफ़रत का प्रॉपेगैंडा सबसे ज़्यादा किया जाता है. इसलिए वहां नए तरीके से बातचीत करना सबसे ज़रूरी है.

मेरा मक़सद है कि मैं ख़ुद भी सरहदों को समझूं और वहां रह रहे लोगों को समझाऊं कि सरहद पार रहने वाले भी नेक बंदे हैं.

मैंने एक <link type="page"><caption> वर्ल्ड पासपोर्ट</caption><url href="http://www.worldservice.org/docpass.html" platform="highweb"/></link> लिया और जुलाई के महीने में निकल पड़ा. आम पासपोर्ट जैसा दिखने वाला ये पासपोर्ट वर्ल्ड सर्विस अथॉरिटी जारी करती है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1948 में कहा था कि हर व्यक्ति को अपना या कोई और देश छोड़ने और अपने देश लौटने का अधिकार है. सफ़र करने के इसी अधिकार के तहत वर्ल्ड पासपोर्ट की सोच जन्मी थी.

‘सरहदों पर नाटक’ प्रोजेक्ट के तहत मैंने तय किया कि 10,000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी भारत की सरहद जो पाकिस्तान, नेपाल, चीन, बांग्लादेश, भूटान और बर्मा से जुड़ती है, पैदल तय करूंगा.

मैंने अपनी यात्रा की शुरुआत की कच्छ से. जैसा सोचा था, लोगों से मिलने का अनुभव उससे बहुत अलग निकला.

सुरक्षा और डर

मैंने ये नहीं सोचा था कि सरहद पर रहने वाले सरहद को पसंद करते होंगे. पर वो इसे एक बहुत ज़रूरी रेखा मानते हैं.

उन लोगों के बीच सुरक्षा की चाहत और आतंकवाद का ख़ौफ़ बहुत ज़्यादा था. शायद इसलिए भी था कि कच्छ से पाकिस्तान की सीमा जुड़ी है और इस व़क्त दोनों देशों के बीच रिश्ते भी अच्छे नहीं है.

मेरा नाम भी मुसलमान नाम है, मैं दाढ़ी रखता हूँ. तो मेरे नास्तिक होने के बावजूद मुझे वो अलग नज़र से देखते थे.

फिर भी हर 10 में से दो ऐसे लोग मिलते रहे जो ये मानते थे कि सरहद के उस ओर भी अच्छे लोग रहते हैं और यहां की ही तरह वे भी सरकार से उम्मीदें रखते हैं.

इतने लंबे सफर पर मेरे साथ तो कोई नहीं चल सकता था, पर मेरी सोच से इत्तेफ़ाक रखने वाले, मेरे जानने वालों और दोस्तों ने मुझे अलग-अलग इलाकों में मिलने का भरोसा दिलाया.

ऐसा सफ़र इंसान तभी कर सकता है जब वो लोगों में और इंसानी रिश्तों में विश्वास करे. क्योंकि आप अकेले हैं, भाषा भी अलग है, ऐसे में ताक़त लोगों से ही मिलती है.

सरहद एक ऐसी जगह है जहां तनाव होता है, घुसपैठ का डर रहता है. जहां ज़रूरी होता वहां मैं स्थानीय पुलिस से इजाज़त ले लेता.

क़रीब 1000 किलोमीटर का सफ़र तय करने के बाद जब मैं जैसलमेर पहुंचा तो वहां पुलिस ने मुझे हिरासत में ले लिया. उन्होंने कहा कि मेरे पास वहां होने की इजाज़त नहीं थी.

आरोप

उन्हें मेरे पास वर्ल्ड पासपोर्ट मिला, तस्वीरें मिली, जिनमें से कई कश्मीर की भी थी. लंबी पूछताछ के बाद मुझे क़रीब दो हफ़्ते थाने और जेल में बिताने पड़े.

मुझ पर धारा 107 और 151 लगाई गई थी यानि पांच से ज़्यादा लोगों के साथ मिलकर शांति भड़काने का आरोप था.

मानवाधिकार संगठनों और सोशल मीडिया में मेरे दोस्तों और परिवार ने जब मुहिम चलाई तो मुझे ज़मानत मिली.

इस पूरी घटना से मेरा विश्वास कुछ हद तक टूट गया है और मुझसे ज़्यादा मेरा परिवार घबरा गया है.

मैं हैदराबाद के पास एक छोटे गांव से हूँ, अब यहीं लौट आया हूँ. पर यहां यही धारणा बन रही है कि मैं मुसलमान हूँ इसलिए मुझे संदिग्ध समझा गया. मैं इससे ख़ुद को और अपने परिवार को उबारने की कोशिश कर रहा हूँ.

मैं फिर चलना चाहता हूँ. अभी तो शुरुआत ही हुई थी. मैं अब भी लोगों को बताना चाहता हूँ कि सरहदें ना हों तो दुनिया कितनी ख़ूबसूरत होगी.

ये एक प्रयोग है और मैं ये देखना चाहता हूँ कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करना कितना मुमकिन है.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)

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