वर्किंग डैड हैं तो इन 8 चीज़ों का रखें ख्याल

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बच्चों के लालन-पालन में होने वाली मुश्किलें क्या केवल माताओं को होती है, पिता को नहीं होती?

क्या बच्चों के चलते पिता का कामकाजी जीवन प्रभावित नहीं होता? या फिर कामकाजी दबाव का असर उनके बच्चों पर नहीं पड़ता?

इन मुश्किलों से पिता कैसे निपटते हैं? ख़ासकर तब जब इसके बारे में वे दूसरे पुरुषों से चर्चा नहीं करना चाहते.

महिलाएं तो घर परिवार में बच्चों के चलते होने वाली मुश्किलों का जिक्र एक दूसरे से कर लेती हैं, लेकिन पुरुष नहीं करते.

लिंक्डइन इंफ्लूएंशर्स पर इस सप्ताह कामकाजी माता-पिता की मुश्किलों पर ही चर्चा हो रही है. इनमें से दो विशेषज्ञों की राय को हम आपके सामने रख रहे हैं.

सैली क्राउचेक, इलीवेट नेटवर्क और इलीवेट ऐसेट मैनेजमेंट, चेयरमैन

मैंने मां के तौर पर कई ग़लतियां की हैं, उसे नोट कर मेरे बच्चे बेहद ख़ुश होते हैं. लेकिन मां के तौर पर मैंने कई स्मार्ट चीजें भी की हैं. इनमें से कुछ निम्न हैं-

1. बच्चों को समय दें- मैं हर साल अपने प्रत्येक बच्चे के साथ अलग अलग एक सप्ताहांत व्यतीत करती हूं. रुटीन लाइफ़ से अलग बिताए ये वक्त याद रहते हैं.

2. मां- पिता की भूमिका- मैंने अपने पति को समझाया कि जब रात में बच्चा अचानक से उठकर मम्मी मम्मी चिल्लाए, तो वह केवल मम्मी को आवाज़ नहीं दे रहा होता है. पिता को भी उठकर देखना चाहिए कि वह क्या चाहता है.

3. सेहत पर ध्यान- जब बच्चों की सेहत बिगड़ती है तो मैं सबकुछ छोड़ देती हूं. जब मेरा बेटा अस्पताल में दाखिल हुआ तो मैंने तब तक अस्पताल नहीं छोड़ा था, जब तक वह अस्पताल में रहा. बेटी के साथ भी ऐसी ही करती हैं. मैं भाग्यशाली हूं कि मेरा काम ऐसा है कि मैं यह मैनेज कर पाती हूं.

4. परिश्रम ही है विकल्प- मैं बहुत परिश्रम करती हूं और चाहती हूं कि मेरे बच्चे मुझे ऐसा करते हुए देखें. उन्हें ये मालूम हो कि कठिन मेहनत से ही कामयाबी मिल सकती है. नाकाम होने के बाद उठकर फिर से नए सिरे से मेहनत करनी चाहिए.

वेड बर्गेस, वाइस प्रेसीडेंट, टैलेंट साल्यूशंस, लिंक्डइन

कामकाजी माएं तो बच्चे और दफ़्तर की मुश्किलों पर बात करती रहती हैं लेकिन पुरुष इसको लेकर क्या सोचते हैं, यह लगभग नहीं के बराबर नज़र आता है.

इसी साल मैं करीब 12 ऐसी बैठकों में शामिल हुआ लेकिन वहां कोई पिता नहीं मिला जो पैरेंटिंग को लेकर मुश्किलों पर बात करने वाला हो. शायद पुरुष इन आंतरिक समस्याओं पर बात करने से बचना चाहते हैं.

पुरुष इस तरह की समस्या पर इसलिए भी नहीं बात करते हैं क्योंकि एक तरह का सामाजिक दबाव उन पर होता है, वे कामकाज और परिवार में संतुलन बनाकर चलने में यकीन रखते हैं. ऐसे ही लोगों के लिए मेरी सलाह है-

5. संतुलन को भूल जाइए- संतुलन की स्थिति ना तो व्यवहारिक होती है और ना ही मदद पहुंचाने वाली. बेहतर ज़िंदगी वह है जिसमें संगीत जैसा उतार चढ़ाव हो. मतलब सुख भी हो और दुख भी.

6. प्राथमिकता को तय कीजिए- जीवन में प्राथमिकता तय करनी चाहिए. शादी, बच्चे और काम की अहमियत को तय करना चाहिए. अपनी प्राथमिकता को तय करते वक्त दूसरों की पसंद को बहुत महत्व भी नहीं दीजिए.

7. लिमिट तय कीजिए- आपको नहीं कहना आना चाहिए. मतलब दफ्तर का काम घर नहीं ले जाइए. भले आपको रास्ते में, वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए काम करना पड़े. लेकिन घर पहुंचते ही बच्चों को समय दीजिए.

8. मानसिक रुप से तैयार रहें- जैसे आप दफ्तर में पहुंचने से पहले मानसिक रूप से तैयार होते हैं वैसे ही घर में पहुंचने के लिए खुद को मानसिक तौर पर तैयार रखें कि अब परिवार को वक्त देना है.

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20150625-why-dads-dont-talk-about-balance" platform="highweb"/></link> यहाँ पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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