वो वैज्ञानिक जो खोज रहे हैं दूसरी पृथ्वी को..

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ब्रह्मांड की दुनिया अनंत है. इसके बारे में पता लगाने की जितनी कोशिशें हो रही हैं, उसका रहस्य उतना ही गहराता जाता है.
पृथ्वी से किसी भी रात आसमान में चमकते तारों का जो झुंड नजर आता है, दरअसल ये अलग अलग खगोलीय पिंड हैं. ये सूर्य की तरह ही चमकदार हैं, पर इतनी दूर कि टिमटिमाते नजर आते हैं.
सूर्य की तरह अनगिनित तारों के अपने अपने ग्रह भी होंगे, जैसे हमारे सौर मंडल में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले ग्रह मौजूद हैं.

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एस्ट्रोफिजिस्ट सारा सीगर कहती हैं, "अकेले हमारी आकाश गंगा में पृथ्वी जैसे सैकड़ों अरबों ग्रह मौजूद होंगे."
सारा ने अपना पूरा जीवन हमारे सौरमंडल से बाहर की दुनिया में मौजूद ग्रहों की पड़ताल में लगा दिया है. उनका मिशन है अपने सौर मंडल से बाहर ऐसे ग्रहों को खोजना जिनमें पृथ्वी जैसे जीवन के अनुकूल स्थितियां मौजूद हों. इन ग्रहों को एक्सोप्लेनेट कहा जाता है.
सीगर के मुताबिक यह संभावित ग्रह गोल्डीलॉक्स ज़ोन में स्थित होगा, यानी वो क्षेत्र जो ना तो बहुत गर्म हो और ना ही बहुत ठंडा. इसीलिए उस क्षेत्र में जीवन के लिए उपयुक्त तापमान होगा.

लेकिन अहम सवाल यह है कि ये कैसे पता चलेगा कि सोलर सिस्टम के बाहर किसी ग्रह पर जीवन है?
ऐसी स्थिति भी नहीं है कि आप इन ग्रहों की सतहों को टेलिस्कोप से ज़ूम करके देख सकें क्योंकि अंतरिक्ष में एक खगोलीय पिंड की दूसरे से दूरी लाखों और कई बार अरबों मील की है.
अगर दूसरे ग्रह पर कोई संभावित जीवन है भी तो वहां पाए जाने वाले जीव इंटेलीजेंट नहीं हुए तो वो सिग्नल भी ब्रॉडकास्ट कैसे करेंगे, या पृथ्वी की दुनिया तक संपर्क कैसे करेंगे.

लेकिन सीगर का मानना है कि वह पृथ्वी के सौरमंडल से बाहर पृथ्वी जैसा ग्रह तलाशने की दिशा में बढ़ रही हैं.
जब एक्सोप्लेनेट की पहचान हो जाती है तो इसके वायुमंडल का अध्ययन होता है ताकि उस पर मौजूद गैसों का पता लगाया जा सके.

सीगर बताती हैं, "इस दिशा में मेरी बड़ी पहल ये थी कि मैने खोजा कि जब ये एक्सोप्लेनेट अपने सूर्य के सामने से गुज़र रहे होते हैं तो इनके वायुमंडल का अध्ययन हो सकता है. तारे के सामने होने पर एक्सोप्लेनेट के वायुमंडल में रोशनी की चमक नज़र आती है लेकिन उसके स्पेक्ट्रम में कुछ लाइनें गायब होती हैं क्योंकि कुछ गैसें वायुमंडल जज़्ब कर लेता है. हर गैस की अपनी लाइन होती है और इसी के अध्ययन से पता चलता है कि वहाँ कौन सी गैस मौजूद है."
वो कहती हैं, "जब पहले एक्सोप्लेनेट का पता चला तो मैन पूरा ध्यान उस पर केंद्रित किया और हिसाब लगाया कि हमें उसके वायुमंडल में सोडियम का पता लगाना चाहिए. कई साल बाद हबल टेलिस्कोप के इस्तेमाल से अन्य वैज्ञानिकों ने वहां सोडियम के होने की पुष्टि की और ये किसी एक्सोप्लेनेट के वायुमंडल का पहला गहन अध्ययन था."

इस काम में एक बड़ी अड़चन ये आती है कि एक्सोप्लेनेट के सूर्य की रोशनी बहुत तेज़ होती है.
इसका हल बताते हुए सीगर कहती हैं, "इसलिए हमें स्टारशेड का इस्तेमाल करना होगा. ये वो स्पेसशिप होगी जिसकी टेलिस्कोप के आसपास एक्सोप्लेनेट के सूर्य की रोशनी को ब्लॉक करना संभव होगा और ये हज़ारों मील दूर से सटीक जानकारी पहुँचाएगा, जैसे कि हम एक्सोप्लेनेट को आंखों के सामने देख रहे हों."
भविष्य के बारे में सीगर कहती हैं, "मेरा सपना है कि हम अपने बच्चों को तारों से भरा आकाश दिखाएँ और फिर एक तारे की पहचान करते हुए बता पाएं कि उसका गृह बिलकुल पृथ्वी जैसा है.
सीगर के मुताबिक इन ग्रहों के बारे में विस्तार से तब पता चल पाएगा जब हम वो विशालकाय सूरजमुखी के फूल के आकार का स्टारशेड सैटेलाइट लांच करेंगे.
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