पाक में बढ़ते बाल आत्मघाती हमलावर

पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में हाल में हमलों की संख्या बढ़ी है
    • Author, हफ़ीज़ चाचड़
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, इस्लामाबाद से
  • प्रकाशित

हाल में पाकिस्तान में जितने भी आत्मघाती हमले हुए हैं, उसमें अधिकतर 18 साल से कम उम्र आत्मघाती हमलावरों का इस्तेमाल किया गया.

पाकिस्तान के स्वात से सटे शांलगा ज़िले में सोमवार को एक 14 वर्षीय हमलावर ने अपने आपको बम से उड़ा दिया और 41 लोगों की जानें ले लीं.

पाकिस्तान में यह समस्या अब चिंता का विषय बन चुकी है और समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है.

जिन बच्चों की उम्र स्कूल जाने की हैं और जिनके हाथों में पुस्तकों के बस्ते होने चाहिए, उनके हाथों में आत्मघाती जेकैट थमा दिए जाते हैं और उन्हें स्कूल भेजने के बजाए अपनी जान लेने के लिए भेजा जाता है.

पाकिस्तान में हुए अधिकतर आत्मघाती हमले 18 साल के कम उम्र के लड़कों ने किए हैं.

बीबीसी उर्दू सेवा के पाकिस्तान संपादक हारून रशीद के अनुसार इन हमलावरों में कुछ गिरफ़्तार भी हुए हैं जो किसी वजह से हमला नहीं कर सके.

उन्होंने कहा, “युवाओं को ही इस्तेमाल किए जाने का जो कारण नज़र आता है, उसकी बड़ी वजह यह है कि वे कम उम्र के होते हैं और एक पेड़ की तरह होते हैं, उनको जिस तरह का खाद पानी देंगे, वे उसी तरह से तैयार होंगे.”

स्वात घाटी में मौलाना फज़लुल्लाह का एफ़एम रेडियो स्टेशन बच्चों और युवाओं को जेहाद के लिए प्रोत्साहित करने का बड़ा साधन था.

प्रशिक्षण केंद्र

स्वात और पाकिस्तान के अन्य क़बायली इलाकों में ऐसे केंद्र हैं जहाँ छोटी उम्र के लड़कों को आत्मघाती हमलों का प्रशिक्षण दिया जाता है.

सुरक्षा बल
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के क़बायली इलाक़े सुरक्षाबलों के लिए बड़ी समस्या बन गए हैं

कुछ महीने पहले स्वात का रहने वाला एक चौदह वर्षीय लड़का एक प्रशिक्षण केंद्र से भागने में कामयाब हुआ था और बाद में उन्होंने बीबीसी से बातचीत की थी.

उसका कहना था, “आठ बजे के करीब मैं स्कूल जा रहा था और अपने मोबाइल पर गाने सुन रहा था. बाद में कुछ लोग आए मुझे उठाया और तालेबान के घर ले गए.”

उसने बताया, “ उन्होंने मुझसे कहा, तुम को आत्मघाती हमलावर बनना है, मैंने कहा, नहीं मैं नहीं बनूँगा, मुझे ज़िंदगी से प्यार है और मैं ज़िंदा रहना चाहता हूँ.”

जेहाद की शिक्षा के लिए तालेबान ने सीडी और डीवीडी का भी सहारा लिया हुआ है और वे क़बायली इलाक़ों में आसानी से उपलब्ध हैं.

हारून रशीद ने बताया कि छोटी उमर के लड़कों को आत्मघाती हमलों में इस्तेमाल करना भविष्य को तबाह करने के बराबर है और ये समाज के लिए बड़ी चुनौती है.

उनका कहना था, “बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं, उनको अगर इस लाइन पर और इस तरह इस्तेमाल किया जाएगा तो ये एक ग़लत मिसाल बन जाएगा.”

जानकार मानते हैं कि क़बायली इलाकों में आधुनिक शिक्षा न होने के कारण लोग अपने बच्चों को इस्लामी मदरसों में दाख़िल करवाते हैं जहाँ इन लड़कों को आत्मघाती हमलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है.