विश्व कपः समीकरण और संभावना

धोनी, सचिन और कर्स्टन
    • Author, प्रदीप मैगज़ीन
    • पदनाम, खेल सलाहकार, हिन्दुस्तान टाइम्स
  • प्रकाशित

जैसा कि पहले से उम्मीद थी, विश्व कप का पहला हफ़्ता बहुत रोमांचक नहीं रहा, जहाँ क्रिकेट जगत की शीर्ष टीमों और बाक़ी टीमों के बीच का अंतर इतना बड़ा था कि मुक़ाबला एकतरफ़ा होना ही था.

प्रतियोगिता के फ़ॉर्मेट को लेकर बहस करने या फिर उन छोटी टीमों की बखिया उधेड़ने से पहले जिनके लिए प्रतियोगिता में इस दौर तक पहुँचना ही बड़ी बात है, आइए देखें कि आगे क्या-क्या हो सकता है.

वैसे अभी तक दावेदारों की बहुत परीक्षा नहीं हुई है, मेरा पहला आकलन यही है कि उपमहाद्वीप से बाहर की किसी टीम के लिए विश्व कप जीतना बेहद मुश्किल होगा.

यहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी हैं – नीची रहनेवाली, धीमा घूमनेवाली विकेट – कि इस क्षेत्र से बाहर की किसी भी टीम की गेंदबाज़ी में ऐसा संतुलन नहीं है जिससे कि वे नियमित रूप से मैच जिता सकें.

संतुलन

लेकिन इसी आधार पर दक्षिण अफ़्रीका की दावेदारी कमज़ोर होती है जिनकी बल्लेबाज़ी में इतनी गहराई नहीं है कि वो शीर्षक्रम के लड़खड़ाने पर संभल सके.

ऑस्ट्रेलिया की गेंदबाज़ी संतुलित नहीं है जो अपने तेज़ गेंदबाज़ों पर बहुत अधिक निर्भर है, लेकिन अगर उनके गेंदबाज़ सफल हो भी गए तो भी इस बात में संदेह है कि उनके बल्लेबाज़ उनको प्रतियोगिता के अंत तक ले जा सकेंगे.

इंग्लैंड, जिसपर कई लोग निगाह रखने के लिए कहते हैं, वो टीम हॉलैंड के विरूद्ध हुए मैच में बिल्कुल बिखरी हुई, थकी और हास्यास्पद टीम के जैसी नज़र आई.

उनकी बल्लेबाज़ी में ज़रूर दम है मगर मुझे शक है कि कि उनके गेंदबाज़ काँटे की टक्कर वाले मैचों में मैच निकाल पाने की क़ाबिलियत रखते हैं.

स्पिन

मुथैया मुरलीधरन
इमेज कैप्शन, भारतीय उपमहाद्वीप में स्पिनरों का पलड़ा भारी रहने की संभावना

कहना बेमानी है कि इन विकेटों पर स्पिन की ही तूती बोलेगी और यहाँ भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी टीमें दूसरों पर भारी पड़ेंगी.

पाकिस्तान की गेंदबाज़ी, उन तमाम झटकों के बाद जिन्होंने उसकी धार को कुंद किया है, मज़बूत लगती है, लेकिन तब क्या उनकी टीम नियमित तौर पर बड़े स्कोर कर सकेगी? इसपर संदेह है.

ऐसे में बचते हैं केवल दो मुख्य दावेदार और उनके दावे को पहले हफ़्ते के उनके प्रदर्शन से और बल मिलता है.

भारत की बल्लेबाज़ी, ऐसी परिस्थितियों में जिससे वे भली-भांति परिचित हैं, वो देखने में ही डरानेवाली, ठोस लगती है.

अगर उनका ऊपरी और मध्य क्रम नहीं बैठा – जिसकी संभावना ऐसे विकेटों पर कम ही है – तो वे निर्दयी होकर खेलेंगे.

और उनके पास ऐसे धीमी गति के गेंदबाज़ हैं जो किसी भी बल्लेबाज़ी पक्ष का कचूमर निकाल सकते हैं.

फिर भी, उनका कमज़ोर तेज़ आक्रमण, मैदान पर सुस्त हाव-भाव, और अपेक्षाओं के दबाव का सामना करने की टीम की क्षमता चिंता की वजह होना चाहिए.

संभावना

फिर बचता है श्रीलंका. मुझे लगता है कि ये एक टीम है जिसकी गेंदबाज़ी संतुलित है, मैदान पर खिलाड़ी चुस्त हैं और बल्लेबाज़ी ठोस है जिससे कि वे किसी भी टीम को चुनौती दे सकते हैं.

फ़ाइनल में भारत और श्रीलंका की टक्कर की संभावना पूरी बनती है बशर्ते दोनों टीमें नॉक आउट दौर में ना टकरा जाएँ.

सौभाग्य से, खेल के मैदानों पर होनेवाले संघर्ष का फ़ैसला कभी भी काग़ज़ों पर नहीं हो सकता, थोड़ी सी उथल-पुथल, अप्रत्याशित मोड़, मैदान पर थोड़ा सा शानदार खेल, क्रिकेट का असल आकर्षण है और कौन किसको पछाड़ता है, इसको लेकर अंत-अंत तक अनुमान लगते रहेंगे.

(लेखक हिन्दुस्तान टाइम्स अख़बार के खेल सलाहकार हैं)